स्वस्थ बचपन का संकल्प हो रहा साकार, बदल रही है बच्चों और माताओं की स्वास्थ्य तस्वीर
-डॉ. निवेदिता शर्मा
जब किसी देश में नवजात शिशु सुरक्षित जन्म लेने लगे, माताएँ बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएँ पाने लगें, बच्चों तक समय पर टीकाकरण और पोषण पहुँचने लगे, तब समझना चाहिए कि विकास जमीन पर दिखाई देने लगा है। भारत में पिछले कुछ वर्षों में मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य के क्षेत्र में जो परिवर्तन आया है, उसने स्वास्थ्य सेवाओं की पूरी तस्वीर बदल दी है। गांवों की आंगनबाड़ी से लेकर आधुनिक डिजिटल हेल्थ सिस्टम तक, बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए एक व्यापक ढांचा तैयार किया गया है।
स्विट्जरलैंड के जिनेवा में आयोजित 79वीं विश्व स्वास्थ्य सभा में केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री जगत प्रकाश नड्डाजी ने महिलाओं, बच्चों और किशोरों के स्वास्थ्य को लेकर भारत की प्रतिबद्धता दोहराते हुए जिस विश्वास के साथ भारत की उपलब्धियाँ दुनिया के सामने रखीं, वह इस बदलाव का प्रमाण है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने स्वास्थ्य सेवाओं को अंतिम व्यक्ति तक पहुँचाने का लक्ष्य तय किया, वहीं मध्य प्रदेश में डॉ. मोहन यादव समेत विभिन्न राज्यों की सरकारों ने इसे धरातल पर उतारने का काम किया। परिणामस्वरूप आज भारत बच्चों और माताओं के स्वास्थ्य संरक्षण के क्षेत्र में दुनिया के सामने एक मजबूत उदाहरण बनकर उभर रहा है।
भारत वर्ष 2005 से पार्टनरशिप फॉर मैटरनल, न्यूबॉर्न एंड चाइल्ड हेल्थ यानी पीएमएनसीएच से जुड़ा हुआ है। आज भारत इस संगठन में बोर्ड का उपाध्यक्ष और स्थायी समिति का अध्यक्ष है। हर वर्ष 20 लाख डॉलर की स्थायी अनुदान राशि देकर भारत ने यह संदेश दिया है कि वह सिर्फ अपने देश तक सीमित न रहकर वैश्विक स्वास्थ्य व्यवस्था में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। वहीं, भारत ने दुनिया को यह दिखाया है कि सीमित संसाधनों के बावजूद बड़े स्तर पर स्वास्थ्य सेवाएँ पहुँचाई जा सकती हैं।
मोदी सरकार की सबसे महत्वपूर्ण स्वास्थ्य योजनाओं में आयुष्मान भारत योजना का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। इस योजना ने गरीब और निम्न मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए इलाज की चिंता काफी हद तक कम की है। लाखों बच्चों को गंभीर बीमारियों के इलाज की सुविधा मिली है। देशभर में स्थापित हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर अब उपचार देने के साथ ही बच्चों और महिलाओं के स्वास्थ्य संरक्षण का मजबूत आधार बन चुके हैं। यहाँ टीकाकरण, पोषण जांच, एनीमिया नियंत्रण और प्राथमिक उपचार जैसी सेवाएँ लगातार उपलब्ध कराई जा रही हैं।
भारत में बच्चों की मौत का एक बड़ा कारण लंबे समय तक टीकाकरण का अभाव रहा। इसे ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार ने मिशन इंद्रधनुष को मिशन मोड में लागू किया। इस अभियान ने दूरस्थ और आदिवासी क्षेत्रों तक टीकाकरण सेवाएँ पहुँचाने में बड़ी सफलता हासिल की। यहां तक कि कोविड महामारी के दौरान भी बच्चों और गर्भवती महिलाओं के टीकाकरण कार्यक्रम को प्रभावित नहीं होने दिया गया। डिजिटल ट्रैकिंग और जमीनी स्तर पर आशा एवं आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के प्रयासों ने इस अभियान को नई ताकत दी। यही वजह है कि शिशु मृत्यु दर और मातृ मृत्यु दर में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है।
पोषण अभियान से कुपोषण के खिलाफ लड़ाई
भारत में कुपोषण एक गंभीर सामाजिक और स्वास्थ्य चुनौती रही है। इसे दूर करने के लिए शुरू किया गया पोषण अभियान अब जनआंदोलन का रूप ले चुका है। गर्भवती महिलाओं, बच्चों और किशोरियों को पौष्टिक आहार उपलब्ध कराने के लिए केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर काम कर रही हैं। स्कूलों में मिड-डे मील और आंगनबाड़ी केंद्रों में पोषण आहार वितरण व्यवस्था को मजबूत किया गया है। “पोषण पखवाड़ा” और “पोषण माह” जैसे कार्यक्रमों ने लोगों को जागरूक करने में बड़ी भूमिका निभाई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं कई मंचों से कुपोषण मुक्त भारत का आह्वान कर चुके हैं।
किशोर स्वास्थ्य पर बढ़ा फोकस
भारत उन शुरुआती देशों में शामिल रहा जिसने किशोर स्वास्थ्य को लेकर अलग राष्ट्रीय कार्यक्रम शुरू किया। वर्ष 2014 में आरंभ हुए इस कार्यक्रम के माध्यम से स्कूलों, सामुदायिक केंद्रों और स्वास्थ्य संस्थानों के जरिए युवाओं तक स्वास्थ्य सेवाएँ पहुँचाई गईं। आज किशोरों में मानसिक तनाव, एनीमिया और जीवनशैली संबंधी बीमारियों की चुनौतियाँ बढ़ रही हैं। ऐसे समय में सरकार का यह प्रयास भविष्य की पीढ़ी को स्वस्थ और जागरूक बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
मध्य प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादवजी के नेतृत्व में मध्य प्रदेश सरकार बच्चों और माताओं के स्वास्थ्य को लेकर विशेष अभियान चला रही है। राज्य में कुपोषण के खिलाफ लगातार अभियान चलाए जा रहे हैं। आंगनबाड़ी केंद्रों को आधुनिक सुविधाओं से जोड़ा जा रहा है और बच्चों की स्वास्थ्य निगरानी को डिजिटल माध्यम से मजबूत किया जा रहा है। प्रदेश सरकार ने आदिवासी और दूरस्थ क्षेत्रों में मोबाइल मेडिकल यूनिट्स की संख्या बढ़ाई है। जिला अस्पतालों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में नवजात शिशु देखभाल इकाइयों का विस्तार किया गया है। संस्थागत प्रसव को बढ़ावा देने के कारण मातृ एवं शिशु मृत्यु दर में सुधार देखने को मिला है।
उत्तर प्रदेश में इंसेफेलाइटिस पर नियंत्रण
मुख्यमंत्री योगीजी के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश ने बच्चों के स्वास्थ्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किया है। पूर्वी उत्तर प्रदेश में वर्षों तक बच्चों की जान लेने वाली इंसेफेलाइटिस बीमारी पर नियंत्रण राज्य सरकार की बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है। स्वच्छता अभियान, टीकाकरण, बेहतर इलाज और जनजागरूकता के कारण इस बीमारी से होने वाली मौतों में भारी कमी आई है। राज्य में नए मेडिकल कॉलेजों और स्वास्थ्य संस्थानों की स्थापना ने भी स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत किया है।
गुजरात और असम में तकनीक आधारित स्वास्थ्य मॉडल
आज गुजरात ने डिजिटल स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने पर विशेष जोर दिया है। नवजात शिशुओं की देखभाल के लिए विशेष इकाइयाँ स्थापित की गई हैं और ग्रामीण क्षेत्रों तक मोबाइल स्वास्थ्य सेवाएँ पहुँचाई जा रही हैं। वहीं असम में मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य सेवाओं में तेजी से सुधार हुआ है। राज्य में चिकित्सा ढाँचे को मजबूत करने के साथ टीकाकरण और पोषण कार्यक्रमों को व्यापक स्तर पर लागू किया गया है।
पहाड़ी और दूरस्थ क्षेत्रों तक पहुँचती स्वास्थ्य सेवाएँ
उत्तराखंड में मुख्यमंत्री धामीजी की सरकार ने पहाड़ी क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाएँ पहुँचाने के लिए टेलीमेडिसिन और मोबाइल हेल्थ यूनिट्स का उपयोग बढ़ाया है। इससे दूर-दराज़ क्षेत्रों के बच्चों को समय पर इलाज मिल पा रहा है। इसी प्रकार अन्य राज्यों में भी स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार स्वास्थ्य मॉडल विकसित किए जा रहे हैं। कहीं पोषण पर जोर है तो कहीं डिजिटल स्वास्थ्य सेवाओं पर। इन प्रयासों ने स्वास्थ्य क्षेत्र में सकारात्मक प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा दिया है।
यही कारण है कि आज भारत की पहचान दुनिया के सबसे बड़े स्वास्थ्य सेवा अभियानों को सफलतापूर्वक संचालित करने वाले राष्ट्र के रूप में भी बनने लगी है। मातृ मृत्यु दर और शिशु मृत्यु दर में आई गिरावट, टीकाकरण कवरेज में वृद्धि और पोषण सुधार जैसे संकेतक इस बदलाव की पुष्टि करते हैं। निश्चित ही केंद्र और राज्य सरकारों के साझा प्रयासों ने यह साबित किया है कि यदि राजनीतिक इच्छाशक्ति मजबूत हो तो स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचाया जा सकता है।
(लेखिका मध्य प्रदेश बाल अधिकार संरक्षण आयोग की अध्यक्ष हैं)
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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी

