(महावीर जयंती/31 मार्च/विशेष) हिंसा से व्याकुल दुनिया को महावीर का मार्गदर्शन
योगेश कुमार गोयल
‘अहिंसा परमो धर्मः’ का उद्घोष करने वाले भगवान महावीर का जीवन और दर्शन केवल एक धार्मिक परंपरा तक सीमित नहीं है बल्कि यह सम्पूर्ण मानवता के लिए शाश्वत मार्गदर्शक सिद्धांतों का स्रोत है। आज का युग विज्ञान, तकनीक और भौतिक उपलब्धियों के शिखर पर अवश्य पहुंच गया है लेकिन इसके साथ ही मानवता नैतिक, मानसिक और पर्यावरणीय संकटों से भी जूझ रही है। ऐसे समय में भगवान महावीर के उपदेश और अमृतवाणी पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो उठती है। आधुनिक जीवन की आपाधापी में मनुष्य अपने स्वार्थ, लोभ और अहंकार के वशीभूत होकर ऐसे निर्णय लेने लगा है, जो न केवल उसके अपने जीवन को प्रभावित करते हैं बल्कि समाज और प्रकृति के संतुलन को भी बिगाड़ देते हैं। हिंसा आज केवल शारीरिक रूप तक सीमित नहीं रही बल्कि विचारों, शब्दों और व्यवहार में भी व्याप्त हो चुकी है। प्रतिस्पर्धा की अंधी दौड़ में व्यक्ति संवेदनहीन होता जा रहा है। ऐसे परिदृश्य में महावीर स्वामी का अहिंसा दर्शन मानवता को करुणा, सहिष्णुता और आत्मसंयम की ओर लौटने का आह्वान करता है।
भगवान महावीर का दर्शन इस मूल विचार पर आधारित है कि संसार का प्रत्येक जीव समान है और सभी में आत्मा का वास है। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि किसी भी जीव को पीड़ा देना स्वयं अपने अस्तित्व को आहत करना है। आज जब पर्यावरण संकट, जलवायु परिवर्तन और जैव विविधता के विनाश जैसी समस्याएं हमारे सामने खड़ी हैं, तब महावीर का यह सिद्धांत अत्यंत सार्थक प्रतीत होता है कि पेड़-पौधे, जल, वायु और अग्नि भी चेतन तत्व हैं और उनके प्रति भी संवेदनशीलता आवश्यक है। महावीर स्वामी ने केवल उपदेश ही नहीं दिए बल्कि अपने जीवन से यह सिद्ध किया कि संयम, तप और आत्मानुशासन के माध्यम से मनुष्य अपने भीतर की अशुद्धियों को दूर कर सकता है। उन्होंने कर्म के सिद्धांत को स्पष्ट करते हुए कहा कि प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्मों के लिए स्वयं उत्तरदायी है। कर्म ही जीवन की दिशा निर्धारित करते हैं और उसी के अनुसार जीव विभिन्न योनियों में भ्रमण करता है। यह विचार आज के समय में व्यक्ति को अपने आचरण के प्रति सजग और जिम्मेदार बनने की प्रेरणा देता है।
उनकी अमृतवाणी में जीवन के हर पहलू के लिए मार्गदर्शन निहित है। वे कहते हैं कि संसार के सभी प्राणी बराबर हैं, इसलिए ‘जीओ और जीने दो’ का सिद्धांत अपनाना चाहिए। यह केवल एक नैतिक उपदेश नहीं बल्कि सामाजिक सद्भाव और शांति का आधार है। यदि समाज में हर व्यक्ति इस सिद्धांत को आत्मसात कर ले तो हिंसा, द्वेष और संघर्ष स्वतः समाप्त हो सकते हैं। महावीर स्वामी ने यह भी कहा कि अहिंसा से बड़ा कोई व्रत नहीं है। आज जब युद्ध, आतंकवाद और सामाजिक हिंसा विश्व के विभिन्न हिस्सों में व्याप्त हैं, तब यह संदेश अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जो व्यक्ति स्वयं हिंसा करता है, दूसरों से करवाता है या हिंसा का समर्थन करता है, वह अपने लिए शत्रुता और दुःख का बीज बोता है। यह विचार आधुनिक समाज में नैतिक जिम्मेदारी और सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना को सुदृढ़ करता है।
उनका धर्म केवल कर्मकांड तक सीमित नहीं था बल्कि आंतरिक शुद्धता पर आधारित था। उन्होंने कहा कि धर्म का स्थान आत्मा की पवित्रता में है, बाहरी आडंबर उसमें सहायक तो हो सकते हैं परंतु अनिवार्य नहीं। यह विचार आज के समय में विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, जब धर्म का स्वरूप कई बार बाहरी प्रदर्शन तक सीमित हो जाता है। महावीर का संदेश हमें सच्चे धर्म की ओर लौटने का मार्ग दिखाता है, जहां आत्मा की शुद्धता और आचरण की पवित्रता ही सर्वोपरि है। महावीर स्वामी ने मानव मन के चार प्रमुख दोषों (क्रोध, मान, माया और लोभ) को जीवन के पतन का कारण बताया। उन्होंने कहा कि क्रोध प्रेम को नष्ट करता है, अहंकार ज्ञान को, छल मित्रता को और लोभ सभी गुणों को समाप्त कर देता है। आज के तनावपूर्ण जीवन में यह शिक्षाएं अत्यंत उपयोगी हैं। यदि व्यक्ति इन दोषों पर नियंत्रण कर ले तो उसका जीवन संतुलित और सुखमय बन सकता है।
उनकी वाणी में सामाजिक समानता का भी स्पष्ट संदेश मिलता है। उन्होंने कहा कि जन्म से नहीं बल्कि कर्म से व्यक्ति महान बनता है। यह विचार सामाजिक न्याय और समानता की भावना को मजबूत करता है। आधुनिक लोकतांत्रिक मूल्यों के संदर्भ में भी यह सिद्धांत अत्यंत प्रासंगिक है। महावीर स्वामी ने सेवा को सर्वोच्च धर्म बताया। उन्होंने कहा कि रोगियों और पीड़ितों की सेवा करना प्रभु की सेवा से भी बढ़कर है। आज जब समाज में संवेदनहीनता बढ़ती जा रही है, तब यह संदेश मानवता को पुनः जागृत करने का कार्य करता है। कोरोना महामारी जैसे संकटों के दौरान हमने देखा कि सेवा और सहानुभूति ही समाज को संभालने का सबसे बड़ा आधार बनी। उनकी शिक्षाओं में स्त्री-पुरुष समानता का भी उल्लेख मिलता है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि मुक्ति पाने का अधिकार सभी को समान रूप से है। यह विचार आज के समय में लैंगिक समानता के संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण है।
महावीर स्वामी का दर्शन हमें यह भी सिखाता है कि धैर्य और सहनशीलता के बिना अहिंसा का पालन संभव नहीं है। जो व्यक्ति विपरीत परिस्थितियों में अपना धैर्य खो देता है, वह सच्चे अर्थों में अहिंसक नहीं हो सकता। यह शिक्षा आज के तनावपूर्ण और प्रतिस्पर्धात्मक जीवन में मानसिक संतुलन बनाए रखने की प्रेरणा देती है। उनकी अमृतवाणी का सार यह है कि मन, वचन और कर्म से किसी भी प्राणी को कष्ट न पहुंचाया जाए। यही सच्चा धर्म है और यही जीवन की सर्वोच्च साधना है। उन्होंने यह भी कहा कि आत्मा अमर है, शरीर नश्वर है और जीवन का अंतिम लक्ष्य आत्मा की मुक्ति है। यह विचार व्यक्ति को आध्यात्मिक दृष्टि प्रदान करता है और जीवन के वास्तविक उद्देश्य को समझने में सहायता करता है।
आज के समय में, जब मानवता अनेक चुनौतियों से जूझ रही है, चाहे वह नैतिक पतन हो, पर्यावरणीय संकट हो या मानसिक अशांति, भगवान महावीर की शिक्षाएं एक प्रकाश स्तंभ की तरह मार्गदर्शन करती हैं। उनका दर्शन न केवल व्यक्तिगत जीवन को सुधारने का मार्ग दिखाता है बल्कि समाज और विश्व में शांति, सद्भाव और संतुलन स्थापित करने की प्रेरणा भी देता है। महावीर जयंती केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं बल्कि आत्ममंथन और आत्मसुधार का अवसर है। यह हमें अपने भीतर झांकने और यह विचार करने का अवसर देती है कि क्या हम वास्तव में अहिंसा, सत्य, संयम और करुणा के मार्ग पर चल रहे हैं। यदि हम भगवान महावीर के सिद्धांतों को अपने जीवन में अपनाएं तो न केवल हमारा व्यक्तिगत जीवन सार्थक होगा बल्कि समाज और विश्व भी अधिक शांतिपूर्ण और मानवीय बन सकेगा। अतः यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि भगवान महावीर की अमृतवाणी सदैव प्रासंगिक रहेगी। यह मानवता के लिए एक ऐसी अमूल्य धरोहर है, जो समय, परिस्थिति और युग की सीमाओं से परे जाकर हर युग में मार्गदर्शन करती रहेगी।
(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / मुकुंद

