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प्राकृतिक संसाधन: सृष्टि की साझा धरोहर, मानवता का नैतिक न्यास दायित्व

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प्राकृतिक संसाधन: सृष्टि की साझा धरोहर, मानवता का नैतिक न्यास दायित्व


कैलाश चन्द्र

पृथ्वी पर उपलब्ध प्राकृतिक संसाधन जल, वायु, वन, खनिज, मिट्टी, जीव–जंतु और ऊर्जा स्रोत मानवता की निजी संपत्ति न होकर संपूर्ण सृष्टि की साझा धरोहर हैं। यह विचार केवल नैतिक आग्रह नहीं है, बल्कि पृथ्वी के भूगर्भीय इतिहास, जैविक विकास और आधुनिक वैज्ञानिक समझ का गहन निष्कर्ष है। विज्ञान स्पष्ट करता है कि जिन ऊर्जा स्रोतों पर आधुनिक सभ्यता आधारित है, वे मानव जीवन की समय-सीमा में पुनः निर्मित नहीं हो सकते। पेट्रोलियम को बनने में पांच से 30 करोड़ वर्ष, कोयले को तीन से 40 करोड़ वर्ष और प्राकृतिक गैस को करोड़ों वर्षों का समय लगता है। पृथ्वी की विशाल प्रयोगशाला ने जिन्हें युगों में निर्मित किया, उन्हें मनुष्य यदि कुछ वर्षों के युद्ध, संघर्ष या लालच में नष्ट कर दे, तो यह न केवल वैज्ञानिक दृष्टि से मूर्खता है बल्कि नैतिक रूप से भी गंभीर अन्याय है।

भारतीय चिंतन इस सत्य को प्राचीन काल से ही स्वीकार करता आया है। ‘अथर्ववेद’ में कहा गया है “माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः”। अर्थात पृथ्वी हमारी माता है और हम उसके पुत्र हैं। इसका स्पष्ट अर्थ है कि पृथ्वी के उपहार किसी एक समाज, राष्ट्र या पीढ़ी तक सीमित नहीं हैं, बल्कि समस्त जीव जगत के लिए समान रूप से हैं। उपनिषद का वाक्य “ईशावास्यमिदं सर्वं” इसी भावना को और व्यापक बनाता है। यह सम्पूर्ण जगत किसी का निजी स्वामित्व नहीं, बल्कि साझा अस्तित्व है। आधुनिक भाषा में इसे वैश्विक साझा संसाधन कहा जा सकता है, जहाँ संसाधन किसी के स्वामित्व में नहीं बल्कि सबके उपयोग के लिए होते हैं।

इसी आधार पर प्राकृतिक संसाधनों पर एकाधिकार का विचार मूलतः अमानवीय है। मनुष्य अधिकतम स्वयं को इन संसाधनों का संरक्षक और न्यासी कह सकता है। उसके पास उपयोग का अधिकार है, स्वामित्व का नहीं। एक न्यासी संसाधनों का संरक्षण करता है, उनका विनाश नहीं करता। वर्तमान विश्व व्यवस्था ने इस मूलभूत सत्य को पीछे छोड़ दिया है। देखा यह जा रहा है कि जो संसाधन मानवता की सामूहिक धरोहर थे, वे अब संपत्ति, राजनीतिक शक्ति, भू रणनीतिक हथियार और औद्योगिक लाभ के साधन बन गए हैं। पश्चिम एशिया में तेल कुओं पर हमले, रूस यूक्रेन संघर्ष में गैस पाइपलाइन का टूटना या अफ्रीका में खनिज क्षेत्रों को लेकर गृहयुद्ध, ये सभी घटनाएँ केवल स्थानीय नहीं बल्कि वैश्विक प्रभाव डालती हैं।

तेल महंगा होता है, परिवहन लागत बढ़ती है, बिजली दरें ऊँची होती हैं और खाद्य संकट गहराता है। अंततः सबसे अधिक पीड़ा उस सामान्य जन को झेलनी पड़ती है जिसने न युद्ध किया और न संसाधनों का दुरुपयोग किया। यह वैश्विक अन्याय का विकृत स्वरूप है। प्राकृतिक संसाधनों की हानि केवल आर्थिक संकट तक सीमित नहीं रहती, बल्कि पारिस्थितिक संतुलन को भी प्रभावित करती है। एक जंगल के कटने से वर्षा चक्र, मिट्टी की उर्वरता, जल संचयन और वन्य जीवन सब प्रभावित होते हैं। समुद्र में तेल रिसाव से केवल समुद्री जीवन नहीं, बल्कि वैश्विक ताप वृद्धि और जलवायु संकट भी उत्पन्न होता है।

जल प्रदूषण एक नदी को नहीं, बल्कि उससे जुड़े संपूर्ण जीवन तंत्र को प्रभावित करता है। इसलिए यह कहना अधूरा है कि संसाधनों की हानि केवल एक राष्ट्र की हानि है। वास्तविकता यह है कि यह पूरी सृष्टि की हानि है। भारतीय दर्शन इस व्यापक दृष्टि को वसुधैव कुटुम्बकम् के रूप में प्रस्तुत करता है। इसका अर्थ है कि पृथ्वी एक परिवार है और संसाधनों का उपयोग समानता, संयम और कल्याण के आधार पर होना चाहिए।

आधुनिक पर्यावरण दर्शन भी इसी को पर्यावरणीय न्याय के रूप में स्वीकार करता है, जिसमें संसाधनों का समान उपयोग, समान उपलब्धता और समान संरक्षण आवश्यक माना गया है, किन्तु वर्तमान विश्व इस मार्ग से भटक गया है। संसाधनों से सम्पन्न देश उन्हें शक्ति और दबाव के साधन के रूप में प्रयोग करते हैं, जबकि निर्भर देश असुरक्षित और अस्थिर बने रहते हैं। यह केवल आर्थिक नहीं, बल्कि नैतिक असमानता भी है।

यदि किसी देश या क्षेत्र को अधिक संसाधन प्राप्त हैं, तो उसका प्रथम दायित्व उनका संरक्षण होना चाहिए न कि उनका शोषण। भारतीय परंपरा प्रकृति को माता मानती है और सिखाती है कि संसाधनों का उपयोग संयम और सह अस्तित्व के साथ किया जाए। यह दर्शन हमें अधिक उपभोग नहीं, बल्कि सतत और संतुलित उपभोग का मार्ग दिखाता है। मानवता को यदि संसाधनों को लेकर संघर्ष समाप्त करना है, तो उसे यह समझना होगा कि वह पृथ्वी का स्वामी नहीं, बल्कि संरक्षक है।

महात्मा गांधी द्वारा प्रतिपादित न्यास सिद्धांत भी यही बताता है कि संपत्ति का उपयोग लोकहित में होना चाहिए। यही सिद्धांत प्राकृतिक संसाधनों पर भी लागू होता है कि उनका उपयोग सृष्टि हित में हो, न कि स्वार्थ के लिए। यदि किसी क्षेत्र में तेल है तो वह केवल वहाँ के लोगों का नहीं, बल्कि समस्त मानवता का है। यदि किसी देश में वन हैं, तब वे पूरे पृथ्वी के पर्यावरण संतुलन का आधार हैं। यदि किसी नदी का स्रोत किसी देश में है, तब उसका जल संपूर्ण पारिस्थितिक तंत्र का है, इसलिए संसाधनों पर एकाधिकार की सोच सीमित और स्वार्थपूर्ण है। इसके विपरीत, भारतीय दर्शन सिखाता है कि सृष्टि की रक्षा ही मानवता की रक्षा है।

यह समझ लीजिए कि प्रकृति की समृद्धि में ही सभ्यता का भविष्य निहित है और संसाधनों की समानता में ही विश्व कल्याण संभव है। अत: आज आवश्यकता है कि वैश्विक समाज इस सत्य को स्वीकार करे कि पृथ्वी की धरोहर का संरक्षण, संतुलित उपयोग और न्यायपूर्ण वितरण हम सबका साझा दायित्व है। यही दृष्टि आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित और संतुलित संसार प्रदान कर सकती है। संसाधन पृथ्वी के हैं, हम केवल उनके संरक्षक हैं और संरक्षक का धर्म संरक्षण है, शोषण नहीं। इसी में विश्व कल्याण, वैश्विक शांति और मानवता के उज्ज्वल भविष्य की सबसे सुदृढ़ आधारशिला निहित है।

(लेखक, सामाजिक कार्यकर्ता एवं स्तम्भकार हैं।)

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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी