भारत के लिए मुद्रा योजना बनी सूक्ष्म उद्यमों की ताकत
- डॉ. मयंक चतुर्वेदी
भारत की अर्थव्यवस्था की जड़ों में यदि किसी क्षेत्र की सबसे अधिक भूमिका है, तो वह है सूक्ष्म और लघु उद्यमों का विशाल नेटवर्क की। यही कारण है कि वर्ष 2015 में शुरू की गई “प्रधानमंत्री मुद्रा योजना” ने बीते एक दशक में देश के करोड़ों लोगों को वित्तीय सहारा देने के साथ आर्थिक संरचना को भीतर से मजबूत करने का कार्य किया है। हालिया फैक्ट-शीट के अनुसार, इस योजना के तहत अब तक 52.37 करोड़ से अधिक ऋण स्वीकृत किए जा चुके हैं और इनके माध्यम से 33.65 लाख करोड़ रुपये की राशि वितरित की गई है।
वस्तुत: भारत में लंबे समय तक छोटे उद्यमियों के सामने सबसे बड़ी समस्या रही है कि बिना गारंटी के सुलभ ऋण की उपलब्धता कैसे संभव हो सकती है। पारंपरिक बैंकिंग व्यवस्था में जटिल प्रक्रियाओं और गारंटी की शर्तों के कारण छोटे कारोबारी अक्सर वित्तीय सहायता से वंचित रह जाते थे। ऐसे में मुद्रा योजना ने इस बाधा को तोड़ते हुए बैंक, एनबीएफसी और माइक्रोफाइनेंस संस्थानों के माध्यम से बिना गारंटी ऋण उपलब्ध कराकर उद्यमिता को नई दिशा दी। यही कारण है कि विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसी वैश्विक संस्थाओं ने भारत में वित्तीय समावेशन की दिशा में इस प्रकार के प्रयासों को महत्वपूर्ण माना है। विश्व बैंक की रिपोर्टों में यह स्पष्ट किया गया है कि वित्तीय पहुंच का विस्तार आर्थिक असमानता को कम करने और विकास को समावेशी बनाने में निर्णायक भूमिका निभाता है।
मुद्रा योजना की सबसे उल्लेखनीय उपलब्धियों में से एक है महिलाओं की बढ़ती भागीदारी। कुल ऋणों में लगभग 70 प्रतिशत महिला उद्यमियों को दिए गए हैं, जोकि यह दर्शाता है कि उक्त योजना सामाजिक परिवर्तन का भी माध्यम बनी है। ग्रामीण और अर्धशहरी क्षेत्रों में महिलाएं अब स्वरोजगार के माध्यम से आत्मनिर्भर बन रही हैं और अपने परिवारों की आर्थिक स्थिति को भी मजबूत कर रही हैं।
नीति आयोग की विभिन्न रिपोर्टों में इस तथ्य को रेखांकित किया गया है कि महिलाओं की आर्थिक भागीदारी बढ़ने से समग्र विकास दर पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है और सामाजिक संतुलन भी मजबूत होता है। इसी तरह, सामाजिक न्याय की दृष्टि से भी यह योजना अत्यंत प्रभावी साबित हुई है। लगभग 50 प्रतिशत ऋण अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के लाभार्थियों को दिए गए हैं। वस्तुत: यह आंकड़ा इस बात का प्रमाण है कि योजना ने आर्थिक अवसरों को समाज के उन वर्गों तक पहुंचाया है।
इसके साथ ही भारतीय रिजर्व बैंक की रिपोर्टों में भी इस बात पर बल दिया गया है कि समावेशी विकास के लिए वित्तीय संसाधनों का समान वितरण आवश्यक है और मुद्रा योजना इस दिशा में एक मजबूत कदम है। दरअसल योजना की संरचना को देखें तो इसे तीन प्रमुख श्रेणियों शिशु, किशोर और तरुण में विभाजित किया गया है, जिसे कि उद्यमों के विभिन्न विकास चरणों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। शिशु श्रेणी में 50 हजार रुपये तक के ऋण दिए जाते हैं और कुल ऋणों का लगभग 78 प्रतिशत इसी श्रेणी में है।
वस्तुत: यह दर्शाता है कि देश में बड़ी संख्या में लोग छोटे स्तर पर व्यवसाय शुरू कर रहे हैं। वहीं किशोर श्रेणी, जिसमें 50 हजार से पांच लाख रुपये तक के ऋण शामिल हैं। कुल संख्या का लगभग 20 प्रतिशत है, लेकिन राशि के लिहाज से इसकी हिस्सेदारी 40 प्रतिशत है। इससे यह संकेत मिलता है कि छोटे व्यवसाय अब विस्तार की ओर बढ़ रहे हैं। तरुण श्रेणी में पांच से 10 लाख रुपये तक के ऋण दिए जाते हैं, जिसकी संख्या भले ही सिर्फ दो प्रतिशत है, किंतु कुल राशि में इसकी हिस्सेदारी 24 प्रतिशत है, जोकि यह दर्शाती है कि विकसित हो रहे उद्यमों की पूंजी आवश्यकताएं तेजी से बढ़ रही हैं।
सरकार ने इस योजना को और अधिक प्रभावी बनाने के लिए ‘तरुण प्लस’ श्रेणी की शुरुआत की है जिसके तहत 10 लाख से 20 लाख रुपये तक का ऋण उपलब्ध कराया जा रहा है। यह उन उद्यमियों के लिए एक बड़ा अवसर है, जिन्होंने पहले मुद्रा ऋण लेकर अपने व्यवसाय को सफलतापूर्वक स्थापित किया है और अब उसे आगे बढ़ाना चाहते हैं। इसके साथ ही ‘क्रेडिट गारंटी फंड फॉर माइक्रो यूनिट्स’ के माध्यम से ऋण पर गारंटी कवरेज प्रदान किया जा रहा है, जिससे वित्तीय संस्थानों का जोखिम कम होता है और उद्यमियों को आसानी से ऋण मिल पाता है।
यहां अच्छी बात यह है कि मुद्रा योजना का प्रभाव व्यक्तिगत स्तर तक सीमित न होकर इसका व्यापक आर्थिक प्रभाव भी देखने को मिला है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन की रिपोर्टों के अनुसार, छोटे और सूक्ष्म उद्यम विकासशील देशों में रोजगार सृजन का सबसे बड़ा स्रोत होते हैं। भारत में भी इस योजना के माध्यम से करोड़ों लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार मिला है। इससे देश की बेरोजगारी में कमी आई है, साथ में स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं को भी मजबूती मिली है।
इसके अतिरिक्त, यह योजना असंगठित क्षेत्र को औपचारिक अर्थव्यवस्था में लाने का एक महत्वपूर्ण माध्यम भी बनी है। जब कोई उद्यमी बैंकिंग प्रणाली से जुड़ता है, तो उसका वित्तीय रिकॉर्ड तैयार होता है, जिससे उसे भविष्य में और अधिक वित्तीय अवसर प्राप्त होते हैं। विश्व आर्थिक मंच ने भी अपनी रिपोर्टों में भारत को डिजिटल और वित्तीय समावेशन के क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ती अर्थव्यवस्था के रूप में स्वीकार किया है और मुद्रा योजना इस परिवर्तन की एक महत्वपूर्ण कड़ी है।
इस तरह समग्र रूप से देखें और इसके बारे में कहें तो आज यही कहना होगा कि कि प्रधानमंत्री मुद्रा योजना ने भारत की अर्थव्यवस्था में एक संरचनात्मक परिवर्तन की नींव रखी है। यह योजना उद्यमिता को प्रोत्साहित करने, सामाजिक समावेशन को बढ़ावा देने और आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य को साकार करने का एक सशक्त माध्यम है। आने वाले समय में यदि इसे कौशल विकास, डिजिटल प्लेटफॉर्म और वैश्विक बाजारों से जोड़ दिया जाएगा तो यह भारत को विश्व की अग्रणी उद्यमशील अर्थव्यवस्थाओं में स्थापित करने में निर्णायक भूमिका निभा सकती है। देखते हैं भारत सरकार अब इस बारे में क्या निर्णय लेती है!
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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी

