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सरकार की कमियों पर सवाल उठाएं, अच्छे कामों पर प्रशंसा भी हो

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सरकार की कमियों पर सवाल उठाएं, अच्छे कामों पर प्रशंसा भी हो


- डॉ. मयंक चतुर्वेदी

सरकार के कामकाज पर सवाल उठाना लोकतंत्र की स्वाभाविक प्रक्रिया है। जनहित से जुड़े विषयों पर कमियां सामने रखना, प्रशासन से जवाब मांगना और व्यवस्था में सुधार की अपेक्षा करना पत्रकारिता तथा नागरिक चेतना का महत्वपूर्ण हिस्सा है। उसी के साथ सरकार द्वारा किए जा रहे अच्छे कार्यों को सामने रखना भी उतना ही जरूरी है। जैसे स्वस्थ आलोचना से व्यवस्था को आईना दिखता है, प्रशंसा से जिम्मेदारी निभाने वालों का मनोबल बढ़ता है। बालाघाट जिले में अचानक सामने आई बीमारी के दौरान मध्य प्रदेश सरकार तथा स्वास्थ्य विभाग की सक्रियता इसी दृष्टि से चर्चा के योग्य है।

दरअसल, जुलाई के दूसरे सप्ताह में बालाघाट जिले के बिरसा विकासखंड के बोंदारी, कुंडेकसा, कोरका, डंडेकसा और सोनगुड्डा उप-स्वास्थ्य केंद्र क्षेत्रों से बच्चों में अचानक बुखार और दाने की शिकायतें सामने आईं। क्षेत्र की भौगोलिक परिस्थितियां कठिन हैं। भारी बारिश के बीच गांवों तक पहुंचना अपने आप में चुनौती है। ऐसी परिस्थिति में बीमारी की सूचना मिलते ही डिस्ट्रिक्ट रैपिड रिस्पॉन्स टीम को सक्रिय करना, बाल रोग विशेषज्ञों, महामारी वैज्ञानिकों और कीट वैज्ञानिकों की टीम भेजना तथा राष्ट्रीय स्तर की विशेषज्ञ टीमों को प्रभावित क्षेत्र तक पहुंचाना प्रशासनिक तत्परता का संकेत है।

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव द्वारा विषय का संज्ञान लेकर अधिकारियों को आवश्यक दिशा-निर्देश देना भी सरकार की संवेदनशीलता को सामने लाता है। सबसे महत्वपूर्ण बात जमीन पर हुई कार्रवाई है। 57 स्वास्थ्य दलों ने 50 गांवों में पहुंचकर 43 हजार 451 लोगों की जांच की। 6,537 लोगों का घर पर उपचार किया गया। गंभीर रूप से बीमार 647 बच्चों को अस्पताल में भर्ती कराया गया। बिरसा विकासखंड में 35 हजार 827 बच्चों को खसरा-रूबेला का टीका लगाया गया।

दस्त से बचाव के लिए 1 लाख 63 हजार 902 परिवारों तक ओआरएस और जिंक के पैकेट पहुंचाए गए। मलेरिया की रोकथाम के लिए 8,610 घरों में कीटनाशक छिड़काव और फॉगिंग कराई गई। 26 हजार 865 लोगों की मलेरिया जांच हुई और 980 संक्रमित लोगों का तत्काल उपचार शुरू किया गया। प्रभावित क्षेत्रों में 3,600 मच्छरदानियां वितरित की गईं।

इस दृष्टि से 43 हजार से अधिक लोगों की जांच वास्तव में उस प्रयास का प्रमाण है जिसमें स्वास्थ्य दल गांव-गांव पहुंचे, लोगों से संवाद किया और बीमारी की वास्तविक स्थिति समझने का प्रयास किया। कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में चिकित्सा दलों की पहुंच अपने आप में सराहनीय कार्य है। इस पूरे अभियान की एक और महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि सरकार ने स्वास्थ्य संकट को उपचार तक सीमित दायरे में देखने के बजाय स्वास्थ्य व्यवस्था के व्यापक सुदृढ़ीकरण से जोड़ा। गं

गंभीर रूप से बीमार गर्भवती महिलाओं और बच्चों के सुरक्षित परिवहन के लिए बैहर, बिरसा और कटंगी विकासखंडों को 3.60 लाख रुपये आवंटित किए गए। टीकों के सुरक्षित परिवहन के लिए 3.40 लाख रुपये दिए गए। जिले के 22 उप-स्वास्थ्य केंद्रों की मरम्मत के लिए 1.93 करोड़ रुपये तथा जरूरी उपकरणों के लिए 24 लाख रुपये स्वीकृत किए गए। घुम्मुर उप-स्वास्थ्य केंद्र को प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में बदलने के लिए 66 लाख रुपये का प्रस्ताव मंत्रिमंडल को भेजा गया।

स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने के लिए 54 नए डॉक्टरों की पदस्थापना हुई। मलेरिया नियंत्रण के लिए एक सलाहकार और चार तकनीकी सुपरवाइजर तैनात किए गए। महिला एवं बाल विकास विभाग ने चार नए सीडीपीओ नियुक्त किए तथा आंगनवाड़ियों में रिक्त 52 कार्यकर्ता और सहायिका पद भरे। बीमारी के उपचार के साथ दूषित पेयजल, अंधविश्वास और झोलाछाप चिकित्सा जैसी चुनौतियों पर ध्यान दिया गया। ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले उप-स्वास्थ्य केंद्रों, डॉक्टरों और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को मजबूत करने की दिशा में कदम उठाए गए।

बालाघाट के स्वास्थ्य क्षेत्र की तस्वीर को समझने के लिए पिछले 23 वर्षों के आंकड़े भी महत्वपूर्ण हैं। वर्ष 2003 में संस्थागत प्रसव का आंकड़ा 21.50 प्रतिशत था, जो वर्ष 2026 में बढ़कर 92.10 प्रतिशत पहुंच गया। सुरक्षित प्रसव का आंकड़ा 41.50 प्रतिशत से बढ़कर 94.10 प्रतिशत हुआ। पूर्ण टीकाकरण 47.50 प्रतिशत से बढ़कर 92.70 प्रतिशत तक पहुंचा। मातृ स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी बड़ा बदलाव दिखाई देता है। वर्ष 2003 में मातृ मृत्यु के लगभग 176 मामले दर्ज किए गए थे, जबकि वर्ष 2026 में यह संख्या 60 रह गई। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार हर साल 116 महिलाओं की जान बच रही है और 23 वर्षों में लगभग 2,650 माताओं की जान बचाई गई।

शिशु स्वास्थ्य में भी इसी तरह का बदलाव दर्ज हुआ। वर्ष 2003 में शिशु मृत्यु के लगभग 3,805 मामले थे, जो वर्ष 2026 में घटकर 1,560 रह गए। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार हर साल लगभग 2,245 शिशुओं को जीवन मिल रहा है और 23 वर्षों में करीब 51,600 शिशुओं की जान बचाई गई। ये आंकड़े स्वास्थ्य व्यवस्था में आए दीर्घकालिक परिवर्तन की कहानी कहते हैं।

बालाघाट का उदाहरण बताता है कि संकट की घड़ी में त्वरित निर्णय, विशेषज्ञों की भागीदारी, व्यापक जांच, उपचार, टीकाकरण, मलेरिया नियंत्रण, संसाधनों की उपलब्धता और स्वास्थ्य ढांचे को मजबूत करने की दिशा में एक साथ काम किया जा सकता है। 57 मेडिकल टीमों का 50 गांवों तक पहुंचना और 43 हजार 451 लोगों की जांच करना इस प्रयास की व्यापकता दर्शाता है।

(लेखक, हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी