पश्चिम एशिया के भू-राजनीतिक अशांतिकाल के केंद्र में उभरे नरेन्द्र मोदी
- डॉ. मयंक चतुर्वेदी
पश्चिम एशिया इन दिनों गहरे भू-राजनीतिक संकट से गुजर रहा है। अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच बढ़ता तनाव पूरे क्षेत्र को अस्थिरता की ओर धकेल रहा है। इसका असर वैश्विक कूटनीति, ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा पर भी दिखाई दे रहा है। ऐसे जटिल और संवेदनशील समय में भारत की कूटनीतिक सक्रियता भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ध्यान आकर्षित कर रही है। इस पूरे परिदृश्य में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक व्यक्तित्व के रूप में उभरते दिखाई दे रहे हैं। ईरान युद्ध से खाड़ी देशों में रह रहे लाखों भारतीयों की सुरक्षा पर संकट है! पीएम मोदी ने सऊदी, यूएई, बहरीन, कतर, ओमान, जॉर्डन, कुवैत और इजरायल के नेताओं से बात की है। उनसे भारतीयों की सुरक्षा का भरोसा लिया है।
हाल ही में प्रधानमंत्री मोदी ने इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से टेलीफोन पर बातचीत की। इस वार्ता में उन्होंने पश्चिम एशिया में तेजी से बदलते घटनाक्रमों पर गहरी चिंता व्यक्त की और युद्ध को शीघ्र समाप्त करने की आवश्यकता पर बल दिया। प्रधानमंत्री मोदी ने स्पष्ट कहा कि किसी भी संघर्ष की स्थिति में आम नागरिकों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए। वस्तुत: यह बातचीत इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर किए गए संयुक्त हमलों के बाद यह पहली बार था जब प्रधानमंत्री मोदी और नेतन्याहू के बीच सीधा संवाद हुआ। इस संवाद के माध्यम से भारत ने यह स्पष्ट संकेत दिया कि क्षेत्र में बढ़ता सैन्य तनाव किसी के हित में नहीं है और इसे शीघ्र समाप्त किया जाना चाहिए। उन्होंने दोहराया कि भारत क्षेत्र में शांति, स्थिरता और संवाद का समर्थक है तथा हिंसा को जल्द समाप्त किया जाना चाहिए।
दरअसल, पश्चिम एशिया भारत की ऊर्जा सुरक्षा, व्यापारिक हितों और प्रवासी भारतीयों की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्र है। भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र से प्राप्त करता है। इसके अलावा खाड़ी देशों में बड़ी संख्या में भारतीय नागरिक काम करते हैं, जिनकी सुरक्षा और हितों की रक्षा भारत की प्राथमिक जिम्मेदारी है। ऐसे में इस क्षेत्र में बढ़ते तनाव पर भारत की सक्रियता स्वाभाविक है।
प्रधानमंत्री मोदी ने इस संकट के दौरान संयुक्त अरब अमीरात के राष्ट्रपति मोहम्मद बिन ज़ायद अल नाहयान से भी फोन पर बातचीत की। इस बातचीत में उन्होंने संयुक्त अरब अमीरात पर हुए हालिया हमलों की कड़ी निंदा की और इन हमलों में हुई जनहानि पर गहरा शोक व्यक्त किया। प्रधानमंत्री ने कहा कि इस कठिन समय में भारत संयुक्त अरब अमीरात के साथ मजबूती से खड़ा है। प्रधानमंत्री ने संयुक्त अरब अमीरात में रह रहे भारतीय समुदाय की सुरक्षा और देखभाल के लिए वहां के नेतृत्व का आभार भी व्यक्त किया।
यहां विशेष ध्यान देने योग्य है कि भारत और संयुक्त अरब अमीरात के संबंध पिछले एक दशक में काफी मजबूत हुए हैं। व्यापार, ऊर्जा, रक्षा सहयोग और आतंकवाद विरोधी प्रयासों के क्षेत्र में दोनों देशों के बीच साझेदारी लगातार गहरी हुई है। संयुक्त अरब अमीरात में दुनिया के सबसे बड़े भारतीय प्रवासी समुदायों में से एक निवास करता है, जो दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक और सामाजिक संबंधों को भी मजबूत बनाता है।
पश्चिम एशिया में जारी तनाव को लेकर भारत का स्पष्ट मत सामने आया है, उसका सीधा मानना है कि इसका प्रभाव वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ना आरंभ हो गया है। यदि यह संघर्ष और बढ़ता है तो अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में भारी अस्थिरता आ सकती है। तेल की कीमतों में अचानक वृद्धि होने से कई देशों की अर्थव्यवस्था प्रभावित हो सकती है। भारत जैसे बड़े ऊर्जा उपभोक्ता देश के लिए यह एक गंभीर चिंता का विषय है। इसी को ध्यान में रखते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने केंद्रीय मंत्रिमंडल की आर्थिक मामलों की समिति की बैठक में भी पश्चिम एशिया की स्थिति की समीक्षा भी की है। वस्तुत: इससे स्पष्ट होता है कि भारत सरकार इस संकट को कूटनीतिक के साथ ही आर्थिक और रणनीतिक दृष्टि से भी गंभीरता से देख रही है।
वैसे भी भारत की विदेश नीति का एक महत्वपूर्ण पहलू उसका संतुलित दृष्टिकोण है। भारत के इजरायल, ईरान और अरब देशों तीनों के साथ अच्छे संबंध हैं। यही कारण है कि भारत को इस क्षेत्र में एक संतुलित और भरोसेमंद साझेदार के रूप में देखा जाता है। प्रधानमंत्री मोदी की सक्रिय कूटनीति इसी संतुलन को बनाए रखने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। पिछले कुछ वर्षों में भारत ने पश्चिम एशिया के देशों के साथ अपने संबंधों को नई दिशा दी है। इजरायल के साथ रक्षा और तकनीकी सहयोग बढ़ा है, वहीं खाड़ी देशों के साथ आर्थिक और रणनीतिक साझेदारी मजबूत हुई है। दू
ईरान के साथ भी भारत ने अपने ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंधों को बनाए रखा है। यह बहुआयामी कूटनीति भारत को क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण शक्ति के रूप में स्थापित करती है। वर्तमान संकट के बीच भारत की सबसे बड़ी प्राथमिकता क्षेत्रीय शांति और स्थिरता को बनाए रखना है। प्रधानमंत्री मोदी ने अपने हालिया संवादों में बार-बार यह संदेश दिया है कि हिंसा और युद्ध किसी भी समस्या का स्थायी समाधान नहीं होते। युद्ध से केवल मानवीय संकट बढ़ता है और निर्दोष नागरिकों को इसकी सबसे बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है।
आज के समय में जब वैश्विक राजनीति लगातार परिवर्तनशील होती जा रही है और कई क्षेत्रों में अस्थिरता बढ़ रही है, तब भारत की भूमिका एक जिम्मेदार वैश्विक शक्ति के रूप में उभर रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सक्रिय कूटनीति यह संकेत देती है कि भारत अपने राष्ट्रीय हितों के साथ ही वैश्विक शांति और स्थिरता के मुद्दों पर भी अपनी रचनात्मक भूमिका निभाने के लिए तैयार है। कहना होगा कि मध्य-पूर्व को लेकर भारत का दृष्टिकोण स्पष्ट है; संवाद, संतुलन और शांति। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हालिया कूटनीतिक प्रयास इस बात का प्रमाण हैं कि बदलते वैश्विक परिदृश्य में भारत एक जिम्मेदार, संतुलित और प्रभावशाली आवाज के रूप में उभर रहा है।
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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी

