स्मृति शेषः दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर
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के. के. उपाध्याय
नाना पाटेकर का दुनिया से चले जाना अभिनय जगत में ऐसा शून्य छोड़ गया है, जिसके समकक्ष पहुंच पाना बहुत कठिन होगा। कुछ अभिनेता उभरकर सिने पर्दे पर आते हैं, उनका अभिनय आकर्षित करता है तो तालियां बटोरते हैं और चले जाते हैं। लेकिन कुछ कलाकार दर्शकों के दिल में गहरे तक उतर जाते हैं। उनके फिल्मी संवाद स्मृतियों का हिस्सा बन जाते हैं। उनका चेहरा एक विचार बन जाता है। उनकी आवाज़ व्यवस्था से सवाल पूछने लगती है।
नाना पाटेकर ऐसे ही कलाकार थे।
वे सिर्फ अभिनेता नहीं थे, शानदार इंसान भी थे। बेबाक। संवेदनशील। स्वाभिमानी। अपनी शर्तों पर जीने वाले। अभिनय में जितने प्रखर, निजी जीवन में उतने ही सादगी प्रिय।
नाना को देखकर कभी लगा ही नहीं कि वे अभिनय कर रहे हैं। ऐसा लगता था जैसे पर्दे से सीधे दर्शकों के साथ संवाद कर रहे हों। उनकी आँखें बोलती थीं। चेहरे की एक-एक रेखा संवाद करती थी। आवाज़ में अद्भुत दम था। संवाद अदायगी में ऐसा प्रवाह कि शब्द सीधे हृदय में उतर जाते थे। वे संवाद बोलते नहीं थे, उन्हें जीते थे।
मुझे आज भी याद है। मैंने नाना पाटेकर की पहली फिल्म `प्रतिघात' देखी थी। वह 1987 का दौर था। उस फिल्म में उनका किरदार मानसिक रूप से अस्थिर दिखाई देता था लेकिन उसकी बातें देश की थीं। व्यवस्था की थीं। समाज की थीं। उसकी बेचैनी में एक सामान्य नागरिक का आक्रोश था। वह किरदार मेरे मन में कहीं ठहर गया।
उस समय शायद कल्पना भी नहीं की थी कि यही अभिनेता आगे चलकर भारतीय सिनेमा में अभिनय की अलग परिभाषा लिखेगा।
नाना की विशेषता थी कि उनके अभिनय में बनावट नहीं थी। वे पारंपरिक नायक की छवि में फिट नहीं बैठते थे। न चमकदार चेहरा। न बनावटी मुस्कान। न नायक बनने के लिए आवश्यक समझी जाने वाली अदाएँ लेकिन जब पर्दे पर आते थे तो दूसरे कलाकारों की उपस्थिति छोटी पड़ जाती थी। फिल्म
`परिंदा' में उनका भयावह व्यक्तित्व देखिए। फिल्म `प्रहार' में अनुशासन और राष्ट्र के प्रति समर्पण देखिए। फिल्म `क्रांतिवीर' में व्यवस्था के खिलाफ विद्रोह देखिए। फिल्म `यशवंत' में एक ईमानदार पुलिस अधिकारी का आक्रोश देखिए। फिल्म `अब तक छप्पन' में कठोरता देखिए। और फिर फिल्म `वेलकम' में उनकी अद्भुत हास्य प्रतिभा देखिए।
एक ही अभिनेता के इतने रूप! यही नाना की विलक्षणता थी।
उनकी फिल्म `क्रांतिवीर' का वह दृश्य भला कौन भूल सकता है, जब वे फाँसी के तख्ते पर खड़े होकर गरजते हैं,-
“आ गए मेरी मौत का तमाशा देखने!”
यह केवल एक फिल्मी संवाद नहीं था। यह उस व्यवस्था के विरुद्ध आक्रोश था। जिसमें अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाने वाला व्यक्ति ही अपराधी बना दिया जाता है।
इसी फिल्म में उनका एक और संवाद समाज की सांप्रदायिक संकीर्णता पर सीधा प्रहार करता है,-
“बता ये मुसलमान का खून है या ये हिंदू का खून है, बता!”
नाना के संवादों में मनोरंजन के साथ सामाजिक चेतना भी थी। वे दर्शकों को उत्तेजित ही नहीं करते थे। सोचने के लिए भी विवश करते थे। फिल्म
`यशवंत' का उनका प्रसिद्ध मच्छर वाला संवाद आज भी लोगों की ज़ुबान पर है। फिल्म `तिरंगा' का वह अंदाज़ “पहले लात, फिर बात…”आज भी याद किया जाता है। और फिल्म `वेलकम' में उदय शेट्टी बनकर उनका यह कहना कि “भगवान का दिया हुआ सबकुछ है…” हास्य अभिनय की यादगार मिसाल बन गया।
सोचिए! जिस अभिनेता की आवाज़ सुनकर दर्शकों की मुट्ठियाँ तन जाती थीं, वही अभिनेता कुछ वर्षों बाद अपनी अदाओं से उन्हें ठहाके लगाने पर मजबूर कर देता था।
यह साधारण प्रतिभा नहीं थी।
लेकिन नाना के व्यक्तित्व का एक दूसरा पक्ष भी था। जो संभवतः उनके अभिनय से कहीं अधिक बड़ा था।
महाराष्ट्र में जब किसान सूखे और आत्महत्या की त्रासदी से जूझ रहे थे, तब नाना केवल संवेदना व्यक्त करके नहीं रह गए। उन्होंने अभिनेता मकरंद अनासपुरे के साथ मिलकर साल 2015 में ‘नाम फाउंडेशन’ की शुरुआत की। किसान परिवारों की सहायता, जल संरक्षण और ग्रामीण जीवन को बेहतर बनाने के लिए काम किया।
यही अंतर है प्रसिद्धि और सार्थकता में। बहुत से लोग फिल्मों में किसानों का दर्द बेचते हैं। नाना किसानों का दर्द बाँटने उनके बीच पहुँचते थे।
उनके जीवन में देश के प्रति लगाव केवल संवादों तक सीमित नहीं था। फिल्म `प्रहार' के लिए उन्होंने सैन्य प्रशिक्षण लिया। भारतीय प्रादेशिक सेना से उनका जुड़ाव रहा। उनके भीतर सैनिक अनुशासन और देश के प्रति सम्मान का भाव स्पष्ट दिखाई देता था।
तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और पद्मश्री जैसे सम्मान उनकी प्रतिभा की सार्वजनिक स्वीकृति थे। लेकिन नाना की असली उपलब्धि पुरस्कार नहीं थे। वह स्थान था, जो उन्होंने करोड़ों दर्शकों के हृदय में बनाया।
नाना पाटेकर की सबसे बड़ी खूबी यह थी कि वे असहज करने वाले सवाल पूछने से नहीं डरते थे। उनके अभिनय में विद्रोह था लेकिन वह निरर्थक विद्रोह नहीं था। उसमें समाज के प्रति चिंता थी। व्यवस्था के प्रति आक्रोश था। अन्याय के प्रति असहमति थी।
आज सिनेमा में तकनीक बढ़ गई है। दृश्य भव्य हो गए हैं। प्रचार का शोर बढ़ गया है लेकिन ऐसे कलाकार कम होते जा रहे हैं, जो केवल अपनी आवाज़, आँखों और चेहरे के भावों से पूरा दृश्य अपने नाम कर लें।
नाना ऐसे ही कलाकार थे।
आज उनके निधन का समाचार आया तो मन अचानक फिल्म `प्रतिघात' के उस किरदार की ओर लौट गया, जिसे मैंने लगभग चार दशक पहले देखा था। तब वह किरदार देश और व्यवस्था से सवाल पूछ रहा था। बाद के दशकों में नाना ने अलग-अलग किरदारों के माध्यम से वही बेचैनी जीवित रखी।
नाना चले गए।
लेकिन उनकी आवाज़ नहीं जाएगी। उनका आक्रोश नहीं जाएगा। उनके संवाद नहीं जाएँगे। उनका वह विशिष्ट अंदाज़ नहीं जाएगा।
जब भी भारतीय सिनेमा में स्वाभाविक अभिनय की चर्चा होगी, जब भी दमदार संवाद अदायगी का उल्लेख होगा, जब भी पर्दे पर व्यवस्था से टकराने वाले किसी विद्रोही चरित्र की बात होगी, नाना पाटेकर याद आएँगे।
क्योंकि नाना पाटेकर केवल किरदार नहीं निभाते थे। वे किरदारों में अपना जीवन भर देते थे।
ऐसे कलाकार मरते नहीं। वे अपने अभिनय में जीवित रहते हैं।
अलविदा नाना!
आपके जाने से पर्दा सूना हुआ है। लेकिन आपकी आवाज़ और अदायगी भारतीय सिनेमा की स्मृतियों में हमेशा गूँजती रहेगी।
विनम्र श्रद्धांजलि।
(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश

