सिंधु सभ्यता पर पाकिस्तान का दावा, कहीं छिपा एजेंडा तो नहीं?
-कौशल मूंदड़ा-
सिंधु सभ्यता को लेकर पाकिस्तान द्वारा हाल ही में अपनाए जा रहे रुख ने भारत के इतिहासकारों, पुराविदों और सांस्कृतिक विरासत के विशेषज्ञों के बीच गंभीर चिंता पैदा कर दी है। यदि समय रहते इस विषय पर तथ्याधारित अंतरराष्ट्रीय विमर्श नहीं हुआ तो यह विवाद केवल सांस्कृतिक दावेदारी तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि विश्व इतिहास की सबसे प्राचीन नगरीय सभ्यताओं में से एक के स्वरूप, नाम और ऐतिहासिक व्याख्या को प्रभावित करने का प्रयास भी बन सकता है।
किसी भी प्राचीन सभ्यता का मूल्यांकन आधुनिक राजनीतिक सीमाओं के आधार पर नहीं किया जा सकता। सिंधु सभ्यता का विकास उस समय हुआ था, जब न भारत एक आधुनिक राष्ट्र-राज्य था और न ही पाकिस्तान का अस्तित्व था। इसलिए किसी वर्तमान राष्ट्र द्वारा उस पूरी सभ्यता पर विशिष्ट स्वामित्व का दावा करना इतिहास की स्थापित पद्धति के अनुरूप नहीं माना जा सकता।
पाकिस्तान लंबे समय से मोहनजोदड़ो और हड़प्पा जैसे अपने भूभाग में स्थित पुरास्थलों को राष्ट्रीय विरासत के रूप में प्रस्तुत करता रहा है, जो स्वाभाविक भी है। किंतु हाल के वर्षों में जिस प्रकार ‘पांच हजार वर्ष पुराना पाकिस्तान’ जैसी अवधारणाओं को बढ़ावा दिया गया है तथा सिंधु सभ्यता को पाकिस्तान की ऐतिहासिक पहचान के मूल आधार के रूप में प्रस्तुत करने के प्रयास दिखाई दिए हैं, उन्होंने नई बहस को जन्म दे दिया है। जबकि, पूरी दुनिया जानती है कि पाकिस्तान का अस्तित्व ही सन् 1947 से है।
इस विषय पर चिंतन की आवश्यक इसलिए भी है क्योंकि पाकिस्तान पिछले कुछ समय से लगातार ऐसे बयान जारी कर रहा है। अप्रैल 2025 में पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत द्वारा सिंधु जल संधि को स्थगित करने की घोषणा के बाद 2025 के उत्तरार्ध में पाकिस्तान ने ‘इंडस’ विरासत को राष्ट्रीय पहचान से जोड़ने वाले अभियानों को गति देना शुरू कर दिया। जून 2026 में सिंधु जल संधि विवाद के समानांतर पाकिस्तान ने सिंधु सभ्यता को अधिक प्रमुखता से प्रस्तुत करना शुरू किया। हाल ही, जुलाई 2026 मंे इस्लामाबाद में आयोजित अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रमों में सिंधु जल और सांस्कृतिक विरासत के मुद्दे को साथ रखकर भारत की आलोचना की गई।
इतिहास केवल भूगोल नहीं, स्मृति भी है
इतिहास को समझने के लिए केवल वर्तमान मानचित्र पर्याप्त नहीं होते। समय के साथ कई नगरों, नदियों, क्षेत्रों और सांस्कृतिक केंद्रों के नाम बदलते रहे हैं। यदि इन परिवर्तनों को ऐतिहासिक संदर्भ से अलग कर देखा जाए तो आने वाली पीढ़ियों के सामने इतिहास की वास्तविक निरंतरता धुंधली पड़ सकती है।
जो विद्यार्थी और शोधार्थी इतिहास विषय के हैं, वे प्राचीन नामों और उनके आधुनिक रूपों का अध्ययन करते हैं, किंतु इतिहास से इतर विषयों के अधिकांश विद्यार्थियों के लिए यह जानकारी नई हो सकती है कि आज की नीलम घाटी प्राचीन ग्रंथों में किशनगंगा के नाम से वर्णित है और आज का काबुल भारतीय प्राचीन ग्रंथों में कुबा के नाम से अपना स्थान रखता है। श्रीनगर स्थित शंकराचार्य मठ का पर्वत आज तख्त-ए-सुलेमान के नाम से भी जाना जाता है।
इसी तरह, लायलपुर आज फैसलाबाद कहलाता है। सांकल का वर्तमान नाम सियालकोट है। वितस्ता का आधुनिक नाम झेलम है। आस्किनी आज चिनाब कहलाती है। प्राचीन हरिरुद को आज हेलमंड के नाम से जाना जाता है। गांधार का आधुनिक रूप कंधार है। वराहमूल आज बारामूला कहलाता है।
नामों के इन परिवर्तनों को समझे बिना प्राचीन ग्रंथों और पुरातात्विक साक्ष्यों का समुचित अध्ययन संभव नहीं है। यही कारण है कि किसी सभ्यता की पहचान को केवल आधुनिक नामों और वर्तमान राजनीतिक सीमाओं के आधार पर परिभाषित करना ऐतिहासिक दृष्टि से अधूरा माना जाता है।
सिंधु सभ्यता का वास्तविक विस्तार
वरिष्ठ पुरातत्वविद व साहित्य संस्थान के सेवानिवृत्त निदेशक डॉ. जीवन सिंह खरकवाल कहते हैं कि सिंधु सभ्यता का विस्तार वर्तमान पाकिस्तान, भारत तथा अफगानिस्तान के कुछ भागों तक था। इसके प्रमुख नगर मोहनजोदड़ो और हड़प्पा आज पाकिस्तान में स्थित हैं, जबकि धोलावीरा, राखीगढ़ी, लोथल, कालीबंगन, बनावली सहित 900 से अधिक महत्वपूर्ण पुरास्थल भारत में हैं, जबकि पाकिस्तान में 600 ही हैं। ज्ञात पुरास्थलों की संख्या के आधार पर भी भारत का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। उनका मानना है कि यह सभ्यता किसी एक आधुनिक राष्ट्र की नहीं, बल्कि पूरे उत्तर-पश्चिम भारतीय उपमहाद्वीप की साझा सांस्कृतिक विरासत है।
क्या केवल सांस्कृतिक प्रस्तुति है या उससे आगे की तैयारी?
चिंता केवल इस बात तक सीमित नहीं है कि पाकिस्तान अपने भूभाग में स्थित पुरास्थलों को प्रचारित कर रहा है। उनकी वास्तविक चिंता यह है कि कहीं यह प्रयास धीरे-धीरे इतिहास की नई व्याख्या स्थापित करने की दिशा में तो नहीं बढ़ रहा। सभ्यता अध्ययन केन्द्र नई दिल्ली के सह निदेशक डॉ. विवेक भटनागर का मत है कि यदि किसी सभ्यता की उत्पत्ति, उसके सांस्कृतिक आधार और उसके भौगोलिक विस्तार को क्रमशः नए राजनीतिक आख्यानों के अनुरूप प्रस्तुत किया जाने लगे, तो भविष्य में अंतरराष्ट्रीय विमर्श प्रभावित हो सकता है। इसी कारण वे इस विषय को गंभीरता से लेने की आवश्यकता पर बल दे रहे हैं। इतिहास में कई उदाहरण ऐसे मिलते हैं, जहां लंबे समय तक दोहराए गए राजनीतिक आख्यान बाद में सामान्य धारणा का रूप ले गए। इसलिए सिंधु सभ्यता जैसे वैश्विक महत्व के विषय पर तथ्यात्मक और प्रमाण-आधारित विमर्श अत्यंत आवश्यक है।
नाम बदलने की आशंका भी?
यह आशंका भी है कि यदि किसी सभ्यता की पहचान को नए राजनीतिक आख्यानों से जोड़ने का प्रयास जारी रहा, तो भविष्य में उसके नाम, सांस्कृतिक स्वरूप अथवा ऐतिहासिक प्रस्तुतीकरण में भी परिवर्तन की कोशिश की जा सकती है। यद्यपि ऐसा कोई आधिकारिक कदम अब तक सामने नहीं आया है, फिर भी इस संभावना को पूरी तरह नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। विश्व विरासत से जुड़े विषयों में समय रहते तथ्यात्मक हस्तक्षेप और अकादमिक संवाद आवश्यक होता है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शोध और संवाद की मांग
सिंधु सभ्यता जैसे विषय को भारत-पाकिस्तान के द्विपक्षीय विवाद के रूप में नहीं, बल्कि मानव सभ्यता की साझा धरोहर के रूप में देखा जाना चाहिए। इसके लिए यूनेस्को, अंतरराष्ट्रीय पुरातत्व संस्थानों और इतिहास शोध संस्थाओं के स्तर पर व्यापक विमर्श, संयुक्त शोध और प्रमाण-आधारित अध्ययन को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। इतिहास का संरक्षण भावनाओं से नहीं, बल्कि पुरातात्विक साक्ष्यों, अभिलेखों, वैज्ञानिक अनुसंधानों और प्रमाणित स्रोतों के आधार पर होना चाहिए। यदि किसी प्रकार का पुनर्लेखन या एकपक्षीय व्याख्या सामने आती है तो उसका उत्तर भी तथ्यों और शोध के माध्यम से ही दिया जाना चाहिए।
महती आवश्यकता है भारत सरकार इस विषय पर गंभीरता से विचार करे तथा अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत के पुरातात्विक और ऐतिहासिक साक्ष्यों को अधिक प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करे। यह केवल अतीत का प्रश्न नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए ऐतिहासिक सत्य के संरक्षण का विषय है। भारत के पास सिंधु सभ्यता से जुड़े समृद्ध पुरातात्विक साक्ष्य, शोध और अकादमिक सामग्री उपलब्ध है। आवश्यकता इस बात की है कि उन्हें वैश्विक स्तर पर व्यवस्थित रूप से प्रस्तुत किया जाए, ताकि मानव सभ्यता की इस अमूल्य धरोहर का इतिहास किसी राजनीतिक आख्यान का नहीं, बल्कि प्रमाणित तथ्यों का इतिहास बना रहे। सिंधु सभ्यता किसी आधुनिक राष्ट्र की संपत्ति नहीं बल्कि सम्पूर्ण मानवता की साझा धरोहर है। इसलिए इसके इतिहास, स्वरूप और पहचान से जुड़ा प्रत्येक दावा पुरातात्विक साक्ष्यों, वैज्ञानिक अनुसंधान और स्थापित इतिहासलेखन की कसौटी पर परखा जाना चाहिए।
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार व पुरातत्व शोधार्थी हैं)
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हिन्दुस्थान समाचार / सुनीता

