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किशनगंज सैन्य छावनी को लेकर दोहरी राजनीति कब तक?

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किशनगंज सैन्य छावनी को लेकर दोहरी राजनीति कब तक?


ओम पराशर

किशनगंज में प्रस्तावित सैन्य छावनी को लेकर खड़ा किया गया विवाद केवल भूमि अधिग्रहण का प्रश्न नहीं है, यह नेतृत्व की विश्वसनीयता की अग्निपरीक्षा है। किसान चिंतित हैं और चिंता स्वाभाविक है लेकिन असली सवाल यह है कि क्या जनप्रतिनिधि इन चिंताओं का समाधान खोज रहे हैं या उन्हें राजनीतिक ढाल बनाकर राष्ट्रीय सुरक्षा पर प्रश्नचिह्न खड़ा कर रहे हैं?

जब वही नेता संसद में खड़े होकर किशनगंज से जुड़े सिलीगुड़ी गलियारे को देश की जीवनरेखा बताते हैं, उसे सामरिक दृष्टि से अनिवार्य मानते हैं, उत्तर-पूर्व को जोड़ने वाली परियोजनाओं को राष्ट्रीय आवश्यकता घोषित करते हैं, तब उनकी आवाज़ में राष्ट्रहित गूंजता है। किंतु जब उसी भूभाग में सेना की स्थायी उपस्थिति की बात आती है, तो वही स्वर विरोध में बदल जाता है। यह विरोध केवल नीति का नहीं, नीयत का भी परीक्षण है।

क्या सुरक्षा केवल रेल लाइन तक सीमित है? क्या परिवहन ढांचा सामरिक है, पर उसकी रक्षा के लिए सैनिक उपस्थिति असामरिक? यदि गलियारे की मजबूती आवश्यक है, तो उसकी सुरक्षा की रीढ़ क्यों विवादास्पद बना दी जाती है? यह विरोधाभास संयोग नहीं हो सकता। यह राजनीतिक सुविधा का गणित है।

भूमि अधिग्रहण निःस्संदेह संवेदनशील विषय है। किसानों की आजीविका सर्वोपरि है। परंतु नेतृत्व का दायित्व केवल भावनाओं को हवा देना नहीं बल्कि तथ्यों को स्पष्ट करना भी है। क्या किसानों को बताया गया कि सीमांत क्षेत्र में सैन्य छावनी केवल जमीन का उपयोग नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र की दीर्घकालिक सुरक्षा और स्थिरता की गारंटी है? क्या संवाद हुआ, या केवल आशंका को उछाला गया?

राष्ट्र की सुरक्षा खंडों में नहीं चलती। रेल, सड़क, संचार और सैन्य उपस्थिति, ये सब मिलकर समग्र सुरक्षा तंत्र बनाते हैं। यदि एक का समर्थन और दूसरे का विरोध किया जाए, तो यह रणनीतिक दृष्टि नहीं, राजनीतिक अवसरवाद कहलाता है।

सबसे चिंताजनक बात यह है कि सुरक्षा जैसे विषय को भी पहचान और ध्रुवीकरण के चश्मे से देखा जाने लगा है। सेना की छावनी कोई सांप्रदायिक या राजनीतिक प्रतीक नहीं होती; वह राष्ट्रीय एकता का संरक्षक स्तंभ होती है। उसे विवाद का विषय बनाना दूरगामी खतरों को आमंत्रण देना है।

किशनगंज के नागरिक यह जानने के अधिकारी हैं कि उनके नाम पर कौन-सी राजनीति की जा रही है। क्या सचमुच उनकी चिंता प्राथमिक है, या यह एक बड़े राजनीतिक खेल का मोहरा है? नेतृत्व का अर्थ केवल विरोध दर्ज कराना नहीं, बल्कि कठिन निर्णयों के समय साहस दिखाना भी है।

यदि जनप्रतिनिधि सचमुच किसानों के हितैषी हैं, तो उन्हें पुनर्वास, उचित मुआवजा और पारदर्शी प्रक्रिया सुनिश्चित करने के लिए संघर्ष करना चाहिए, न कि राष्ट्रीय सुरक्षा की आवश्यकता को ही संदिग्ध ठहराना चाहिए। विकास और सुरक्षा परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि परस्पर पूरक हैं।

आज किशनगंज में जो हो रहा है, वह केवल एक जिले का प्रश्न नहीं है। यह उस राजनीतिक संस्कृति का दर्पण है, जहां राष्ट्रहित और जनभावना के बीच कृत्रिम टकराव पैदा कर लाभ उठाने की कोशिश की जाती है।

समय आ गया है कि नेता तय करें कि वे इतिहास में दूरदर्शी राष्ट्रनिर्माता के रूप में दर्ज होना चाहते हैं, या क्षणिक राजनीति के शोर में खो जाना चाहते हैं। किशनगंज की यह कसौटी केवल स्थानीय नहीं, राष्ट्रीय स्मृति में अंकित होगी।(लेखक, हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

हिन्दुस्थान समाचार / ओम पराशर