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रुपए को भारतीय नागरिक ही दिला सकते हैं मजबूती

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रुपए को भारतीय नागरिक ही दिला सकते हैं मजबूती


प्रहलाद सबनानी

अंतरराष्ट्रीय बाजार में अमेरिकी डॉलर की तुलना में भारतीय रुपए की कीमत लगातार नीचे गिर रही है। ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि भारत में विभिन्न उत्पादों के आयात बहुत अधिक मात्रा में हो रहे हैं, जबकि तुलनात्मक रूप से भारत से विभिन्न उत्पादों के निर्यात कम मात्रा में हो रहे हैं और इससे भारत का व्यापार घाटा लगातार बढ़ता जा रहा है। बाजार में किसी भी वस्तु की कीमत उसकी मांग एवं आपूर्ति से तय होती है, भारत में विभिन्न वस्तुओं के आयात अधिक होने के चलते एवं इन आयातित वस्तुओं का भुगतान करने के लिए भारत को अमेरिकी डॉलर की आवश्यकता अधिक है और तुलनात्मक रूप से निर्यात कम होने के चलते भारत को अमेरिकी डॉलर की आपूर्ति कम मात्रा में हो रही है।

अतः अमेरिकी डॉलर की मांग अधिक होने एवं आपूर्ति कम होने से अमेरिकी डॉलर की तुलना में भारतीय रुपए की कीमत लगातार नीचे गिर रही है। पिछले 90 दिनों के दौरान एक अमेरिकी डॉलर की कीमत अधिकतम 96.7908 रुपए और न्यूनतम कीमत 94.3986 तक रही है। आज यह पुनः 96 रुपए प्रति अमेरिकी डॉलर के स्तर से ऊपर पहुंच गई है। इस स्थिति को सुधारने में भारतीय नागरिकों को अपना महत्वपूर्ण योगदान देने की अधिक आवश्यकता है।

दरअसल, भारतीय नागरिकों की आय में वृद्धि दर्ज होने के चलते वे समाज में अपने रुतबे को बढ़ता हुआ दिखाने के लिए आयातित वस्तुओं का उपयोग करने लगते हैं, जबकि देश में ही निर्मित यह उत्पाद पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हैं। भारतीय नागरिकों द्वारा आयातित उत्पादों के अधिक उपयोग के कारण देश में वस्तुओं का आयात बढ़ता है और यह अमेरिकी डॉलर की मांग में वृद्धि करता है।

हाल ही के समय में भारतीय शेयर बाजार से भी विदेशी संस्थागत निवेशक भारी मात्रा में अपने निवेश को वापस निकाल रहे हैं क्योंकि अमेरिकी डॉलर की तुलना में भारतीय रुपए की कीमत कम हो रही है और इससे विदेशी निवेशकों को नुकसान हो रहा है। कैलेंडर वर्ष 2026 में अभी तक विदेशी संस्थागत निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार से 2.8 लाख करोड़ रुपए की राशि निकाल ली है।

सितम्बर 2024 तक के 24 माह में विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार में 38,600 करोड़ अमेरिकी डॉलर का निवेश किया था जबकि सितम्बर 2026 तक के 24 माह में 56,300 करोड़ अमेरिकी डॉलर की निकासी की गई हैं। हालांकि, इस बीच भारतीय अर्थव्यवस्था लगातार मजबूत बनी हुई है और भारत के सकल घरेलू उत्पाद में लगभग 8 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज हो रही है। इस बीच अमेरिका में बांड यील्ड में भी तेजी से वृद्धि हुई है और यह यील्ड 30 वर्ष की अवधि के बांड पर 5.595 प्रतिशत के स्तर तक पहुंच गई है जो पिछले 20 वर्षों से अधिक समय (वर्ष 2002 के बाद) में सबसे अधिक है।

दरअसल, भारत में ब्याज दरें अमेरिका से अधिक होने के चलते विदेशी संस्थागत निवेशक भारत के शेयर बाजार में अपना निवेश बढ़ाते जा रहे थे। परंतु, हाल ही के वर्षों में अमेरिका में ब्याज दरों में वृद्धि दृष्टिगोचर है, जिसके चलते इन विदेशी संस्थागत निवेशकों द्वारा अब भारतीय शेयर बाजार से निवेश निकाल कर अमेरिकी शेयर बाजार में निवेश किया जा रहा है। वैसे भी, भारत की आर्थिक प्रगति को विश्व के कई देश सहन नहीं कर पा रहे हैं एवं भारत को वे अपना प्रतिस्पर्धी मान रहे हैं।

अतः भारत को इन परिस्थितियों से अपने नागरिकों के बल पर स्वयं ही निपटना होगा, किसी भी अन्य देश से सहायता की उम्मीद करना उचित नहीं होगा। आज भारत को प्रत्येक क्षेत्र में आत्म निर्भर बनाने की सबसे अधिक आवश्यकता है।

भारत में केवल आर्थिक विकास की दर ही आकर्षक नहीं रही है बल्कि भारत के लिए विदेश व्यापार के मोर्चे पर भी अगस्त 2026 माह में मजबूत प्रदर्शन देखने को मिला है। अगस्त 2026 माह में भारत से कुल निर्यात (उत्पादों एवं सेवाओं सहित) 25.41 प्रतिशत बढ़कर 8,268 करोड़ अमेरिकी डॉलर का रहा है, जो बीते वर्ष की समान अवधि में 6,593 करोड़ अमेरिकी डॉलर का रहा था। वहीं, अगस्त 2026 माह में आयात 9,209 करोड़ अमेरिकी डॉलर का रहा है, जो बीते वर्ष अगस्त 2025 में 7,755 करोड़ अमेरिकी डॉलर का रहा था।

इस तरह से निर्यात में तेज बढ़ोतरी के चलते देश का व्यापार घाटा घटकर 941 करोड़ अमेरिकी डॉलर का रह गया है। बीते वर्ष अगस्त 2025 माह में व्यापार घाटा 1,162 करोड़ अमेरिकी डॉलर का रहा था। इसी प्रकार अगस्त 2026 माह में विभिन्न उत्पादों (वस्तुओं) का निर्यात 26.12 प्रतिशत बढ़कर 4,381 करोड़ अमेरिकी डॉलर के स्तर को पार कर गया है, जो अगस्त 2025 माह में 3,473 करोड़ अमेरिकी डॉलर का रहा था। अगस्त 2026 माह में पिछले 10 वर्षों के दौरान सबसे अधिक वस्तुओं का निर्यात हुआ है। इस अवधि में सेवाओं के निर्यात में भी अच्छी वृद्धि दर्ज हुई है।

इसी प्रकार, अगस्त 2026 माह में ही भारत में औद्योगिक उत्पादन सूचकांक में भी 8 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज हुई है। विनिर्माण क्षेत्र में तो और अधिक 9 प्रतिशत एवं बिजली एवं गैस आपूर्ति क्षेत्र में 12.3 प्रतिशत की मजबूत वृद्धि दर्ज हुई हैं। केंद्र सरकार के पूंजीगत खर्चों में वृद्धि दर्ज हुई है एवं अब निजी क्षेत्र द्वारा भी पूंजीगत खर्चों में वृद्धि की जा रही है। विनिर्माण क्षेत्र की इकाईयों की उत्पादन क्षमता का उपयोग 75 प्रतिशत से ऊपर पहुंच गया है, इसके बाद सामान्यतः विनिर्माण इकाईयां अपनी उत्पादन क्षमता का विस्तार करने पर विचार प्रारम्भ करती है।

भारत के सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि दर आकर्षक है, औद्योगिक उत्पादन में वृद्धि दर उल्लेखनीय है, विभिन्न वस्तुओं एवं सेवाओं के निर्यात भी तेज गति से बढ़ रहे हैं, फिर भी भारतीय शेयर बाजार से विदेशी संस्थागत निवेशक अपना निवेश क्यों निकाल रहे हैं एवं भारतीय रुपए की कीमत अंतरराष्ट्रीय बाजार में लगातार क्यों गिर रही है। इस विषय पर गम्भीरता से विचार करने की आज आवश्यकता है।

दरअसल अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारत द्वारा आयातित वस्तुओं के दाम तेजी से बढ़ रहे हैं और भारत का व्यापार घाटा लगातार बढ़ रहा है। जिससे भारत को अमेरिकी डॉलर की अधिक आवश्यकता महसूस हो रही है एवं इससे अमेरिकी डॉलर की मांग में वृद्धि दिखाई दे रही है जिससे अमेरिकी डॉलर भारतीय रुपए की तुलना में मजबूत हो रहा है एवं रुपया कमजोर हो रहा है। इस ट्रेंड को बदलने के लिए भारत को विभिन्न वस्तुओं के उत्पादन में आत्म निर्भरता प्राप्त करने की आज सबसे अधिक आवश्यकता है, ताकि विभिन्न उत्पादों के आयात को कम किया जा सके और भारत अपने व्यापार घाटे को व्यापार आधिक्य में बदलने में सफल हो सके, इसलिए आज भारतीय नागरिकों को गम्भीरता से चिंतन/मनन/विचार करने की महती आवश्यकता है एवं किस प्रकार केवल देश में ही निर्मित उत्पादों का उपयोग किया जाय और आयातित वस्तुओं के उपभोग को बंद कर दिया जाय।

विभिन्न सामाजिक संस्थानों को भी इस दृष्टि से आम नागरिकों को जागरूक करने का काम प्रारम्भ करना होगा। इस संदर्भ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एवं स्वदेशी जागरण मंच द्वारा लगातार यह प्रयास किए जा रहे हैं कि भारत में केवल स्वदेशी उत्पादों का ही उपयोग होना चाहिए। इस अभियान के अंतर्गत नागरिकों को यह भी जानकारी दी जाती है कि कौन-सा उत्पाद विशेष आयातित है एवं कौन-सा उत्पाद विशेष देश में ही निर्मित है। अब समय आ गया है कि धार्मिक, सांस्कृतिक, सामाजिक संस्थानों एवं एनजीओ को मिलकर इस अभियान को समाज एवं नागरिकों के बीच ले जाना होगा। ताकि, भारत में विभिन्न उत्पादों के आयात को कम किया जा सके एवं भारतीय रुपए पर आ रहे दबाव को कम किया जा सके।

अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें भी लगातार बढ़ रही हैं और यह लगातार 100 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल के स्तर को भी पार कर गई हैं। भारत तो कच्चे तेल की अपनी कुल खपत का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा आयात करता है। कच्चे तेल के आयात का भुगतान भी अमेरिकी डॉलर में ही करना होता है, इससे भारतीय रुपए पर दबाव बढ़ रहा है। महंगे कच्चे तेल के आयात से भारत में मंहगाई का भी आयात हो रहा है। भारत में भी उपभोक्ता मूल्य सूचकांक के आधार पर मुद्रा स्फीति की दर 4.8 प्रतिशत तक पहुंच गई है और थोक मूल्य सूचकांक के आधार पर तो यह 10 प्रतिशत के आसपास पहुंच गई है।

दूसरे, अमेरिका एवं अन्य कई देशों में बांड यील्ड अपने उच्चत्तम स्तर पर पहुंच गई हैं। अतः बहुत सम्भव है कि भारत में मुद्रा स्फीति की दर को नियंत्रण में लाने के उद्देश्य से भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा माह अक्टूबर 2024 के दौरान रेपो दर में 25 आधार बिंदुओं की वृद्धि की घोषणा की जाय। रेपो दर में वृद्धि से भारत में ऋण पर अदा की जाने वाली ब्याज की राशि में वृद्धि होगी और इससे अंततः विभिन्न वस्तुओं की उत्पादन लागत में वृद्धि होगी और बाजार में उत्पादों की कीमतें भी बढ़ना प्रारम्भ होंगी।

कुल मिलाकर आज, उक्त वर्णित परिस्थितियों के बीच भारतीय नागरिकों, भारतीय समाज एवं विभिन्न प्रकार की धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक संस्थानों तथा विभिन्न क्षेत्रों एवं समाज के बीच में कार्य कर रहे एनजीओ को मिलकर एक अभियान ही चलाना होगा कि केवल भारत में निर्मित वस्तुओं का उपयोग किया जाय तथा आयातित वस्तुओं के प्रयोग को एकदम बंद कर दिया जाय। साथ ही, पेट्रोल एवं डीजल की खपत को भी नियंत्रित करने की आवश्यकता है, इससे कच्चे तेल के आयात को कम किया जा सकेगा। भारतीय नागरिकों द्वारा अपने दो पहिया एवं चार पहिया वाहनों के स्थान पर पब्लिक ट्रान्स्पोर्ट के उपयोग को बढ़ावा दिया जा सकता है।

(लेखक, आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ एवं स्तम्भकार हैं।)

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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी