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भारत में मार्क्सवादी विचारधारा के 100 वर्ष : घोषित आदर्श, वास्तविक योगदान और परिणाम

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भारत में मार्क्सवादी विचारधारा के 100 वर्ष : घोषित आदर्श, वास्तविक योगदान और परिणाम


- कैलाश चन्द्र

भारत में मार्क्सवादी विचारधारा का आगमन बीसवीं शताब्दी के आरंभिक दशकों में हुआ। सोवियत क्रांति के प्रभाव और कम्युनिस्ट इंटरनेशनल की प्रेरणा से देश में कम्युनिस्ट पार्टी का गठन हुआ। इसके बाद श्रमिक संगठनों, किसान आंदोलनों तथा बौद्धिक हलकों में इस विचारधारा का विस्तार हुआ। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान कुछ धाराएं साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष से जुड़ीं। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद इस विचारधारा से जुड़े संगठनों ने ट्रेड यूनियन गतिविधियों, भूमि सुधार की मांगों तथा चुनावी राजनीति में भूमिका निभाई।

इसके साथ ही केरल, पश्चिम बंगाल तथा त्रिपुरा जैसे राज्यों में शासन की जिम्मेदारी भी संभाली गई। इन लगभग सौ वर्षों में घोषित आदर्शों तथा वास्तविक सामाजिक-आर्थिक परिणामों के बीच संबंध की जांच आवश्यक हो जाती है। मार्क्सवादी विचारधारा का घोषित उद्देश्य वर्गीय शोषण का समापन, आर्थिक असमानता में कमी, श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा तथा उत्पादन के साधनों पर समाज का नियंत्रण स्थापित करना रहा है। श्रमिकों को शोषण से मुक्ति, किसानों को भूमि पर अधिकार तथा शोषित वर्गों को समान अवसर प्रदान करने के नारे बार-बार दोहराए गए।

देखा जाए तो किसी भी विचारधारा का मूल्यांकन उसके आदर्शों तथा नारों से होता है। उसके साथ-साथ उसके संगठनों, आंदोलनों तथा शासन द्वारा समाज को दिए गए स्थायी परिणामों की जांच भी अनिवार्य है। स्वास्थ्य, शिक्षा, कौशल विकास, रोजगार सृजन, उद्यमिता, सहकारिता तथा सामाजिक सेवा के क्षेत्रों में स्थापित संस्थानों तथा उनके दीर्घकालीन प्रभाव को केंद्र में रखना उचित है, किंतु भारत में कम्युनिस्ट आंदोलन की कुछ धाराएं सशस्त्र हिंसा तथा राज्य के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष का मार्ग अपनाती रही हैं। भारत सरकार के गृह मंत्रालय के अनुसार भाकपा (माओवादी) सशस्त्र विद्रोह के माध्यम से सत्ता प्राप्त करने की विचारधारा रखती है। यह संगठन गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम के अंतर्गत आतंकवादी संगठनों की सूची में शामिल है।

मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2004 से 30 नवंबर 2025 तक वामपंथी उग्रवाद से जुड़ी हिंसा में 8,956 लोगों की मृत्यु हुई। यह संख्या उन समुदायों से जुड़ी है जिनकी मुक्ति का दावा इस विचारधारा द्वारा किया जाता है। जनजातीय क्षेत्रों में विकास कार्यों की बाधा, स्कूलों तथा स्वास्थ्य केंद्रों पर हमले तथा सामान्य जनजीवन में अस्थिरता इस हिंसा के परिणाम रहे हैं। लोकतांत्रिक तरीकों से श्रमिक अधिकारों के लिए संघर्ष तथा सशस्त्र हिंसा के बीच अंतर स्पष्ट रूप से रेखांकित किया जाना चाहिए। एक ओर वैध ट्रेड यूनियन गतिविधियां तथा सामूहिक सौदेबाजी का स्थान है, दूसरी ओर राज्य व्यवस्था को हिंसक ढंग से समाप्त करने का प्रयास है।

श्रमिकों के अधिकारों के लिए संगठित आंदोलन अपने आप में एक सामाजिक प्रक्रिया है। औद्योगिक संबंधों में लंबे टकराव, अनिश्चितता तथा बार-बार की बाधाएं निवेश के प्रवाह तथा नए रोजगार के अवसरों को प्रभावित करती हैं। किसी उद्योग के बंद होने के कारणों में श्रम नीतियां, बाजार की परिस्थितियां, तकनीकी परिवर्तन, प्रबंधन के निर्णय तथा सरकारी नीतियों की भूमिका होती है। इन सभी कारकों का अध्ययन आवश्यक है। नारेबाजी, धरने तथा प्रदर्शन देश के निर्माण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हैं जब वे श्रमिकों तथा समाज के जीवन में स्थायी सकारात्मक परिवर्तन लाते हैं। आंदोलनों की सार्थकता उनके द्वारा उत्पन्न रोजगार, कौशल तथा आय में वृद्धि से तय होती है।

आज जब भारत में कम्युनिस्ट तथा मार्क्सवादी संगठनों के सौ वर्षों के मूल्यांकन में उनके आंदोलनों, चुनावी प्रभाव तथा वैचारिक संघर्षों के साथ-साथ स्वास्थ्य, शिक्षा, कौशल विकास, रोजगार, उद्यमिता, सहकारिता तथा सामाजिक सेवा के क्षेत्रों में दिए गए स्थायी परिणामों को भी शामिल करना होगा, तब जो संगठन पीड़ितों, शोषितों, मजदूरों तथा वंचितों के विकास का दावा करता है, उससे कुछ सीधे प्रश्नों का उत्तर प्रमाणों के आधार पर अपेक्षित है।

उसने यह जरूर पूछा जाना चाहिए कि कितने अस्पताल, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र तथा जनसेवा संस्थान स्थापित किए जो दशकों तक चलते रहे। कितने विद्यालय, व्यावसायिक प्रशिक्षण केंद्र तथा कौशल विकास संस्थान बनाए गए जिनमें हजारों युवाओं को तकनीकी तथा व्यावसायिक योग्यता प्राप्त हुई। कितने युवाओं को स्थायी रोजगार तथा स्वरोजगार के अवसर मिले जिनसे परिवारों की आय में स्थायी वृद्धि हुई। कितने सफल सहकारी उद्यम तथा स्वावलम्बन के मॉडल विकसित किए गए जो राजनीतिक प्रभाव के घटने के बाद भी समाज की सेवा करते रहे। इन प्रश्नों का उत्तर नारों तथा भाषणों से प्राप्त होता है जब उनके साथ संस्थानों के कार्य, उनके बजट, लाभार्थियों की संख्या तथा दीर्घकालीन परिणामों के स्वतंत्र सत्यापन उपलब्ध हों।

यह मूल्यांकन मात्र मार्क्सवादी संगठनों तक सीमित रहना उचित है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, सेवा भारती, विभिन्न किसान संगठन, श्रमिक संगठन, धार्मिक-सामाजिक संस्थाएं तथा अन्य वैचारिक संगठन भी इन्हीं कसौटियों पर परखे जाने चाहिए। किस संगठन ने कितने लोगों तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाईं। कितने विद्यालयों तथा प्रशिक्षण केंद्रों की स्थापना की। रोजगार तथा कौशल विकास में कितना योगदान दिया। समाज को आत्मनिर्भर बनाने वाले कितने मॉडल विकसित किए। किन संस्थाओं ने राजनीतिक लाभ की अपेक्षा किए बिना निरंतर सेवा की। उनके कार्यों का स्वतंत्र रूप से सत्यापन संभव है या नहीं।

सही तो यही है कि समाजहित का मूल्यांकन संगठन की विचारधारा तथा उसके दावों से होता है जब उसके प्रमाणित कार्यों तथा परिणामों को केंद्र में रखा जाए। प्रत्येक संगठन के स्वास्थ्य केंद्रों, स्कूलों, सहकारी समितियों तथा रोजगार सृजन कार्यक्रमों की संख्या, उनकी भौगोलिक पहुंच तथा उनके लाभार्थियों की जीवन गुणवत्ता में आए परिवर्तन का अध्ययन आवश्यक है।

मार्क्सवादी विचारधारा तथा उससे जुड़े संगठनों का निष्पक्ष मूल्यांकन करते समय तीन पहलुओं के बीच अंतर करना आवश्यक है। उनके घोषित आदर्श, उनके विभिन्न राजनीतिक तथा हिंसक धड़ों की गतिविधियां तथा उनके वास्तविक सामाजिक-आर्थिक परिणाम। क्योंकि जहां हिंसा हुई है वहां उसकी जिम्मेदारी तथा परिणामों की जांच होनी चाहिए। जहां श्रमिकों के अधिकारों, शिक्षा, स्वास्थ्य या सामाजिक सुधार में योगदान हुआ है वहां उसका भी प्रमाणों के आधार पर मूल्यांकन होना चाहिए।

अंततः किसी भी विचारधारा की वास्तविक सफलता इस बात से तय होनी चाहिए कि उसने समाज में कितना न्याय बढ़ाया, कितना विकास किया, कितनी स्वतंत्रता प्रदान की तथा कितनी आत्मनिर्भरता उत्पन्न की। देश का निर्माण भाषणों, नारों तथा आंदोलनों से तभी हो सकता है जब वे लोगों के जीवन को बेहतर बनाते हैं, उन्हें सक्षम बनाते हैं तथा समाज को दीर्घकाल तक लाभ पहुँचाते हैं। स्वास्थ्य संस्थानों की निरंतर सेवा, शिक्षा के माध्यम से युवाओं को रोजगार योग्य बनाना, सहकारी मॉडल के द्वारा आय का स्थायी स्रोत सृजित करना तथा कौशल विकास के द्वारा आत्मनिर्भरता बढ़ाना ऐसे कार्य हैं जो विचारधारा से परे समाज के स्थायी हित में होते हैं, इसलिए यह जरूरी है कि इन सभी मानदंडों पर किसी भी संगठन का मूल्यांकन समान रूप से किया जाना चाहिए ताकि समाज को वास्तविक योगदान तथा दीर्घकालीन परिणामों का स्पष्ट चित्र प्राप्त हो सके।

(लेखक, सामाजिक कार्यकर्ता एवं स्तम्भकार हैं।)

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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी