अंतरिक्ष में भारत का अगला कदम अब कुछ ही दूर है!
- डॉ. मयंक चतुर्वेदी
भारत की अंतरिक्ष यात्रा अब एक नए युग में प्रवेश कर रही है, जहां उसके सपने उपग्रह प्रक्षेपण या चंद्रमा-मंगल तक सीमित नहीं रह गए हैं, लक्ष्य है; अंतरिक्ष में अपना स्थायी ठिकाना बनाना। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) द्वारा प्रस्तावित ‘भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन’ (बीएएस) इसी महत्वाकांक्षा का प्रतीक है।
भारत की अंतरिक्ष यात्रा अब एक ऐसे निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुकी है, जहां वह उपग्रह प्रक्षेपण और चंद्र मिशनों के आगे मानव अंतरिक्ष अन्वेषण में उड़ान भरने को उद्यत है, इसलिए भारत आज इसके अगले चरण स्वदेशी स्पेस स्टेशन की दिशा में तेजी से कदम बढ़ा रहा है। इसरो प्रोपल्शन कॉम्प्लेक्स के निदेशक ए. पकीराज के अनुसार, भारत इसके लिए रूस के दशकों पुराने अनुभव का लाभ उठाना चाहता है। विशेष रूप से कंट्रोल सिस्टम, पावर सप्लाई, कम्युनिकेशन और ट्रैकिंग जैसे महत्वपूर्ण सब-सिस्टम में दोनों देशों के बीच सहयोग की व्यापक संभावनाएं हैं। निश्चित ही यह सहयोग विज्ञान में सामरिक और दीर्घकालिक साझेदारी का संकेत भी है।
कोई प्रश्न खड़ा कर सकता है कि रूस का सहयोग ही क्यों लेना? तब इसका सीधा उत्तर यह है कि भारत और रूस के बीच अंतरिक्ष सहयोग का इतिहास अत्यंत समृद्ध और भरोसेमंद रहा है। वर्ष 1975 में भारत का पहला उपग्रह आर्यभट सोवियत संघ की सहायता से ही प्रक्षेपित किया गया था। इसके बाद 1984 में राकेश शर्मा को अंतरिक्ष में भेजने में भी सोवियत संघ (अब रूस) ने अहम भूमिका निभाई थी। यह भारत के अंतरिक्ष इतिहास का गौरवपूर्ण क्षण था।
इसके अलावा क्रायोजेनिक इंजन तकनीक के विकास में रूस का सहयोग भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। वर्तमान में चल रहे गगनयान मिशन के तहत भारतीय अंतरिक्ष यात्रियों (व्योमयानियों) के प्रशिक्षण में भी रूस की भूमिका निर्णायक रही है। यह दीर्घकालिक सहयोग अब इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन परियोजना के माध्यम से एक नए आयाम में प्रवेश कर सकता है।
फिलहाल इसरो की योजना के अनुसार, भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन वर्ष 2035 तक तैयार हो जाएगा। इसे पृथ्वी से लगभग 450 किलोमीटर की ऊंचाई पर स्थापित किया जाएगा और इसका झुकाव 51.6 डिग्री होगा। यह संरचना काफी हद तक रूस के प्रस्तावित रशियन ऑर्बिटल स्टेशन (आरओएस) के समान होगी। क्योंकि इस ऊंचाई और झुकाव का चयन वैज्ञानिक अनुसंधान, पृथ्वी अवलोकन और अंतरिक्ष प्रयोगों के लिए उपयुक्त माना जाता है।
यहां सबसे अधिक इस सफलता के साथ जुड़ी अच्छी बात यह है कि ‘भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन’ का निर्माण भारत को उन चुनिंदा देशों की श्रेणी में खड़ा करेगा, जिनके पास अपना स्वतंत्र मानवयुक्त अंतरिक्ष स्टेशन हैं। वर्तमान में चीन के पास ही सक्रिय मानवयुक्त स्पेस स्टेशन है, जबकि इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन को 2030-31 तक डीकमीशन किए जाने की योजना है। ऐसे में वैश्विक स्तर पर नए स्पेस स्टेशनों की आवश्यकता और सहयोग के अवसर तेजी से बढ़ रहे हैं।
यहां उल्लेखित यह भी है कि इसरो का गगनयान मिशन भारत की पहली मानव अंतरिक्ष उड़ान परियोजना है, जिसके तहत भारतीय अंतरिक्ष यात्रियों को पृथ्वी की निचली कक्षा में भेजा जाएगा। इस मिशन के सफल होने के बाद ‘भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन’ परियोजना को और गति मिलेगी। गगनयान, ‘भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन’ के लिए एक आधार तैयार करेगा, जहां भारत मानव जीवन समर्थन प्रणाली, अंतरिक्ष में दीर्घकालिक निवास और वैज्ञानिक प्रयोगों का अनुभव प्राप्त करेगा।
वर्तमान समय में निश्चित ही यह हर भारतीय के लिए गौरव की बात है कि भारत की अंतरिक्ष उपलब्धियों ने वैश्विक स्तर पर अपनी विश्वसनीयता सिद्ध की है। चंद्रयान-3 की ऐतिहासिक सफलता ने भारत को चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर उतरने वाला पहला देश बना दिया। इससे पहले मंगलयान ने भारत को मंगल ग्रह की कक्षा में पहली ही कोशिश में पहुंचने वाला पहला देश बना दिया था।
वस्तुत: इन मिशनों ने न सिर्फ भारत की वैज्ञानिक क्षमता को प्रदर्शित किया, बल्कि कम लागत में उच्च गुणवत्ता वाले अंतरिक्ष कार्यक्रमों का एक वैश्विक मॉडल भी प्रस्तुत किया। यही दक्षता ‘भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन’ परियोजना में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। यहां इसकी चर्चा भी आवश्यक है क इसरो ने अपने प्रक्षेपण यानों के क्षेत्र में भी व्यापक प्रगति की है। जीएसएलवी एमके III (अब एलवीएम3) भारत का सबसे शक्तिशाली प्रक्षेपण यान है, जिसका उपयोग गगनयान मिशन में किया जाएगा।
इसके अलावा पीएसएलवी (पोलर सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल) ने विश्वसनीयता का एक नया मानक स्थापित किया है और यह विदेशी उपग्रहों के प्रक्षेपण के लिए भी एक प्रमुख माध्यम बन चुका है। इतना ही नहीं भारत अब निजी क्षेत्र को भी अंतरिक्ष क्षेत्र में शामिल कर रहा है, जिससे नवाचार और रोजगार के नए अवसर पैदा हो रहे हैं। इन-स्पेस और एनएसआईएल जैसे संस्थानों के माध्यम से स्टार्टअप्स और निजी कंपनियों को प्रोत्साहित किया जा रहा है।
ऐसे में स्वभाविक है कि इसरो की उपलब्धियां देश के युवाओं में विज्ञान और तकनीक के प्रति गहरी रुचि पैदा कर रही हैं। चंद्रयान और मंगलयान जैसी सफलताओं ने यह सिद्ध किया है कि सीमित संसाधनों के बावजूद बड़े लक्ष्य हासिल किए जा सकते हैं। अब ‘भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन’ परियोजना भी युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बनेगी। उन्हें अंतरिक्ष विज्ञान, रोबोटिक्स, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और एयरोस्पेस इंजीनियरिंग जैसे क्षेत्रों में करियर बनाने के लिए प्रेरित करेगी।
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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी

