सामाजिक -आध्यात्मिक योगदान देने वाली विदुषी- संत मुक्ताबाई
गिरीश जोशी
महाराष्ट्र की संत परंपरा में संत मुक्ताबाई का नाम अत्यंत श्रद्धा एवं सम्मान के साथ लिया जाता है। वे केवल संत ज्ञानेश्वर की छोटी बहन ही नहीं थीं, बल्कि स्वयं एक उच्चकोटि की संत, दार्शनिक चिंतक और कवयित्री थीं। वारकरी संप्रदाय में मुक्ताबाई को स्त्री-संत परंपरा की अग्रिम पंक्ति में स्थान प्राप्त है। उनकी वाणी में ज्ञान,भक्ति,वैराग्य, समता और आत्मबोध का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। मध्यकाल में जब दुनिया भर के अन्यान्य देशों में महिलाओं को उचित स्थान नहीं था तब भारतीय समाज में मुक्ताबाई ने अपने चिंतन और आध्यात्मिक योगदान से विशेष स्थान अर्जित किया।
जन्म एवं पारिवारिक पृष्ठभूमि
संत मुक्ताबाई का जन्म 13वीं शताब्दी में महाराष्ट्र के आपेगांव आलंदी क्षेत्र में माना जाता है। वे अपने तीन संत भाई निवृत्तिनाथ, ज्ञानेश्वर, सोपानदेव की छोटी बहन थीं। उनका परिवार सामाजिक बहिष्कार, धार्मिक रूढ़ियों की प्रताड़ना का शिकार हुआ था। उनके पिता विठ्ठलपंत ने पहले संन्यास लिया था लेकिन किसी कारण से बाद में फिर से गृहस्थ जीवन में लौटने के कारण समाज ने इनके परिवार का सामाजिक बहिष्कार कर दिया था। इस सामाजिक पीड़ा ने मुक्ताबाई के मन में विद्वेष की जगह करुणा, समता और आध्यात्मिकता को मजबूती से विकसित किया।
आध्यात्मिक संस्कार
मुक्ताबाई को आध्यात्मिक संस्कार उनके बड़े भाई निवृत्तिनाथ से मिले थे, जो नाथ संप्रदाय के संत थे। निवृत्तिनाथ ने ज्ञानेश्वर, सोपानदेव और मुक्ताबाई को आत्मज्ञान का मार्ग दिखाया। मुक्ताबाई की साधना में नाथपंथ की परंपरा और वारकरी संप्रदाय की भक्तिधारा का सुंदर समन्वय दिखाई देता है। वे ईश्वर को बाहरी कर्मकांड में नहीं, बल्कि अंतःकरण की शुद्धता और आत्मबोध में खोजती हैं। दूसरी ओर वारकरी संप्रदाय की विठ्ठल भक्ति और नामस्मरण की परंपरा ने उनकी साधना और अभिव्यक्ति को लोकाभिमुख बनाया। इस प्रकार मुक्ताबाई के व्यक्तित्व में नाथ संप्रदाय और वारकरी भक्ति परंपरा का अद्भुद समन्वय मिलता है। मुक्ताबाई का जीवन यह प्रतिपादित करता है कि ईश्वर-प्राप्ति, ज्ञान और मोक्ष में स्त्री-पुरुष का कोई भेद नहीं है। उनकी भूमिका से स्पष्ट हुआ कि स्त्री भी गुरु हो सकती है। स्त्री भी दार्शनिक संवाद कर सकती है। स्त्री भी समाज को दिशा दिखा सकती है । मुक्ताबाई का जीवन वृत्त संत साहित्य, लोककथाओं और परंपरागत आख्यानों पर आधारित है। उनका प्रभाव वारकरी संप्रदाय और मराठी संत साहित्य पर गहरा पड़ा है । उनकी रचनाओं में स्त्री अनुभव, सामाजिक पीड़ा और आध्यात्मिक उत्कर्ष का अद्भुत समन्वय मिलता है।
संत ज्ञानेश्वर के जीवन में भूमिका
मुक्ताबाई केवल संत ज्ञानेश्वर की बहन ही नहीं थीं, बल्कि उनकी आध्यात्मिक यात्रा की सहयात्री भी थीं। अनेक कथाओं में ये उल्लेख भी मिलता है कि जब ज्ञानेश्वर सामाजिक विरोध और मानसिक वेदना से व्यथित होते, तब मुक्ताबाई उन्हें धैर्य, समता और क्षमा का भाव धारण करने का संदेश देती थीं। उनकी प्रसिद्ध उक्ति “विश्व रागे झाले वन्ही, संत सुखे व्हावे पाणी” अर्थात जब संसार क्रोध और द्वेष की अग्नि बन जाए, तब संतों को शीतल जल के समान बन जाना चाहिए।
एक बार की बात है समाज के अपमान और तिरस्कार से दुःखी और निराश होकर ज्ञानेश्वर ने स्वयं को एक कुटिया में बंद कर लिया था। तब मुक्ताबाई ने “ताटी (कुटिया का दरवाजा ) खोलो” ये विनती करते हुए अभंग लिखें है । इन अभंगों में करुणा, समता, क्षमा और संत स्वभाव का गहन तत्त्वज्ञान व्यक्त हुआ है।
ताटी के अभंग
ताटी के अभागों में सबसे प्रसिद्ध अभंग है–“ताटी उघडा ज्ञानेश्वरा । योगी पावन मनाचा ॥” मुक्ताबाई ज्ञानेश्वर से कहती हैं कि सच्चा योगी लोगों के व्यवहार से विचलित नहीं होता। “संत जेणे व्हावे । जग बोलणे सहावे ॥“ संत वही कहलाए। जो जग की बातें सह जाए ॥ इस पंक्ति में संत स्वभाव का सार व्यक्त किया गया है कि संत वही हो सकता है जो दुनिया की निंदा, अपमान, उपेक्षा आदि को सहन करना सीख जाता है। “थोरपण जेथे वसे । तेथे भूतदया असे ॥“ जहां महानता बसती है। वहाँ प्राणिमात्र पर दया होती है ॥ मुक्ताबाई के अनुसार सच्ची महानता प्रत्येक प्राणियों के प्रति दया और करुणा में होती है। “आपण जैसे व्हावे ।अवघे अनुमानावे ॥“ स्वयं जैसे बनो । वैसे ही सबको समझो ॥ मनुष्य स्वयं जैसा होता है वैसा ही दूसरों से अपेक्षा कर सकता है। “क्रोधे यावे कोठे ।अवघे आपण निधोटे ॥“ क्रोध किस पर करें । सब अपने ही स्वरूप हैं ॥ राग और द्वेष व्यर्थ हैं, क्योंकि सभी जीव उसी परमात्मा के अंश हैं। “जीभ दातांनी चाविली ।कोणी बत्तीशी तोडिली ॥“ यदि दांतों ने जीभ काट ली तो क्या कोई अपनी पूरी बत्तीसी तोड़ देता है? जैसे दाँत गलती से जीभ काट लें तो हम दाँत नहीं तोड़ते, वैसे ही सब मनुष्य अपने ही है इसलिए उनकी भूलों को क्षमा करना चाहिए। “चणे खावे लोखंडाचे । मग ब्रह्मपदी नाचे ॥“ लोहे के चने चबाने पड़ते हैं । तब ब्रह्म पद प्राप्त होता है ॥ आध्यात्मिक साधना से ब्रह्म तत्व को पाना कठिन होता है उसके लिए धैर्य, सहनशीलता और कठोर तप आवश्यक है। संत मुक्ताबाई के “ताटी के अभंग” वारकरी संत साहित्य में अत्यंत प्रसिद्ध और आध्यात्मिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण माने जाते हैं।
साहित्यिक योगदान
मुक्ताबाई की रचनाएं मुख्यतः अभंग शैली में उपलब्ध हैं। उनकी वाणी सरल, मार्मिक और अनुभवप्रधान है। उनके अभंगों के प्रमुख विषय आत्मज्ञान, समता, और सामाजिक भेदभाव का विरोध, वैराग्य- माया, अहंकार और लोभ से मुक्ति का संदेश तथा भक्ति, ईश्वर के प्रति निष्कपट प्रेम और समर्पण रहे हैं।
सामाजिक दृष्टि एवं नारी विमर्श का स्वर
मुक्ताबाई का व्यक्तित्व मध्यकालीन समाज में नारी सशक्तिकरण का उदाहरण है। उन्होंने यह सिद्ध किया कि स्त्री केवल गृहस्थी तक सीमित नहीं, बल्कि वह ज्ञान, साधना और समाज सुधार की वाहक भी हो सकती है। उनकी वाणी में स्त्री की स्वतंत्र चेतना, आत्मसम्मान और आध्यात्मिक अधिकार स्पष्ट दिखाई देते हैं। इसलिए आधुनिक महिला विमर्श की दृष्टि से मुक्ताबाई का अध्ययन जरूरी है। मुक्ताबाई की विशेषता उनके ज्ञानप्रधान भक्ति दर्शन में दिखाई देती है। जैसे मीराबाई का केंद्र कृष्णप्रेम है, वैसे ही मुक्ताबाई का केंद्र आत्मज्ञान और समरसता है। आधुनिक स्त्री विमर्श के संदर्भ में मुक्ताबाई का अध्ययन इसलिए महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि उन्होंने 13वीं शताब्दी में ही स्त्री की बौद्धिक क्षमता, आध्यात्मिक समानता, सामाजिक अस्मिता और मानवीय गरिमा को स्थापित किया। तत्कालीन समय में मुक्ताबाई का संत, कवयित्री और गुरु रूप में उभरना सामाजिक दृष्टि से क्रांतिकारी घटना थी।
भाषा और अभिव्यक्ति
मुक्ताबाई ने लोकभाषा मराठी में अभंग रचे। उनकी वाणी में सहजता,अनुभव की प्रामाणिकता, करुणा, प्रतिरोध की सौम्य शैली और आत्मविश्वास स्पष्ट दिखाई देता है। वे स्वतंत्र स्त्री वैचारिकी की प्रतिनिधि हैं। उन्होंने मध्यकालीन समाज में स्त्री की बौद्धिकता, आध्यात्मिक समानता, स्वतंत्र पहचान और सामाजिक गरिमा को स्थापित किया। वे जागरूक भारतीय स्त्री चेतना की प्रारंभिक प्रवक्ता हैं, जिन्होंने अपने जीवन और वाणी से स्त्री सशक्तिकरण का रास्ता दिखाया।
जीवन का अंतिम चरण
किंवदंतियों के अनुसार अल्पायु में ही उन्होंने देहत्याग किया। किंतु उनका आध्यात्मिक प्रभाव वारकरी परंपरा में आज भी जीवित है। वे महाराष्ट्र की प्रारंभिक स्त्री संत कवयित्री हैं। उन्होंने भक्ति को सामाजिक समता से जोड़ा। उनकी वाणी में ज्ञानेश्वर की परंपरा का दार्शनिक विस्तार मिलता है। वे स्त्री-आध्यात्मिक नेतृत्व का सशक्त उदाहरण हैं। संत मुक्ताबाई का जीवन यह सिद्ध करता है कि आध्यात्मिक महानता आयु, लिंग या सामाजिक स्थिति पर निर्भर नहीं करती, बल्कि अंतःकरण की निर्मलता पर आधारित होती है। मुक्ताबाई की वाणी आज भी समाज को यह संदेश देती है कि जब संसार द्वेष से जल रहा हो, तब मनुष्य को प्रेम, शांति और करुणा का जल बनना चाहिए।
(लेखक, संस्कृति अध्येता एवं स्तंभकार हैं)
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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी

