देश के श्रम परिदृश्य में महिलाओं की भूमिका
मुकुंद
देश का श्रम परिदृश्य तेजी से बदल रहा है। इसने पुरुष और स्त्री के दायरे को खत्म कर दिया है। आज भारत की महिला श्रम के हर क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। केंद्र सरकार का कहना है कि भारत के श्रम परिदृश्य में पिछले कुछ वर्षों में महिलाओं की भूमिका में महत्वपूर्ण बदलाव और वृद्धि देखी गई है। अब देश के विकास में महिलाओं की भागीदारी केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक ढांचे को बदलने वाली भी है।महिला श्रम बल भागीदारी दर में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। यह दर 2017-18 में 23.3 फीसद थी। 2024-25 में बढ़कर यह 41.7 प्रतिशत तक पहुंच गई है। ग्रामीण भारत में भी बदलाव और वृद्धि हुई है। इस वृद्धि में ग्रामीण महिलाओं की भूमिका अग्रणी है। कृषि और पशुपालन के साथ-साथ स्वरोजगार में उनकी सक्रियता बढ़ी है। देश में आज भी कामकाजी महिलाओं का एक बड़ा हिस्सा कृषि (लगभग 60 प्रतिशत से अधिक) और असंगठित क्षेत्रों में कार्यरत है।
शहरी क्षेत्रों में महिलाएं आईटी, बैंकिंग, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं में तेजी से आगे बढ़ रही हैं। महानगरों में नियमित रोजगार के मामले में लैंगिक अंतर काफी कम हुआ है। 'लखपति दीदी' जैसी योजनाओं और स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से ग्रामीण महिलाएं अब सूक्ष्म उद्यमी बन रही हैं। इससे उनकी आर्थिक आत्मनिर्भरता बढ़ी है।विडंबना यह है कि कार्यबल में शामिल होने के बावजूद महिलाएं घरेलू काम और बच्चों की देखभाल का असंगत बोझ उठाती हैं। समान कार्य के लिए पुरुषों की तुलना में महिलाओं को मिलने वाले वेतन में अभी भी अंतर बना हुआ है। खासकर विशेषकर असंगठित क्षेत्रों में यही स्थिति है।
सरकारी कोशिशों के बावजूद वरिष्ठ प्रबंधन और निर्णय लेने वाले पदों (जैसे बोर्ड मेंबर या सीईओ) पर महिलाओं का प्रतिनिधित्व अभी भी अपेक्षाकृत कम है। सरकारी पहल और भविष्य की राह सरकार ने 'बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ', 'मुद्रा योजना' (जिसमें 70 प्रतिशत ऋण महिलाओं को दिए गए) और मातृत्व लाभ (संशोधन) अधिनियम जैसे कदमों के जरिए महिलाओं को श्रम शक्ति में बनाए रखने का प्रयास किया गया है। विश्व बैंक के अनुसार, महिलाओं की भागीदारी बढ़ने से भारत की जीडीपी विकास दर में उल्लेखनीय उछाल आ सकता है।
महत्वपूर्ण यह है कि कुछ वक्त पहले तक देश में महिलाओं के ज्यादातर काम अनदेखे ही रहते थे। उनके कामों का ज्यादातर हिस्सा घरों, पारिवारिक उद्यमों और अनौपचारिक भूमिकाओं तक ही सीमित था। इनका आधिकारिक दस्तावेजों में शायद ही कभी जिक्र होता रहा हो। अब स्थिति बदल रही है और महिलाएं देश के श्रम परिदृश्य को नया रूप दे रही है। देश के कार्यबल में बदलाव की कहानी आंकड़ों में भी साफ तौर पर दिखाई दे रही है। आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण से पता चलता है कि महिला श्रम बल भागीदारी में तेजी से वृद्धि हुई है, जो 2017-18 में 23.3 प्रतिशत से बढ़कर 2025 में 40 प्रतिशत हो गई है। खुशी की बात है कि इस बदलाव का नेतृत्व ग्रामीण भारत कर रहा है।
यही नहीं गांवों और छोटे कस्बों की महिलाएं अब पारंपरिक भूमिकाओं से आगे बढ़कर उद्यमिता की ओर अग्रसर हो रही हैं। दीनदयाल अंत्योदय योजना-राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत 10 करोड़ से अधिक महिला परिवारों को स्वयं सहायता समूहों में संगठित किया गया है। वित्तीय समावेशन के मार्ग के रूप में शुरू हुआ यह प्रयास धीरे-धीरे सूक्ष्म उद्यमों के एक नेटवर्क में तब्दील हो गया है। यहां महिलाएं उत्पादन, प्रबंधन और बिक्री कर रही हैं और अक्सर अपने परिवारों में प्राथमिक आय का स्रोत बन रही हैं।
महिला नेतृत्व वाले उद्यमों को सशक्त बनाने के लिए नए सिरे से शुरू किए गए नीतिगत प्रयासों से इस रफ्तार में और तेजी आई है। लखपति दीदी कार्यक्रम मील का पत्थर साबित हुआ है। यह पहल महिलाओं को अपनी आय को स्थायी रूप से बढ़ाने में सक्षम बनाने पर केंद्रित हैं। इसका मकसद प्रति वर्ष 1 लाख रुपये से अधिक कमाने वाली करोड़ों महिला उद्यमियों का सृजन करना है। ऋण, कौशल और बाजार संपर्कों तक विस्तारित पहुंच के साथ, यह भागीदारी से आय सुरक्षा की ओर एक बदलाव का प्रतीक है, जहां महिलाएं न केवल काम कर रही हैं, बल्कि अधिक मजबूत आजीविका का निर्माण भी कर रही हैं।
यह बदलाव देश के बढ़ती स्टार्टअप व्यवस्था में भी दिखाई देने लगा है। स्टार्टअप इंडिया पहल के तहत देश विश्व के तीसरे सबसे बड़े स्टार्टअप हब के रूप में उभरा है। अच्छी बात यह है कि 2.2 लाख से अधिक मान्यता प्राप्त स्टार्टअप 23.3 लाख से अधिक रोजगार सृजित कर रहे हैं। इनमें से एक लाख से अधिक स्टार्टअप में कम से कम एक महिला निदेशक हैं। इसके साथ ही स्किल इंडिया मिशन और अन्य सरकारी कौशल विकास कार्यक्रमों जैसी पहलों की मदद से महिलाओं को विभिन्न क्षेत्रों में उद्योगों से जुड़े कौशल से लैस किया जा रहा है। उद्योगों पर आधारित कौशल विकास पर यह बढ़ता जोर, रोजगार क्षमता में सुधार करने और अधिक स्थिर और उत्पादक आजीविका की ओर बढ़ने में मददगार साबित हो रहा है।
हाल के श्रम सुधारों ने भी इस अंतर को दूर करने का प्रयास किया है। 29 केंद्रीय श्रम कानूनों को चार श्रम संहिताओं में समेकित करने से नियामक ढांचा सरल हो गया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इन सुधारों के कार्यान्वयन का स्वागत करते हुए कहा, ''ये संहिताएं सार्वभौमिक सामाजिक सुरक्षा, न्यूनतम और समय पर मजदूरी का भुगतान, सुरक्षित कार्यस्थल और लोगों, विशेष रूप से नारी शक्ति और युवा शक्ति के लिए लाभकारी अवसरों की मजबूत नींव के रूप में कार्य करेंगी।'' व्यापक स्तर पर पर देखा जाए तो, देश में सामाजिक सुरक्षा कवरेज 2015 में करीब 19 प्रतिशत से बढ़कर 2025 में 64 प्रतिशत से अधिक हो गया है। सुखद यह है कि इस परिदृश्य में महिलाएं न केवल कार्यबल का हिस्सा हैं, बल्कि भविष्य को आकार देने में भी वे केंद्रीय भूमिका निभा रही हैं। ( स्रोत- पीआईबी)
(लेखक, हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / मुकुंद

