भारत लिख रहा गरीबी उन्मूलन का नया अध्याय- 12 साल और 49.6 करोड़ लोग गरीबी रेखा से ऊपर आए
- डॉ. मयंक चतुर्वेदी
पिछले एक दशक में भारत ने गरीबी के खिलाफ एक ऐसा अभियान चलाया है, जिसे विश्व स्तर पर ऐतिहासिक माना जा रहा है। विश्व बैंक की हालिया “इंडिया पॉवर्टी एंड इक्विटी ब्रीफ” रिपोर्ट के अनुसार, 2011 से 2023 के बीच देश में लगभग 49.6 करोड़ लोग गरीबी से बाहर निकले हैं। यह भारत के साथ ही आज वैश्विक गरीबी उन्मूलन के इतिहास में भी एक नया रिकॉर्ड है।
वस्तुत: इस अवधि में गरीबी घटने की रफ्तार दुनिया में सबसे तेज रही। लोअर मिडिल इनकम वाले देशों की गरीबी रेखा (प्रति दिन 4.2 डॉलर, 2021 पीपीपी) के नीचे रहने वाली आबादी का हिस्सा 57.7 प्रतिशत से घटकर 16.1 प्रतिशत रह गया। अत्यधिक गरीबी में गिरावट और भी चौंकाने वाली है। प्रति दिन तीन डॉलर (लगभग ₹250) से भी कम पर गुजारा करने वाले लोगों का अनुपात 2011 में 27.1 प्रतिशत था, जो 2023 में सिमटकर महज 2.6 प्रतिशत रह गया। तात्पर्य यह है है कि बेहद कम आय वाले वर्ग में भी व्यापक सुधार हुआ है।
यहां समझने वाली बात यह भी है कि गरीबी अकेले आय से जुड़ा ही मामला भर नहीं है। इन वर्षों में ही शिक्षा, स्वास्थ्य और जीवन स्तर जैसे आयामों में भी भारत ने उल्लेखनीय प्रगति की है। ऑक्सफोर्ड पॉवर्टी एंड ह्यूमन डेवलपमेंट इनिशिएटिव (ओपीएसआई) के मल्टीडायमेंशनल पॉवर्टी इंडेक्स के अनुसार, 2005-06 में भारत की 53.8 प्रतिशत आबादी बहुआयामी गरीबी में थी। 2019-21 तक यह घटकर 16.4 प्रतिशत रह गई। विश्व बैंक के अपने मल्टीडायमेंशनल पॉवर्टी मेजरमेंट के अनुसार, 2022-23 में यह दर 15.5 प्रतिशत रही।
वस्तुत: ये सभी आंकड़े संकेत देते हैं कि लोगों को ज्यादा कमाई मिलने के साथ ही बेहतर पोषण, शिक्षा और बुनियादी सुविधाएं भी मिल रही हैं। स्कूल जाने वाले बच्चों की संख्या बढ़ी, स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच बेहतर हुई और घरों में बिजली, स्वच्छ पानी और शौचालय जैसी सुविधाएं आम हुईं। बहुआयामी गरीबी में कमी का मतलब है कि गरीब परिवार अब सिर्फ जीवित नहीं रह रहे, बल्कि बेहतर जीवन की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।
गरीबी घटने के मुख्य कारण
विश्व बैंक की रिपोर्ट गरीबी में इस तेज गिरावट के पीछे तीन प्रमुख कारण बताती है। पहला, खपत में मजबूत वृद्धि। आर्थिक विकास के साथ-साथ लोगों की क्रय शक्ति बढ़ी, जिससे वे बेहतर भोजन, शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च कर सके। दूसरा, रोजगार में बढ़ोतरी, विशेषकर महिलाओं के बीच। 2017 से 2023 के बीच देश में लगभग 13.4 करोड़ लोगों की रोजगार में वृद्धि हुई। यह कामकाजी उम्र की आबादी में हुई वृद्धि का लगभग दोगुना है। इस बढ़ोतरी का बड़ा हिस्सा ग्रामीण महिलाओं के वेतन वाले काम में आने से आया, जिससे प्रति परिवार कमाने वालों की संख्या बढ़ी और परिवारों की आय में स्थिरता आई।
तीसरा कारण, खाद्य सब्सिडी सहित सामाजिक हस्तांतरणों का विस्तार है। जन वितरण प्रणाली, प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना जैसी योजनाओं ने गरीबों को खाद्य सुरक्षा प्रदान की। इसके अलावा, प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण, आवास योजनाएं, स्वास्थ्य बीमा और कौशल विकास कार्यक्रमों ने लोगों को आर्थिक झटकों से बचाया और उन्हें आत्मनिर्भर बनाने में मदद की।
रोजगार वृद्धि और महिलाओं की भूमिका
इसी के साथ 2017 से 2023 के बीच रोजगार में 13.4 करोड़ की वृद्धि एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। यह आंकड़ा दिखाता है कि अर्थव्यवस्था ने न सिर्फ जनसंख्या वृद्धि को समाहित किया, बल्कि अतिरिक्त रोजगार भी पैदा किए। ग्रामीण महिलाओं का वेतन वाले काम में आना इस वृद्धि का एक बड़ा हिस्सा है। जब एक परिवार में एक से ज्यादा कमाने वाले हो जाते हैं, तो गरीबी का खतरा काफी कम हो जाता है। यह बदलाव सामाजिक रूप से भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता परिवार के फैसलों और बच्चों की शिक्षा-स्वास्थ्य को प्रभावित करती है।
यह रिपोर्ट देश के भविष्य को लेकर भी आशान्वित करती है, इसके अनुसार, गरीबी में कमी का सिलसिला जारी रहने की उम्मीद है। 4.20 डॉलर प्रतिदिन की गरीबी रेखा पर के नीचे रहने वाले लोगों की हिस्सेदारी 2026 में 14.2 प्रतिशत से घटकर 2028 तक 12.1 प्रतिशत पर पहुंचने की उम्मीद है। यह अनुमान बताता है कि शुरुआती तेज गिरावट के बाद अब और गहराई से काम करने की जरूरत है।
ऐसे में कहना यही होगा कि भारत की यह प्रगति वैश्विक गरीबी उन्मूलन के लिए भी महत्वपूर्ण है। दुनिया की सबसे बड़ी जनसंख्या वाले देश में गरीबी की इतनी तेज गिरावट का मतलब है कि वैश्विक गरीबी के आंकड़ों में भी बड़ा सुधार हुआ है। कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं भारत के अनुभव को अन्य विकासशील देशों के लिए सीख मान रही हैं। खपत वृद्धि, महिला रोजगार और लक्षित सामाजिक हस्तांतरणों का संयोजन एक प्रभावी मॉडल साबित हुआ है। निश्चित ही 2011 से 2023 तक 49.6 करोड़ लोगों को गरीबी से बाहर निकालना कोई छोटी उपलब्धि नहीं है। यह करोड़ों परिवारों के सपनों, मेहनत और नीतियों के सफल क्रियान्वयन की कहानी है। अत्यधिक गरीबी का लगभग समाप्त होना, बहुआयामी गरीबी में भारी गिरावट और रोजगार में वृद्धि ये सभी संकेत देते हैं कि भारत सही दिशा में आगे बढ़ रहा है।
अब यदि भारत अगले दशक में भी इसी प्रतिबद्धता के साथ काम करे, तब यह तो तय मानिए कि गरीबी को और कम किया जा सकता है, साथ ही एक अधिक समान और समृद्ध समाज का निर्माण भी संभव है। निश्चित ही यह रिपोर्ट भारत के लिए गर्व का विषय है, साथ ही जिम्मेदारी का अहसास ओर अधिक गहराई से करा रही है, क्योंकि जो हासिल हुआ है, उसे मजबूत करना और जो बाकी है, उसे पूर्ण करना अभी शेष है।
(लेखक, हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी

