स्वस्थ भारत की दिशा में शुभ संकेत है प्राकृतिक खेती का बढ़ना !
- डॉ. मयंक चतुर्वेदी
भारत की कृषि क्रांति आज उत्पादन सफलता की वो कहानी कह रही है, जिससे कि विश्व के 150 से अधिक देश लाभान्वित हो रहे हैं, ऐसे में अब प्रश्न यह है कि जो अन्न हमारी थाली तक पहुंच रहा है, वह कितना सुरक्षित है, कितना पौष्टिक है और आने वाली पीढ़ियों के स्वास्थ्य को कितना सशक्त बना सकेगा।
वस्तुत: पिछले कई दशकों में रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के अंधाधुंध प्रयोग ने कृषि उत्पादन में अभूतपूर्व वृद्धि तो की, किंतु इसके साथ ही मिट्टी की उर्वरता, जल स्रोतों की गुणवत्ता, जैव विविधता और मानव स्वास्थ्य पर गंभीर प्रश्न भी खड़े कर दिए। कैंसर, हार्मोनल असंतुलन, मधुमेह, एलर्जी और अनेक गैर-संचारी रोगों के बढ़ते मामलों के बीच अब पूरी दुनिया टिकाऊ और प्राकृतिक कृषि की ओर लौट रही है, जिसमें कि भारत इसी परिवर्तन का नेतृत्व करता दिखाई दे रहा है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पिछले बारह वर्षों में प्राकृतिक खेती को स्वस्थ किसान, स्वस्थ मिट्टी, स्वस्थ पर्यावरण और स्वस्थ भारत के राष्ट्रीय अभियान के रूप में स्थापित करने का प्रयास हुआ है। यही कारण है कि आज प्राकृतिक खेती का बढ़ता दायरा देश के भविष्य की नई दिशा का संकेत बन गया है।
बारह वर्षों में बदली कृषि विकास की सोच
वर्ष 2014 के बाद केंद्र सरकार ने कृषि नीति को उत्पादन-केंद्रित दृष्टिकोण से बाहर निकालना आरंभ कर दिया था। उद्देश्य यह रखा गया कि कृषि स्वास्थ्य लाभ के वैज्ञानिक नजरिए से हो। कहना होगा कि इसका पहला बड़ा कदम वर्ष 2015 में शुरू की गई मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना थी। पहली बार किसानों को उनकी भूमि की वास्तविक स्थिति का वैज्ञानिक विश्लेषण उपलब्ध कराया गया, जिससे यह स्पष्ट हो सके कि खेत को वास्तव में किन पोषक तत्वों की आवश्यकता है। तब परिणाम में दिखा कि इससे उर्वरकों के अंधाधुंध उपयोग पर नियंत्रण संभव हुआ और संतुलित पोषण की संस्कृति विकसित होने लगी।
आज इसका प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। केंद्र सरकार के अनुसार 25.89 करोड़ से अधिक मृदा स्वास्थ्य कार्ड जारी किए जा चुके हैं जोकि करोड़ों किसानों तक वैज्ञानिक कृषि ज्ञान पहुंचाने का सबसे बड़ा अभियान बन चुका है। इससे संतुलित उर्वरक उपयोग से जहां खेती की लागत कम हुई है, वहीं मिट्टी की जैविक गुणवत्ता में सुधार और दीर्घकालिक उत्पादकता बढ़ाने का मार्ग भी प्रशस्त हुआ है।
प्राकृतिक खेती अब राष्ट्रीय अभियान है
प्राकृतिक खेती को प्रारंभिक प्रयोगों से निकालकर व्यापक जनभागीदारी वाले कार्यक्रम का स्वरूप देने के लिए केंद्र सरकार ने नेशनल मिशन ऑन नेचुरल फार्मिंग को गति प्रदान की है। ताजा सरकारी आंकड़ों पर नजर डालें तो दिखाई यही देता है कि यह मिशन अब 18,786 क्लस्टरों तक पहुंच चुका है, जो 8.80 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को कवर करते हैं। देश के अनेक राज्यों में लाखों किसान प्राकृतिक खेती, जैविक खेती अथवा कम-रासायनिक कृषि पद्धतियों को अपना रहे हैं।
विशेष रूप से आंध्र प्रदेश की सामुदायिक प्राकृतिक खेती, हिमाचल प्रदेश की प्राकृतिक कृषि खुशहाल किसान योजना, गुजरात, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के विभिन्न मॉडल यह सिद्ध कर रहे हैं कि यदि नीति सही दिशा में हो, प्रशिक्षण और बाजार का उचित सहयोग मिलना आरंभ हो जाए तो किसान स्वेच्छा से रसायन आधारित खेती से बाहर निकलने को तैयार हैं, इसीलिए ही आज प्राकृतिक खेती राष्ट्रीय कृषि विमर्श का केंद्रीय विषय बन चुकी है।
मिट्टी की सेहत सुधरेगी, तभी भोजन बनेगा अमृत
भारतीय परंपरा में धरती को माता कहा गया है। यदि माता ही बीमार होगी तो उससे प्राप्त अन्न भी पूर्णतः पोषक नहीं हो सकता। यही वैज्ञानिक सत्य आज आधुनिक कृषि विज्ञान भी स्वीकार कर रहा है। मिट्टी में जैविक कार्बन, सूक्ष्म पोषक तत्व और लाभकारी जीवाणुओं की पर्याप्त मात्रा ही गुणवत्तापूर्ण खाद्यान्न की आधारशिला है।
इसी उद्देश्य से सरकार ने एग्रीकल्चरल टेक्नोलॉजी मैनेजमेंट एजेंसियों (आत्मा) और कृषि विज्ञान केंद्रों (केवीके) के माध्यम से अब तक करीब 7.17 लाख प्रदर्शन कार्यक्रम आयोजित किए हैं। इन कार्यक्रमों के माध्यम से किसानों को प्राकृतिक खेती, जैविक पोषण, सूक्ष्म पोषक तत्वों के संतुलित उपयोग और जल संरक्षण की तकनीकों का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। इसके साथ ही 70,002 कृषि सखियों को प्रशिक्षित किया जा चुका है, जो गांव-गांव जाकर किसानों को मिट्टी के स्वास्थ्य और प्राकृतिक कृषि के प्रति जागरूक बना रही हैं।
सरकार ने यह भी समझा है कि कृषि सुधार सिर्फ किसानों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, इसलिए स्कूल सॉइल हेल्थ प्रोग्राम के अंतर्गत वर्ष 2025-26 में 4,430 विद्यालयों तथा 1,29,167 विद्यार्थियों को इस अभियान से जोड़ा गया है। यह आने वाली पीढ़ी को प्रकृति और कृषि के बीच के संबंध को समझाने की दूरदर्शी पहल है।
स्वास्थ्य की रक्षा का सबसे प्रभावी माध्यम
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ), खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ), भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) तथा भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) समय-समय पर यह संकेत देते रहे हैं कि कृषि रसायनों का विवेकपूर्ण उपयोग अत्यंत आवश्यक है। अनेक वैज्ञानिक अध्ययनों में यह पाया गया है कि कीटनाशकों के अत्यधिक और लंबे समय तक संपर्क में रहने वाले लोगों में कुछ प्रकार के कैंसर, तंत्रिका तंत्र संबंधी विकार, हार्मोनल असंतुलन तथा प्रजनन संबंधी समस्याओं का जोखिम बढ़ सकता है। यद्यपि किसी एक बीमारी का कारण अकेला भोजन नहीं होता, फिर भी सुरक्षित, कम-रासायनिक और अवशेष-मुक्त खाद्य पदार्थ बेहतर सार्वजनिक स्वास्थ्य की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
यही कारण है कि प्राकृतिक खेती आज किसानों की आय बढ़ाने का माध्यम तो बन ही रही है, पर इससे अधिक यह देश के करोड़ों नागरिकों को सुरक्षित भोजन उपलब्ध कराने का भी सशक्त अभियान बनती जा रही है। जब खेतों में रासायनिक उर्वरकों और जहरीले कीटनाशकों की निर्भरता घटेगी, तब थाली तक पहुंचने वाला अन्न भी अधिक प्राकृतिक, अधिक पौष्टिक और अधिक सुरक्षित होगा। यही स्वस्थ भारत की सबसे मजबूत नींव है, जिसकी ओर तेजी से इन दिनों भारत चलता हुआ नजर आ रहा है।
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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी

