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नामत्सो: तिब्बत की 'स्वर्गीय झील', जहां प्रकृति, आस्था और संस्कृति का अद्भुत संगम

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नामत्सो: तिब्बत की 'स्वर्गीय झील', जहां प्रकृति, आस्था और संस्कृति का अद्भुत संगम


ओमप्रकाश सिंह

तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र में ल्हासा से लगभग 240 किलोमीटर उत्तर-पश्चिम स्थित नामत्सो झील केवल एक प्राकृतिक जलाशय नहीं बल्कि तिब्बती संस्कृति, बौद्ध आस्था और वैज्ञानिक शोध का महत्वपूर्ण केंद्र है। तिब्बती भाषा में 'ग्नाम त्सो' कहलाने वाली इस झील का अर्थ 'स्वर्गीय झील' है। इसे तिब्बत की सबसे पवित्र झीलों में गिना जाता है और हर वर्ष हजारों श्रद्धालु यहां आध्यात्मिक साधना और तीर्थयात्रा के लिए पहुंचते हैं।

समुद्र तल से करीब 4,718 मीटर की ऊंचाई पर स्थित नामत्सो दुनिया की सबसे ऊंचाई पर स्थित बड़ी खारे पानी की झीलों में शामिल है। लगभग 1,920 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैली यह झील करीब 70 किलोमीटर लंबी और 30 किलोमीटर चौड़ी है। इसकी अधिकतम गहराई लगभग 125 मीटर है। झील को मुख्य रूप से न्येनचेन तांगला पर्वतमाला से आने वाले हिमनदों के पिघले पानी और मौसमी जलधाराओं से जल मिलता है।

नामत्सो का प्राकृतिक सौंदर्य इसे एशिया के सबसे आकर्षक स्थलों में स्थान दिलाता है। नीले जल, बर्फ से ढंके पर्वत, विस्तृत घास के मैदान और गर्मियों में खिलने वाले जंगली फूल यहां की पहचान हैं। सर्दियों में पूरी झील बर्फ की मोटी चादर से ढंक जाती है।

कठोर जलवायु के बावजूद यह क्षेत्र जैव विविधता से समृद्ध है। यहां तिब्बती हिरण, कियांग, नीली भेड़, हिमालयी मर्मोट और तिब्बती लोमड़ी जैसे दुर्लभ वन्यजीव पाए जाते हैं। झील के आसपास की आर्द्रभूमि बार-हेडेड गूज, रड्डी शेलडक, ब्राउन-हेडेड गल और संकटग्रस्त ब्लैक-नेक्ड क्रेन जैसे प्रवासी पक्षियों का भी महत्वपूर्ण आवास है।

नामत्सो सदियों से तिब्बती घुमंतू समुदाय 'द्रोकपा' का निवास क्षेत्र रहा है। इनकी आजीविका याक, भेड़ और बकरियों के पालन पर आधारित है। पारंपरिक याक के बालों से बने तंबू, मक्खन वाली चाय, ऊनी वस्त्र और पशुपालन यहां की सांस्कृतिक पहचान हैं।

तिब्बती बौद्ध धर्म में नामत्सो को चार प्रमुख पवित्र झीलों में गिना जाता है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि झील की परिक्रमा और यहां प्रार्थना करने से पापों का नाश होता है तथा आध्यात्मिक पुण्य की प्राप्ति होती है। लगभग 70 से 80 किलोमीटर लंबी 'नामत्सो कोरा' परिक्रमा को अनेक श्रद्धालु कई दिनों में पैदल पूरी करते हैं, जबकि कुछ श्रद्धालु दंडवत प्रणाम करते हुए पूरी यात्रा संपन्न करते हैं। तिब्बती पंचांग के अनुसार 'भेड़ वर्ष' में, जो हर 12 वर्ष में आता है, यहां हजारों श्रद्धालु एकत्र होते हैं।

बौद्ध धर्म के आगमन से पहले भी यह झील बोन धर्म के अनुयायियों के लिए अत्यंत पवित्र मानी जाती थी। बाद में तिब्बती बौद्ध परंपरा ने इन मान्यताओं को अपने धार्मिक दर्शन में समाहित कर लिया। झील के निकट स्थित न्येनचेन तांगला पर्वत को नामत्सो का दिव्य सहचर माना जाता है।

नामत्सो के द्वीपों और चट्टानों पर स्थित गुफाओं और आश्रमों में बौद्ध भिक्षु लंबे समय तक ध्यान और साधना करते रहे हैं। ऐतिहासिक विवरण बताते हैं कि कई साधक पूरी गर्मियां इन निर्जन द्वीपों पर बिताते थे और सर्दियों में झील जमने के बाद ही वापस लौटते थे।

धार्मिक महत्व के साथ-साथ नामत्सो वैज्ञानिक अनुसंधान का भी प्रमुख केंद्र बन चुका है। नामत्सो मल्टीस्फीयर ऑब्जर्वेशन एंड रिसर्च स्टेशन के वैज्ञानिक यहां जलविज्ञान, जलवायु, हिमनदों और पारिस्थितिकी तंत्र पर लगातार अध्ययन कर रहे हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार तापमान में वृद्धि, वर्षा के बदलते स्वरूप और तेजी से पिघलते हिमनदों का असर झील के जलस्तर और पूरे तिब्बती पठार की जल प्रणाली पर दिखाई दे रहा है।

हाल के वर्षों में पर्यटन बढ़ने से नामत्सो तक पहुंच आसान हुई है। ताशी दोर प्रायद्वीप पर्यटकों के लिए प्रमुख प्रवेश द्वार बन चुका है। हालांकि पर्यटकों की बढ़ती संख्या के कारण कचरा प्रबंधन, प्राकृतिक आवास की सुरक्षा और नाजुक पर्वतीय पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण जैसी चुनौतियां भी सामने आई हैं। क्षेत्रीय प्रशासन ने पर्यटन और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए कई संरक्षण उपाय लागू किए हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि नामत्सो केवल एक झील नहीं, बल्कि तिब्बत की प्राकृतिक विरासत, सांस्कृतिक परंपरा, धार्मिक आस्था और पर्यावरणीय महत्व का जीवंत प्रतीक है। यही कारण है कि यह झील आज भी दुनिया भर के श्रद्धालुओं, पर्यटकों और वैज्ञानिकों के लिए समान रूप से आकर्षण का केंद्र बनी हुई है।

हिन्दुस्थान समाचार / ओम पराशर