राष्ट्रीय हित बनाम वैश्विक प्रतिबद्धता : जब दुनिया की बड़ी ताकतें अंतरराष्ट्रीय समझौतों से बाहर निकल गईं
- अमरेश द्विवेदी
दुनिया की राजनीति में एक प्रसिद्ध कथन है- राष्ट्रों के स्थायी मित्र या शत्रु नहीं होते बल्कि उनके स्थायी हित होते हैं। अंतरराष्ट्रीय कूटनीति का इतिहास इस कथन की अनेक बार पुष्टि करता है। जब भी किसी वैश्विक संधि, समझौते या अंतरराष्ट्रीय संगठन की सदस्यता किसी देश को अपने आर्थिक, सामरिक या राजनीतिक हितों के विरुद्ध लगती है तो वह उससे अलग होने या उसकी शर्तों को बदलने का प्रयास करता है।
पिछले चार दशकों में अमेरिका, रूस, ब्रिटेन और अन्य बड़ी शक्तियों ने कई ऐसे फैसले लिए हैं, जिन्होंने वैश्विक राजनीति की दिशा बदल दी। इनमें जलवायु परिवर्तन, परमाणु हथियार नियंत्रण, व्यापार, मानवाधिकार और स्वास्थ्य जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र शामिल हैं। हाल के वर्षों, विशेषकर 2025 और 2026 के घटनाक्रमों ने भी यह स्पष्ट कर दिया है कि वैश्विक संस्थाओं की शक्ति उतनी ही मजबूत होती है, जितनी सदस्य देशों की राजनीतिक इच्छा।
पेरिस जलवायु समझौता : बदलती सरकार, बदलती नीति
2015 का पेरिस जलवायु समझौता दुनिया के लगभग सभी देशों के बीच जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए हुआ था। लेकिन 2017 में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने यह कहते हुए इससे बाहर निकलने की घोषणा की कि यह समझौता अमेरिकी उद्योगों और रोजगार के लिए नुकसानदायक है तथा चीन और भारत जैसे देशों को अनुचित लाभ देता है। 2021 में राष्ट्रपति जो बाइडेन ने अमेरिका की दोबारा वापसी कराई और जलवायु परिवर्तन को अपनी प्राथमिकताओं में शामिल किया। लेकिन 2025 में ट्रंप प्रशासन की वापसी के बाद अमेरिका ने एक बार फिर पेरिस समझौते से हटने की प्रक्रिया शुरू कर दी। इससे यह स्पष्ट हो गया कि दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था की जलवायु नीति घरेलू राजनीति से गहराई से प्रभावित होती है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन से दूरी
कोविड-19 महामारी के दौरान अमेरिका ने विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) पर चीन के प्रति पक्षपात का आरोप लगाया और संगठन से बाहर निकलने की प्रक्रिया शुरू की थी। बाद में बाइडेन प्रशासन ने इसे वापस ले लिया। हालांकि, 2025 में ट्रंप प्रशासन ने दोबारा अमेरिका को डब्ल्यूएचओ से बाहर करने का निर्णय लिया। अमेरिका का तर्क था कि संगठन में व्यापक सुधार की आवश्यकता है और वर्तमान व्यवस्था अमेरिकी हितों के अनुरूप नहीं है। इस फैसले ने वैश्विक स्वास्थ्य सहयोग को लेकर नई बहस छेड़ दी।
ईरान परमाणु समझौता
राष्ट्रपति डाेनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका 2015 के 'जॉइंट कॉम्प्रिहेंसिव प्लान ऑफ़ एक्शन' (जेसीपीओए) से 2018 में एकतरफ़ा तौर पर खुद को अलग कर लिया और दूसरे हस्ताक्षरकर्ताओं (ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, रूस, चीन और यूरोपीय संघ) के विरोध के बावजूद फिर से ईरान पर प्रतिबंध लगा दिए। अमेरिका का तर्क था कि यह डील बुनियादी तौर पर खराब थी। ट्रंप ने इसे अबतक का सबसे खराब डील कहा। अमेरिका का कहना है कि इसमें ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल प्रोग्राम, क्षेत्रीय प्रॉक्सी गतिविधियों और सनसेट क्लॉज़ (समय-सीमा वाली शर्तें) जैसे मुद्दों को ठीक से नहीं सुलझाया गया था, जिनकी वजह से ईरान को आगे चलकर एडवांस्ड न्यूक्लियर काम फिर से शुरू करने की इजाज़त मिल जाती। ट्रंप इसे एक बुरा सौदा मानते थे जिससे ईरान तो मजबूत हुआ लेकिन उसके न्यूक्लियर इरादों या अमेरिका के सहयोगियों पर कोई खास रोक नहीं लगी। इसे एक राजनीतिक प्रतिबद्धता माना गया जिसका लागू होना अमेरिका की इच्छाशक्ति पर निर्भर था। मौका देखकर अमेरिका इस डील से बाहर निकल गया। 2025-2026 में इसी मुद्दे को लेकर भयंकर युद्ध हुआ है।
आईएनएफ संधि का अंत
अमेरिका ही नहीं दुनिया के दूसरे देश भी अंतरराष्ट्रीय संधियों का अपनी सुविधा के अनुसार व्याख्या करते रहे हैं। 1987 में अमेरिका और सोवियत संघ (अब रूस) के बीच एक समझौता हुआ। यह एक परमाणु नियंत्रण समझौता था, इसमें 500 से 5500 किलोमीटर रेंज वाली जमीन से लॉन्च होने वाली मिसाइलों को पूरी तरह प्रतिबंधित किया गया था। यह शीत युद्ध को कम करने वाला ऐतिहासिक समझौता था। इसके बावजूद दोनों देश अपने मिशन पर गुप्त रूप से लगे रहे। अमेरिका ने 2019 में अपनी ज़िम्मेदारियों से पीछ हट गया। फिर रूस ने भी ऐसा ही किया। इसके बाद 'इंटरमीडिएट-रेंज न्यूक्लियर फोर्सेस ट्रीटी' खत्म हो गई।
अमेरिका ने रूस पर संधि का गंभीर उल्लंघन करने का आरोप लगाया और कहा कि रूस प्रतिबंधित 9एम729/एसएससी-8 मिसाइल बना रहा है। रूस ने तर्क दिया कि अमेरिका/नाटो की गतिविधियों (जैसे यूरोप में मिसाइल डिफेंस सिस्टम) और सुरक्षा के बदलते माहौल के कारण यह संधि अब पुरानी हो चुकी है। चीन द्वारा बिना किसी रोक-टोक के इंटरमीडिएट-रेंज मिसाइलें बनाई जा रही हैं। इसलिए अब इस संधि का कोई मतलब नहीं है। यानी इस संधि को लेकर किसी देश की प्रतिबद्धता नहीं थी। दोनों पक्षों ने संधि का पालन करना बंद कर दिया, जिससे यह संधि खत्म हो गई।
ओपन स्काइज संधि
ओपन स्काइज संधि का उद्देश्य सदस्य देशों के बीच सैन्य गतिविधियों में पारदर्शिता बढ़ाना था। इसके तहत सदस्य देश एक-दूसरे के ऊपर निगरानी उड़ानें भर सकते थे। 2020 में अमेरिका ने इस संधि से हटने की घोषणा की। कुछ समय बाद रूस भी इससे अलग हो गया। परिणामस्वरूप शीतयुद्ध के बाद स्थापित विश्वास निर्माण की एक महत्वपूर्ण व्यवस्था समाप्त हो गई।
यूनेस्को और संयुक्त राष्ट्र संस्थाओं से अमेरिका की दूरी
अमेरिका कई बार संयुक्त राष्ट्र की विभिन्न संस्थाओं से बाहर निकल चुका है। 1984 में उसने यूनेस्को छोड़ा, बाद में लौटा और फिर 2017 में दोबारा बाहर निकल गया। इसके पीछे वित्तीय बोझ और राजनीतिक पक्षपात जैसे कारण बताए गए। बाद के वर्षों में अमेरिका फिर संगठन में शामिल हुआ। इससे यह स्पष्ट होता है कि अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के साथ संबंध अक्सर सरकारों के बदलने के साथ बदलते रहते हैं।
रूस और यूरोपीय सुरक्षा व्यवस्था
यूक्रेन युद्ध के बाद रूस और पश्चिमी देशों के संबंधों में अभूतपूर्व तनाव आया। रूस ने 2023 में यूरोप की पारंपरिक सशस्त्र बल संधि (सीएफई) से हटने की घोषणा की। मॉस्को का कहना था कि नाटो के लगातार विस्तार ने इस संधि को अप्रासंगिक बना दिया है। रूस ने यूरोप की कई अन्य व्यवस्थाओं और संस्थागत ढांचों से भी दूरी बनाई। दूसरी ओर पश्चिमी देशों ने रूस पर अंतरराष्ट्रीय कानूनों के उल्लंघन का आरोप लगाया।
ब्रिटेन और ब्रेक्जिट
ब्रेक्जिट आधुनिक इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाओं में गिना जाता है। 2016 के जनमत संग्रह में ब्रिटिश जनता ने यूरोपीय संघ छोड़ने के पक्ष में मतदान किया और 2020 में ब्रिटेन औपचारिक रूप से यूरोपीय संघ से बाहर हो गया। ब्रेक्जिट समर्थकों का तर्क था कि इससे ब्रिटेन अपनी सीमाओं, कानूनों, व्यापार और आव्रजन नीति पर पूर्ण नियंत्रण प्राप्त करेगा। जबकि आलोचकों का मानना था कि इससे व्यापार, निवेश और श्रम बाजार पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।
चीन की अलग रणनीति
चीन बहुत कम अवसरों पर किसी अंतरराष्ट्रीय समझौते से पूरी तरह बाहर निकला है। फ़िलीपींस की ओर से लाए गए एक मामले में यूएनसीएलओएस (समुद्र के कानून पर संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन) ने चीन के खिलाफ फैसला सुनाया और दक्षिण चीन सागर में चीन की ओर से कृत्रिम द्वीप बनाने को गलत करार दिया। चीन ने इस फैसले को पूरी तरह से खारिज कर दिया। चीन ने कभी भी ट्रिब्यूनल के अधिकार क्षेत्र को स्वीकार नहीं किया। उसका तर्क था कि इस विवाद में संप्रभुता का मामला शामिल है, जिस पर ट्रिब्यूनल कोई फैसला नहीं दे सकता है और द्विपक्षीय बातचीत ही सही रास्ता है। उसने इस फैसले को गैर-कानूनी और राजनीतिक मकसद से प्रेरित माना और कहा कि यह उसकी निर्विवाद क्षेत्रीय संप्रभुता और समुद्री अधिकारों पर बाध्यकारी नहीं है। इसके बावजूद चीन ने अपनी गतिविधियां जारी रखीं।
इसके अलावा उसकी नीति आमतौर पर अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के भीतर रहते हुए अपने प्रभाव को बढ़ाने की रही है। इसके साथ ही चीन ने एशियन इंफ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक (एआईआईबी), बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) और ब्रिक्स जैसे मंचों को मजबूत कर वैश्विक आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था में अपनी भूमिका का विस्तार किया है। यानी चीन समझौतों से बाहर निकलने की बजाय समानांतर संस्थागत ढांचे विकसित करने पर अधिक जोर देता है।
व्यापारिक समझौतों से पीछे हटने की प्रवृत्ति
अमेरिका ने केवल सुरक्षा और पर्यावरण ही नहीं बल्कि व्यापारिक समझौतों में भी राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता दी है। ट्रांस-पैसिफिक पार्टनरशिप (टीपीपी) से अमेरिका का बाहर निकलना इसका बड़ा उदाहरण है। अमेरिका का मानना था कि इस समझौते से घरेलू विनिर्माण क्षेत्र को नुकसान होगा।
इसी तरह कई देशों ने विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के नियमों पर भी सवाल उठाए हैं और अपने उद्योगों की सुरक्षा के लिए संरक्षणवादी नीतियां अपनाई हैं। इससे वैश्विक मुक्त व्यापार व्यवस्था को नई चुनौतियों का सामना करना पड़ा।
क्या अंतरराष्ट्रीय समझौते कमजोर हो रहे हैं?
विशेषज्ञों का मानना है कि आज की दुनिया बहुध्रुवीय होती जा रही है। अमेरिका, चीन, रूस, यूरोपीय संघ, भारत और अन्य क्षेत्रीय शक्तियां अपने-अपने हितों के अनुसार नीतियां बना रही हैं। ऐसे में किसी भी अंतरराष्ट्रीय समझौते की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि वह सभी प्रमुख देशों के हितों के बीच संतुलन स्थापित कर सके।
यदि किसी देश को लगता है कि समझौते का आर्थिक बोझ अधिक है, सुरक्षा जोखिम बढ़ रहे हैं या उसकी संप्रभुता प्रभावित हो रही है तो उसके बाहर निकलने की संभावना बढ़ जाती है। यही कारण है कि अब केवल समझौते पर हस्ताक्षर पर्याप्त नहीं है बल्कि उन्हें समय-समय पर बदलती परिस्थितियों के अनुरूप ढालना भी आवश्यक हो गया है।
भारत की संतुलित नीतिभारत और पाकिस्तान ने 1947 में स्वतंत्रता प्राप्त की। दो साल बाद, दोनों देशों को साझा सिंधु नदी बेसिन के आधार पर गंभीर प्रबंधन चुनौतियों का सामना करना पड़ा। जलविद्युत ऊर्जा योजनाओं का समर्थन करने के अलावा नदी सिंचाई की जरूरतों को पूरा करती है। यह दोनों देशों में उपभोग के उद्देश्यों के लिए सीधे पानी की आपूर्ति भी करती है। इसके तुरंत बाद डायवर्जन के मुद्दे सामने आते हैं और संभावित डायवर्जन पर संघर्ष मंडराता रहता है। मुद्दे की गंभीरता को देखते हुए, विश्व बैंक ने दोनों देशों के बीच बैठक की मध्यस्थता की। लंबी चर्चा के बाद, सिंधु जल संधि पर भारत और पाकिस्तान के बीच 19 सितंबर, 1960 को हस्ताक्षर किए गए थे। इसने पानी के शांतिपूर्ण और समान विभाजन और नियंत्रण का मार्ग प्रशस्त किया।
बावजूद इसके भारत ने अधिकांश वैश्विक समझौतों में संतुलित और व्यावहारिक नीति अपनाई है। आमतौर पर भारत बहुपक्षवाद का समर्थन करता है लेकिन किसी भी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में अपने राष्ट्रीय हितों से समझौता नहीं करता। जलवायु परिवर्तन, व्यापार, डिजिटल अर्थव्यवस्था और वैश्विक दक्षिण के मुद्दों पर भारत लगातार स्पष्ट करता रहा है कि विकासशील देशों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखे बिना कोई भी वैश्विक व्यवस्था टिकाऊ नहीं हो सकती।
अंतरराष्ट्रीय समझौतों का उद्देश्य वैश्विक सहयोग, शांति और स्थिरता को बढ़ावा देना है लेकिन वास्तविकता यह है कि प्रत्येक देश अंततः अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता देता है। अमेरिका का पेरिस जलवायु समझौते और डब्ल्यूएचओ से बाहर निकलना, रूस का हथियार नियंत्रण संधियों से हटना, ब्रिटेन का यूरोपीय संघ छोड़ना और चीन का वैकल्पिक वैश्विक संस्थानों को बढ़ावा देना- ये सभी उदाहरण बताते हैं कि आज की विश्व राजनीति में आदर्शवाद से अधिक यथार्थवाद प्रभावी है।
फिर भी जलवायु परिवर्तन, महामारी, आतंकवाद, साइबर सुरक्षा और परमाणु प्रसार जैसी चुनौतियां किसी एक देश की सीमा तक सीमित नहीं हैं। इसलिए राष्ट्रीय हितों की रक्षा के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय सहयोग बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक है। आने वाले वर्षों में विश्व व्यवस्था की स्थिरता इस बात पर निर्भर करेगी कि बड़ी शक्तियां प्रतिस्पर्धा और सहयोग के बीच कितना संतुलन स्थापित कर पाती हैं।(लेखक, हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / अमरेश द्विवेदी

