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“गंगा” न्यायमूर्ति भुयान के लिए भले सिर्फ नदी हो, पर करोड़ों के लिए आस्था की अविरल धारा है

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“गंगा” न्यायमूर्ति भुयान के लिए भले सिर्फ नदी हो, पर करोड़ों के लिए आस्था की अविरल धारा है


“गंगा” न्यायमूर्ति भुयान के लिए भले सिर्फ नदी हो, पर करोड़ों के लिए आस्था की अविरल धारा है


- डॉ. मयंक चतुर्वेदी

गङ्गे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वति।नर्मदे सिन्धु कावेरी जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु॥

भारतीय घरों में प्रतिदिन उच्चारित होने वाला यह मंत्र, वस्तुत: उस सभ्यता की घोषणा है जिसने नदियों को संसाधन नहीं, माता माना, जल को पदार्थ नहीं, जीवन माना और गंगा को नदी नहीं, संस्कृति की भावधारा से जोड़ा इसीलिए जब कोई यह कहता है कि गंगा तो बहता हुआ पानी है अथवा उसके संदर्भ में सिर्फ यह तर्क देता है कि गंगा के किनारे चिकन खाने पर कोई कानून नहीं है, तब यह तर्क और विवाद किसी भोजन या गिरफ्तारी तक सीमित नहीं रह जाता, वह भारत की सांस्कृतिक चेतना और आधुनिक विधिक दृष्टि के बीच संवाद का प्रश्न बन जाता है।

सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुयान ने वाराणसी के उस प्रकरण का उल्लेख करते हुए, जिसमें गंगा तट पर चिकन बिरयानी खाकर इफ्तार करने वाले कुछ युवकों की गिरफ्तारी हुई थी, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की रक्षा का पक्ष रखा। आप कह सकते हैं कि उन्होंने अप्रत्यक्ष रूप से यूपी सरकार में पुलिस की कार्यप्रणाली और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को इस मुद्दे पर कटघरे में खड़ा करने का प्रयास किया। हो सकता है उन्हें जो कानून के विद्यार्थी सुन रहे थे, वह उनके पद एवं प्रतिष्ठा के प्रभाव में आकर उनकी बातों को सच माल लें! किंतु इस पक्ष से जुड़ा एक सच यह भी है कि क्या भारतीय संविधान किसी की भावनाओं और आस्था से खिलवाड़ करने के लिए कोई अवसर देता है?

बेशक, लोकतंत्र में यह चिंता निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है। किसी नागरिक की स्वतंत्रता का अनावश्यक हनन नहीं होना चाहिए, परंतु प्रश्न यह भी है कि क्या किसी पवित्र स्थल की मर्यादा को सिर्फ इस आधार पर परखा जा सकता है कि उस संबंध में कोई दंडात्मक कानून है या नहीं? इसलिए जो मर्जी आए करें! अपनी जूठन उस पवित्र जल में डालें, जिसके प्रति करोड़ों लोग आस्थावान हैं।

सोचिए, सामने से देखने पर यह दृश्य कितना खराब लगता है, जब आप शाकाहारी हों, नदी के प्रति पवित्र भाव रखते हों और उसी नदी के ऊपर कुछ लोग आकर मांसाहार करें, फिर उसके अवशेष पवित्र जल में मिला दें। यहां आप ये कृत्य कर रहे हैं और दूसरी जगह कोई उस जल को बहुत ही श्रद्धा से आचमन कर रहा है, पवित्र 'शुद्धिकरण मंत्र' भी बोल रहा है-

अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा ।यः स्मरेत्पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥

यानी वह इस मंत्र के साथ तीन बार केशव, नारायण एवं माधव का नाम स्मरण कर उसे पी रहा हो, तब आप स्वयं विचार करें कि जो यह पवित्र जल पी रहा है, वह इस तरह के मांसाहार से जुड़े वीडियो सामने आने के बाद क्या अपना भाव उतना ही पवित्र रख सकेगा, जिस भाव से वह गंगा में पवित्रीकरण करने पहुंचा था? साथ ही इस क्रिया के अलावा अनेक श्रद्धावान अपनी बॉटल में भरकर गंगाजल को घर के मंदिर में रखने के लिए ले जाते हैं, तब क्या इस स्थिति में, इस भाव में वह जल किसी भी मंदिर में रखेजाने योग्य है? स्वभाविक है कि भारत की हिन्दू चेतना इस प्रश्न का उत्तर नहीं में देती है।

कानून समाज को चलाता है, किंतु संस्कृति समाज को जीवित रखती है

काश; हमारे न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुयान को कोई यह अवश्य बताए कि सभ्यताएँ सिर्फ संविधान की धाराओं पर नहीं टिकतीं, वे स्मृतियों, प्रतीकों और श्रद्धा पर भी खड़ी होती हैं। यदि कानून ही अंतिम सत्य होता, तो संसार में मर्यादा जैसा कोई शब्द नहीं होता। किसी न्यायालय में प्रवेश करते समय लोग स्वतः संयमित हो जाते हैं। राष्ट्रीय ध्वज के प्रति सम्मान व्यक्त करते हैं। बलिदानी स्मारकों पर ऊँचे स्वर में ठहाके नहीं लगाते। इन सबके लिए हर क्षण पुलिस या दंड संहिता की आवश्यकता नहीं पड़ती।

भारत के उच्चतम न्यायालय के प्रतीक चिन्ह के नीचे यतो धर्मस्ततो जयः लिखा हुआ है, क्योंकि समाज सिर्फ भय से नहीं, संस्कार से भी संचालित होता है। ठीक उसी प्रकार गंगा के घाट करोड़ों लोगों के लिए मंदिर के समान पवित्र हैं। वहाँ आचरण का निर्धारण विधिक प्रावधानहीं करते हैं, यहां तो सांस्कृतिक मर्यादा भी बहुत कुछ तय करती है।

गंगा, भारत की नसों में बहती हुई सभ्यता

गंगा का इतिहास वेदों से प्रारंभ होता है। ऋग्वेद के नदी सूक्त में गंगा का स्मरण है। वाल्मीकि रामायण में वह भगीरथ की तपस्या है। महाभारत में भीष्म की माता गंगा हैं। विष्णु पुराण उन्हें विष्णुपदी कहता है। स्कंद पुराण तो स्पष्ट घोषणा ही कर देता है-

गङ्गा गङ्गेति यो ब्रूयाद् योजनानां शतैरपि।मुच्यते सर्वपापेभ्यो विष्णुलोकं स गच्छति॥

भारतीय परंपरा में गंगा जल ही वह जल है, जिसका एक पात्र हर हिन्दू घर में रखा जाता है। जन्म के संस्कार में वही गंगाजल छिड़कता है। विवाह की प्रतिज्ञा उसी के साक्ष्य में होती है। मृत्यु के समय अंतिम बूंद भी उसी की चाही जाती है। वस्तुत: जो नदी मनुष्य के जन्म से मृत्यु तक उसके साथ चलती है, उसे सिर्फ जल कहना उस भावलोक को नकार देना है, जिसमें भारत सहस्राब्दियों से साँस लेता आया है।

भगवान श्रीकृष्ण ने भी गंगा को अपनी विभूति कहा है। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं- स्रोतसामस्मि जाह्नवी। (गीता 10.31) यानी कि नदियों में मैं स्वयं जाह्नवी अर्थात् गंगा हूँ। निश्चित ही उनका यह कथन गंगा को दिव्यता के सर्वोच्च प्रतिमान के रूप में स्थापित करती है। फिर यदि भारतीय समाज गंगा के प्रति असाधारण श्रद्धा रखता है, तो उसका आधार हजारों वर्षों की दार्शनिक परंपरा भी है।

पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू भी गंगा के सामने नतमस्तक थे, उन्होंने अपनी वसीयत में लिखा- गंगा भारत की नदी है... उससे हमारी जातीय स्मृतियाँ, हमारी आशाएँ, हमारे भय, हमारी विजय और हमारी पराजय जुड़ी हुई हैं। नेहरू स्वयं आधुनिक वैज्ञानिक सोच के पक्षधर थे, किंतु उन्होंने भी गंगा में भारतीय आत्मचेतना को देखा।भले ही फिर नेहरुजी की नीतियों एवं अन्य मामलों में कई मोर्चों पर आलोचना होती होगी, किंतु गंगा को लेकर उनका सदैव ही स्पष्ट मत रहा और उस मत से देखें तो गंगा एक पवित्र नदी है, जिसे अपवित्र करने का अधिकार किसी को नहीं दिया जा सकता है।

यदि नेहरू, विवेकानंद, शंकराचार्य, तुलसीदास, कबीर और महात्मा गांधी, सभी गंगा को भारत की सांस्कृतिक धुरी मानते हैं, तो प्रश्न उठता है कि क्या आधुनिक विधिक विमर्श में उस सांस्कृतिक सत्य के लिए पर्याप्त स्थान बचा है?

स्वतंत्रता का अधिकार और संवेदनशीलता का दायित्व

लोकतंत्र अधिकार देता है; किंतु अधिकारों के साथ उत्तरदायित्व भी जोड़ता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं कि समाज की गहरी आस्थाओं की उपेक्षा कर दी जाए। संविधान नागरिक को अधिकार देता है, पर वही संविधान प्रत्येक नागरिक से यह अपेक्षा भी करता है कि वह भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का सम्मान करेगा। यही कारण है कि किसी धार्मिक स्थल पर आचरण व्यक्तिगत पसंद तक सीमित नहीं रहता है, वह सभी के हित से जुड़ा रहता है।

अब न्यायमूर्ति भुयान ने स्वयं अपने व्याख्यान में कहा कि न्यायपालिका की वास्तविक शक्ति न धन है, न तलवार, उसकी सबसे बड़ी शक्ति जनता का विश्वास है। वस्तुत: गहराई से देखें तो यही बात इस प्रसंग पर भी लागू होती है। जनता का विश्वास विधिक प्रज्ञा से बनने के साथ ही वह इस अनुभूति से भी बनता है कि न्यायपालिका समाज की संवेदनाओं को समझती है। भारतीय न्याय व्यवस्था तभी अधिक प्रतिष्ठित होगी, जब वह संविधान के अक्षर के साथ-साथ भारत की सांस्कृतिक आत्मचेतना और गौरव को भी समान सम्मान देगी।

भारत को समझे के लिए गंगा को समझना

आज की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि हम भारत को सिर्फ विधि, अर्थशास्त्र और राजनीति की कसौटी पर पढ़ने लगे हैं, जबकि भारत का वास्तविक परिचय उसकी सभ्यता में है। गंगा इस देश के लिए 2,525 किलोमीटर लंबी यात्रा पूर्ण करती है। वे हिमालय से समुद्र तक बहती हुई वह सांस्कृतिक चेतना हैं, जिसने उत्तर और दक्षिण, पूर्व और पश्चिम, भाषा और जाति, गाँव और नगर इन सभी को एक सूत्र में बाँध रखा है।

यहां समझने वाली बात यह भी है कि किसी कानून में यह नहीं लिखा कि माँ के चरण छूना अनिवार्य है, फिर भी भारतीय ऐसा करते हैं। ऐसे ही किसी भी अधिनियम में यह भी नहीं लिखा कि तिरंगे को प्रणाम करना आवश्यक है, फिर भी राष्ट्रभक्ति ऐसा करवाती है। उसी प्रकार गंगा के प्रति श्रद्धा किसी दंड संहिता से नहीं मिलती, वह तो भारतीय चेतना में स्वत: स्फुरित है।

अच्छा हो, न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुयान भारत को वास्तविक अर्थों में समझने के लिए यहां के आस्था प्रतीकों, परंपराओं का भी गहरा अध्ययन कर लेवें। निश्चित ही न्यायमूर्ति भुयान जब ऐसा कर रहे होंगे, तब उन्हें समझ आ जाएगा कि भारत सिर्फ संविधान की धाराओं से नहीं चल रहा है, उसके पीछे जो अनेक शक्तियां कार्य कर रही हैं, उनमें से एक धारा गंगा की भी है, जोकि देश के हर हिन्दू घर एवं ह्दय से होकर गुजर रही है।

(लेखक, हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी