एनसीआरबी के आंकड़े और हमारे बच्चों से जुड़ी ये सच्चाई!
बच्चों का जीवन बचाने समाज में हर स्तर पर करना होगा अतिरिक्त श्रम
-डॉ. निवेदिता शर्मा
देश में बढ़ती छात्र आत्महत्याएं हमारे सामने वर्तमान दौर की उस सामाजिक और शैक्षिक व्यवस्था का आईना है, जिसमें बचपन धीरे-धीरे दबाव, प्रतिस्पर्धा और अपेक्षाओं के नीचे दम तोड़ रहा है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के अनुसार वर्ष 2024 में 14,488 छात्रों ने आत्महत्या की हैं। यह संख्या वर्ष 2023 की तुलना में 4.3 प्रतिशत अधिक है। इसमें सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि एक ओर देश में कुल आत्महत्या के मामलों में गिरावट दर्ज हुई है, वहीं छात्रों की आत्महत्या लगातार बढ़ती हुई दिखाई देती है। ऐसे में यह स्थिति स्पष्ट संकेत दे रही है कि हमारे बच्चे शिक्षा के अतिरिक्त बोझ के नीचे मानसिक रूप से टूट रहे हैं।
सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि आत्महत्या करने वाले छात्रों में बड़ी संख्या कक्षा 10वीं तक के विद्यार्थियों की है। यह वह आयु है, जब बच्चों को सबसे अधिक भावनात्मक सहारे, संवाद और मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है, किंतु दुर्भाग्य से इस दौर में उन पर करियर चुनने, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने और “सफल” बनने का भारी दबाव डाल दिया जाता है।
वर्ष 2015 में छात्र आत्महत्या के 8,934 मामले थे, जो 2024 में बढ़कर 14,488 हो गए। यानी एक दशक में 62 प्रतिशत से अधिक वृद्धि का होना निश्चित ही हम सभी के लिए गहरी चिंता का विषय होना चाहिए! क्योंकि सामने आए साक्ष्य के आधार पर स्पष्ट होता है कि प्रतिदिन औसतन लगभग 35 छात्र अपनी जीवन यात्रा को समाप्त कर रहे हैं। यहां विचार करनेवाली बात यह भी है कि क्या यह अकेले बच्चों की असफलता है? या समाज, परिवार और शिक्षा व्यवस्था की सामूहिक विफलता है?
आज शिक्षा का अर्थ ज्ञान, संस्कार और व्यक्तित्व विकास न होकर ऐसा लगता है, जैसे कि प्रतियोगिता, रैंक, पैकेज और प्रतिष्ठा का पर्याय बन चुका है। बच्चों के कंधों पर इतना भारी बोझ डाल दिया गया है कि वे अपनी उम्र के सहज आनंद, खेल, जिज्ञासा और रचनात्मकता से दूर होते जा रहे हैं। विद्यालयों के बाद कोचिंग संस्थानों का दबाव, परीक्षा का भय, करियर की अनिश्चितता और अभिभावकों की अपेक्षाएं मिलकर बच्चों को मानसिक रूप से थका रही हैं।
बच्चों के सामने भावनात्मक अकेलेपन का संकट भी उभरकर सामने आया है। यही कारण है कि अनेक छात्र अवसाद, चिंता, बाइपोलर डिसऑर्डर और भावनात्मक तनाव से जूझ रहे हैं, किंतु दुखद है कि समय रहते उनकी स्वास्थ्य समस्याओं की पहचान तक नहीं हो पाती है! यदि बच्चा उदास है, चिड़चिड़ा है या अकेला रहने लगा है, तो इसे “जिद” या “कमजोरी” मान लिया जाता है। हमारे समाज में मानसिक स्वास्थ्य को अब भी गंभीरता से नहीं लिया जाता।
दूसरी ओर सच यह भी है कि बच्चा सबसे अधिक भय “असफल” कहलाने से महसूस करता है। उसे यह समझाया ही नहीं जाता कि जीवन में सफलता के अनेक रास्ते होते हैं। विद्यालयों और घरों में बच्चों को बार-बार तुलना का सामना करना पड़ता है। धीरे-धीरे बच्चा स्वयं को अंक और उपलब्धियों से मापने लगता है। जब अपेक्षाओं और वास्तविकता के बीच दूरी बढ़ती है, तब वह भीतर से टूटने लगता है।
ऐसे में यह जरूरी हो गया है कि अभिभावक सबसे पहले यह समझें कि हर बच्चा अलग होता है। सभी बच्चों की क्षमता, रुचि और गति समान नहीं हो सकती। सफलता का अर्थ मेडिकल, इंजीनियरिंग या प्रशासनिक सेवा नहीं है। यदि बच्चा संगीत, खेल, कला, लेखन, डिजाइन, कृषि या किसी अन्य क्षेत्र में रुचि रखता है, तो उसे उसी दिशा में आगे बढ़ने का अवसर मिलना चाहिए।
अत: आवश्यकता इस बात की है कि अभिभावक बच्चों के साथ समय बिताएं। सिर्फ स्कूल की फीस भर देना या अच्छे कोचिंग संस्थान में भेज देने से उनकी जिम्मेदारी पूरी नहीं हो जाती है। बच्चों को सबसे अधिक जरूरत अपने माता-पिता के विश्वास, संवाद और भावनात्मक सहारे की होती है। यदि बच्चा डर, तनाव या असफलता की बात कह रहा है, तो उसे डांटने के बजाय सुने।
विद्यालयों और शिक्षकों की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। माना कि विद्यालय पढ़ाई का केंद्र है, किंतु यह भी सच है कि बच्चों के भावनात्मक विकास का भी वह एक स्थान है, इसलिए यह जरूरी है कि हर विद्यालय में प्रशिक्षित काउंसलर होने चाहिए। शिक्षकों को यह प्रशिक्षण दिया जाए कि वे बच्चों में तनाव और अवसाद के शुरुआती संकेत पहचान सकें। अनुशासन और परिणाम पर ध्यान देने के बजाय बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य को भी प्राथमिकता दें।
इसके साथ ही समाज की भी बड़ी जिम्मेदारी है। आज समाज को यह स्वीकार करना होगा कि बच्चों की जिंदगी किसी परीक्षा या प्रतिशत से कहीं अधिक मूल्यवान है। यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह भी है कि बच्चों को यह एहसास दिलाया जाए कि उनका जीवन किसी भी परीक्षा से बड़ा है। असफलता अंत नहीं होती। हार जीवन का स्वाभाविक हिस्सा है।
कुल मिलाकर शिक्षा के अतिरिक्त बोझ से बच्चों को बाहर निकालने का अतिरिक्त श्रम स्कूल, अभिभावक, शिक्षक, समाज और व्यवस्था सभी को मिलकर आज करने की आवश्यकता है। तभी बच्चे किसी भी प्रकार के डर से बाहर निकल पाएंगे और एक नए आत्म-विश्वास में जी सकेंगे। यदि हम अब भी नहीं चेते, तो आने वाले वर्षों में आंकड़े और भयावह हो सकते हैं। उम्मीद है, हम सभी राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के सामने आए इन आंकड़ों पर गंभीर विचार अवश्य करेंगे और समाधान की दिशा में आगे आएंगे। कोई भी बच्चा आत्म-हत्या जैसा कदम न उठाए, हमारे सामूहिक प्रयास इसी दिशा में होने चाहिए ।
(लेखिका मध्य प्रदेश बाल अधिकार संरक्षण आयोग की अध्यक्ष हैं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी

