धर्म की स्थापना और प्रेमी जीवों को आत्मानंद प्रदान करने को अवतार ग्रहण करते हैं भगवान श्रीकृष्ण
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव पर विशेष आलेख
- डॉ. उमेशचन्द्र शर्मा
सच्चिदानन्दघन, परमब्रह्म परमात्मा, पुराण पुरुषोत्तम, देवकीनंदन भगवान श्रीकृष्ण का इस धरा धाम पर अवतरण आध्यात्मिक जगत् की दिव्यातिदिव्य, अद्भुततम, अनिर्वचनीय, अकल्पनीय विस्मयकारी एवं महानतम घटना है।
जब जब भी धर्म का पतन होता है और अधर्म की प्रधानता होने लगती है, तब तब ही भक्तों का उद्धार करने, दुष्टों का विनाश तथा धर्म की पुनः स्थापना करने को भगवान् विष्णु कभी श्रीकृष्ण, कभी श्री राम तो कभी नरसिंहादि रूपों में प्रकट होते है, किंतु भगवान् का इस धरा धाम पर अवतरण केवल आसुरी शक्तियों के विनाश और धर्म स्थापना के लिए ही नहीं हुआ करता, अपितु प्रेमी भक्तों को अपनी दिव्य लीलाओं के माध्यम से आत्मानंद प्रदान करने के निमित्त भी अवतार ग्रहण किया करते हैं।
प्रत्येक युग में दुर्वासनिक, अहंकारिक, दमनकारी मायावी और पाशविक शक्तियों के बल पर दैत्य और राक्षसगण राज्य सत्ता के लिए बड़ी चुनौती के रूप में सामने आकर जहां अधर्म, अनाचार और आतंक का साम्राज्य स्थापित करने हेतु धर्म संस्कृति को नैस्तनाबूद करते हुए सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न करने का प्रयास करते है, वहीं धर्मारुढ़, ईश्वर प्रणिधान और भक्ति संपन्न दैवी शक्तियों को त्रास देते हुए उन्हें ईश्वर से विमुख करने का भी षड्यंत्र करते हैं। दैविक और राक्षसी शक्तियों का यह संघर्ष प्रत्येक युग में आकार लेता हुआ दिखाई देता है, किंतु जब यह संघर्ष असीमित आकार ग्रहण कर लेता है, तब निर्गुण, निराकार ब्रह्म सगुण, साकार रूप में कभी कृष्ण कभी राम और कभी नरसिंहादि रूपों में अवतरित होकर अत्याचारी और दुष्ट मायावी शक्तियों का संहार करते हैं, धर्म राज्य की स्थापना करते हैं और जगत् में भय का वातावरण समाप्त कर सबको निर्भयता प्रदान करते हैं और केवल यही नहीं बल्कि आनंद कंद भगवान अपने निज जनों को अपना दिव्य प्रेमानंद प्रदान कर उनकी जन्म जन्मांतरों की अभिलाषाओं को भी पूर्ण कर देते हैं।
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन को अपने प्राकट्य का उद्देश्य स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि
अजोपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोपि सन्।
पृकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया।।
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहं।।
अर्थात भगवान् श्री कृष्ण अर्जुन को कहते हैं कि यद्यपि मैं अजन्मा तथा अविनाशी हूं और समस्त जीवों का स्वामी हूं, तो भी प्रत्येक युग में मैं अपने आदि दिव्य रुप में प्रकट होता हूं। हैं भरतवंशी!
जब जब भी और जहां भी धर्म का पतन होता है और अधर्म की प्रधानता होने लगती है, तब तब मैं अवतार लेता हूं, तथा भक्तों का उद्धार करने, दुष्टों का विनाश तथा धर्म की फिर से स्थापना करने के लिए मैं युग युग में प्रकट होता हूं।
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान् श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गए ज्ञान की सरल व्याख्या अनुसार जब भी धर्म का ह्रास और अधर्म की वृद्धि होने लगती है, तब भक्तजनों का उद्धार एवं दुष्टों का विनाश कर धर्म की स्थापना करने को भगवान् युग युग में प्रकट होते हैं। किंतु गीता में उद्धरित इन वचनों को महात्माओं द्वारा विशिष्ट एवं व्यापक परिप्रेक्ष्य में की गई व्याख्या को देखने पर स्पष्ट होता है कि केवल दुष्टो का विनाश ही भगवान् के अवतार का एक मात्र हेतु नहीं हो सकता।
भगवान् श्रीकृष्ण का इस धरा धाम पर अवतरण केवल आसुरी शक्तियों के विनाश और धर्म स्थापना के लिए ही नहीं होता है, अपितु वे अपने प्रेमी भक्तों को अपनी दिव्य लीलाओं के माध्यम से आत्मानंद प्रदान करने के निमित्त भी अवतार ग्रहण करते हैं। यदि केवल दैत्यों, दानवों या राक्षसों का विनाश कर धर्म स्थापना ही निमित्त होता, तो मात्र उसके लिए निर्गुण भगवान् को सगुण रूप धारण करने की आखिर क्या जरूरत हो सकती थी? श्री भगवान् यदि केवल संकल्प भर कर लेते तो भी क्षणांश में ही संपूर्ण जगत् की समस्त आसुरी शक्तियां स्वयंमेव समाप्त हो जाती, और तत्क्षण धर्म राज्य की स्थापना हो जाती।
निश्चियात्मक रूप से कहा जा सकता है कि भगवान् श्रीकृष्ण का इस धरा धाम पर अवतरण केवल आसुरी शक्तियों के विनाश और धर्म स्थापना के लिए ही नहीं हुआ था, अपितु वे अपने प्रेमी भक्तों को अपनी दिव्य लीलाओं के माध्यम से आत्मानंद प्रदान करने के निमित्त भी अवतरित हुए, भगवान् श्री कृष्ण ने सगुण, साकार रूप धरकर जहां धर्म राज्य की स्थापना की, वहीं अपने प्रेमी भक्तों को दिव्यातिदिव्य प्रेमामृत प्रदान किया।
इस जगत् में सभी जीव सुख और आनंद की चाहना रखते है। मनुष्य मात्र जो कि अपने लिए आनंद चाहते हैं, और सांसारिक सुखों में आनंद ढूंढते आए हैं, किंतु उन्हें आनंद का लेशमात्र भी प्राप्त नहीं हुआ, क्यौंकि वह दिव्य आनंद सांसारिक सुखों में है ही नहीं, अपितु वह आनंद तो प्रभु शरणागति और प्रभु प्रेम में ही निहित है। ईश्वर के प्रणिधान जिन मनुष्यों ने इस अकाट्य सत्य को जाना, और भगवान् श्रीकृष्ण के शरणापन्न होकर अपने जीवन की बागडोर उनके हाथों में सौंप दी, वे सदा सदा के लिए अभयत्व, अमरत्व और प्रेमानंद पाने के अधिकारी बन गए। यह प्रेमाधिकार कदाचित भी एकतरफा नहीं हुआ।
भगवान् श्रीकृष्ण के शुद्ध भक्त जैसे प्रभु प्रेम के निमित्त, उनके प्रेम को लालायित रहते हैं, ऐसे ही भगवान् भी अपने निज जनों को अपनाने को सदैव तत्पर रहते हैं, इसीलिए वे अपने शरणागत प्रेमी जीवों पर कृपा कर सगुण रूप धारण कर अवतरित होते हैं, और उन्हें प्रेमानंद प्रदान करते हुए उनकी प्रेम प्राप्ति की आकांक्षा को पूरी करते हैं, और विभिन्न लीलाएं करते हुए संपूर्ण जगत् को धन्य धन्य कर देते हैं। भगवान् श्रीकृष्ण का पृथ्वी लोक पर यह अवतरण और उनकी लीलाएं दिव्यतम, मधुर और जगत् को आनंद प्रदान करने वाली होती है, जिनका कीर्तन, श्रवण और स्मरण कर जगत् अति हर्षित, उल्लसित और वैभववान हो जाता है।
श्रीमद्भगवद्गीता की टीका साधक संजीवनी में महात्मा रामसुखदासजी महाराज लिखते हैं कि सर्वसमर्थ भगवान् अवतार लिए बिना भी संतजनों की रक्षा, दुष्टों का विनाश और धर्म की स्थापना कर सकते हैं, किंतु वे अपने प्रेमी भक्तों को प्रभु के सान्निध्य प्राप्त करने की उनकी अंतर्निहित भावनाओं को पूर्ण करने के निमित्त से अवतार लेते हैं। इस तरह श्रीभगवान् जीवों पर विशेष कृपा करने हेतु स्वयं को मनुष्य रूप में प्रकट कर ऐसी लीलाएं करते हैं, जिससे अवतार काल में भगवान् के दर्शन, स्पर्श वार्तालाप आदि से और भविष्य में उनकी दिव्य लीलाओं के श्रवण, चिंतन, ध्यान और उपदेशों के आचरण से लोगों का सहज रूप से उद्धार हो जाता है, और इसी प्रकार लोगों का सदा उद्धार होता रहे, इसी उद्देश्य से भगवान् अवतार धारण करते हैं।
श्री रामचरितमान में तुलसीदासजी कहते हैं कि देवी पार्वती के श्री रामावतार के बारे में प्रश्न करने पर भगवान् शिव कहते हैं- देवी! श्रीरामचन्द्रजी के जन्म लेने के अनेक कारण हैं, जो एक से एक बढ़कर विचित्र हैं। भगवान् शिव कहते है-जब धर्म का ह्रास होता है, नीच अभिमानी राक्षसों की वृद्धि होकर अन्याय बढ़ जाता है, ब्राह्मण, गौ, देवता और पृथ्वी कष्ट पाते हैं, तब वे कृपा निधान भांति भांति के दिव्य शरीर धारण कर सज्जनों की पीड़ा हरते हैं। वे असुरों का अंत करते हैं, वैदों की मर्यादा की रक्षा करते हैं, और जगत् में अपना निर्मल यश फैलाते हैं, उसी यश को गा गाकर प्रभु के भक्तजन भवसागर से तर जाते हैं। कृपा के सागर वे भगवान् अपने प्रेमी भक्त जनों के हितार्थ शरीर धारण करते हैं।
(लेखक हिंदुस्थान समाचार से संबद्ध हैं और श्रीमद्भागवत कथा वाचक हैं)
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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. उमेश चंद्र शर्मा

