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74 प्रतिशत उद्यमी बाहर क्यों देख रहे हैं? भारत के लिए यह चेतावनी है

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74 प्रतिशत उद्यमी बाहर क्यों देख रहे हैं? भारत के लिए यह चेतावनी है


- डॉ. मयंक चतुर्वेदी

किसी देश की आर्थिक शक्ति का आकलन उसकी जीडीपी की रफ्तार से आगे जाकर यह देखकर समझ आता है कि उस देश के सफल उद्यमी अपने भविष्य का आर्थिक नक्शा कैसे तैयार करते हैं। एचएसबीसी की ‘ग्लोबल एंटरप्रेन्योरियल वेल्थ रिपोर्ट 2026’ की सामने आई रिपोर्ट भारत के वर्तमान एवं भविष्य के लिए एक चिंता की लकीर खींचती है। क्योंकि इसके अनुसार सर्वेक्षण में शामिल 74 प्रतिशत भारतीय उद्यमी विदेश में स्थानांतरित होने या अतिरिक्त निवास स्थान जोड़ने की योजना बना रहे हैं। वैश्विक औसत 70 प्रतिशत है। भारतीय उद्यमियों में सिंगापुर 14 प्रतिशत के साथ पहली पसंद है, जबकि फ्रांस, ब्रिटेन और अमेरिका को 11-11 प्रतिशत ने चुना है। निश्चित ही यह आंकड़ा गंभीर है।

यहां प्रश्न पूंजी के निर्णायक प्रवाह का है। क्योंकि एक उद्योजक जहां अपना मुख्यालय रखेगा, उसी से उसके अनुसंधान, बौद्धिक संपदा और अगली पीढ़ी के रोजगार का निर्धारण होगा, जो किसी भी देश के लिए अर्थव्यवस्था के विकास की धुरी है। वस्तुत: इसे हम ऐसे भी समझ सकते हैं कि किसी भारतीय उद्यमी का सिंगापुर में घर है, तब स्वाभाविक वैश्विक विस्तार के जितने भी बड़े निर्णय होंगे वे वहीं से होंगे। वहीं यदि घर भारत में है तो अनुसंधान और उत्पादन का अधिकांश केंद्र भारत होगा।

बेशक, किसी उद्यमी का वैश्विक होना देश की आर्थिक शक्ति बनता है परन्तु चिंता उस स्थिति में बढ़ती है जब विदेश में निवास के साथ मुख्यालय, निवेश, अनुसंधान, बौद्धिक संपदा और उच्च कौशल वाले रोजगार भी धीरे-धीरे बाहर जाने लगें। उद्यमी विदेश में अवसर तलाशता है तब वह अपने और अपनी कंपनी के लिए कर व्यवस्था, नीति की स्थिरता, वित्तीय बाजार, प्रतिभा, बुनियादी ढांचे और तकनीकी वातावरण जैसे अनेक पहलुओं को देख रहा होता है। उद्यमी यह जानना चाहता है कि निवेश के बाद नियम कितने स्थिर रहेंगे और अनुबंध कितनी मजबूती से लागू होंगे क्योंकि व्यवसाय में अनिश्चितता की आर्थिक कीमत बहुत बड़ी होती है।

वैसे एचएसबीसी रिपोर्ट का एक पक्ष बहुत सकारात्मक भी है, जिसमें कि 97 प्रतिशत भारतीय उद्यमी अपनी व्यक्तिगत संपत्ति में सुधार की उम्मीद रखते हैं और अपने कारोबारी भविष्य को लेकर सकारात्मक हैं। इससे इतना तो साफ हो गया है कि भारत में उद्यमिता का विश्वास आधार मजबूत है। भारतीय उद्यमी अवसर देख रहे हैं, तकनीकी बदलाव को समझ रहे हैं और नए बाजार तलाश रहे हैं। वे अपनी पूंजी का वैश्विक विविधीकरण भी कर रहे हैं।

वास्तव में यही भारत के लिए अवसर है। वस्तुत: यदि उद्यमी वैश्विक विस्तार चाहता है तो भारत को ऐसा वातावरण देना होगा जहां उसके कारोबार की सबसे मजबूत जड़ें देश में रहें। विदेश उसके लिए बाजार बने, निवेश का अतिरिक्त केंद्र बने और वैश्विक नेटवर्क का हिस्सा बने, ताकि वह भारत उसका मुख्य आर्थिक आधार बना रहे।

उक्त एचएसबीसी रिपोर्ट बता रही है कि 99 फीसद भारतीय उद्यमियों ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता के कारण अपने कारोबारी संचालन में बदलाव किए हैं या ऐसा करने की योजना बनाई है। करीब 65 प्रतिशत पहले ही अपने कारोबार को कृत्रिम बुद्धिमत्ता के अनुरूप ढालने की दिशा में कदम उठा चुके हैं। 54 प्रतिशत अगले 12 महीनों में अपने कारोबार के 11 से 30 प्रतिशत तक हिस्से को कृत्रिम बुद्धिमत्ता से जुड़े निवेश की ओर ले जाने की योजना रखते हैं। क्योंकि भारतीय उद्यमी तकनीकी बदलाव को भविष्य की आर्थिक शक्ति के रूप में देख रहे हैं।

ऐसे में स्वभाविक तौर पर कृत्रिम बुद्धिमत्ता उत्पादन, वित्त, स्वास्थ्य, शिक्षा, सेवाओं, अनुसंधान और रोजगार की संरचना बदल रही है। तब फिर भारत के लिए यह जरूरी हो जाता है कि वह किसी दूसरे देश पर निर्भर न रहते हुए स्वयं से कृत्रिम बुद्धिमत्ता अनुसंधान, मॉडल विकास और वैश्विक तकनीकी समाधान तैयार करने का केंद्र बने। यह हमारे पक्ष में अभी है कि भारत के सफल उद्यमियों के पास बड़ी निजी पूंजी है। सोना, नकदी, रियल एस्टेट फंड और निजी इक्विटी जैसे परिसंपत्ति वर्गों में व्यापक निवेश भारतीयों का मिलता है। अब यदि सरकार प्रेरित करे तो यह पूंजी भारत के लिए बड़ी आर्थिक शक्ति बन सकती है।

फिर ये हम सभी जानते भी हैं कि एक सफल उद्यमी की पूंजी जब नए उद्योग को जन्म देती है तो उसका प्रभाव व्यक्तिगत संपत्ति से आगे बढ़कर हजारों लोगों के रोजगार, नई तकनीक और नई आपूर्ति श्रृंखलाओं तक पहुंचता है, इसलिए आज पूंजी को आकर्षित करना महत्वपूर्ण है, पर साथ में उससे भी अधिक महत्वपूर्ण प्रतिभा और बौद्धिक संपदा को भारत में विकसित करना है।

यदि भारतीय इंजीनियर, वैज्ञानिक और तकनीकी विशेषज्ञ भारत में शिक्षा प्राप्त करने के बाद वैश्विक कंपनियों में अपनी प्रतिभा लगाते हैं, विदेश में उस देश के लिए पेंटेंट करवाते हैं, तब भारत को उनकी क्षमता से जुड़ा आर्थिक लाभ बहुत सीमित स्तर पर मिलेगा। दूसरी ओर भारत की दीर्घकालीन शक्ति तब बढ़ती है, जब उच्च कौशल वाली प्रतिभा को देश में विश्वस्तरीय अनुसंधान, उद्योग और उद्यमिता के अवसर मिलते हैं इसलिए भारत को उस वातावरण की आवश्यकता है, जिसमें कंपनी भारत से जन्म ले, भारतीय प्रतिभा उसे विकसित करे और उसका बाजार पूरी दुनिया हो।

एक तरह से देखें तो आज यह 74 प्रतिशत का आंकड़ा गंभीर संकेत के रूप में खड़ा है। भारतीय उद्यमी दुनिया के अवसरों को देख रहा है। वह अपनी संपत्ति का विविधीकरण कर रहा है, नई तकनीक में निवेश कर रहा है और वैश्विक बाजारों के साथ अपने संबंध बढ़ा रहा है। वस्तुत: यहां तक सब ठीक है किंतु जब वह पूरी तरह से विदेश में ही स्थान्तरित हो जाने के प्रयास करता है, तब यह देश के लिए एक बड़ा संकट बनता है।

अत: यहां कहना यही है कि 74 प्रतिशत का यह आंकड़ा भारत के सामने एक प्रश्न खड़ा कर रहा है। जिसका उत्तर देश की सरकारों (केंद्र एवं राज्य) को अपनी आर्थिक नीतियों में माध्यम से देना है, ताकि अगली बार सवाल यह हो कि विश्व के उद्यमी भारत को अपना अगला वैश्विक आधार क्यों बना रहे हैं! आखिर क्या है भारत में ऐसा, जो हर बड़ा-छोटा उद्यमी अपना देश छोड़कर भारत की ओर खिंचा चला आ रहा है!

(लेखक, हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी