भारत की असली जेन जी : 38 करोड़ सपनों की वह पीढ़ी, जो विकसित भारत का भविष्य लिख रही
डॉ. मयंक चतुर्वेदी
आज के दौर में यदि किसी देश की सबसे बड़ी ताकत का प्रश्न पूछा जाए तो उत्तर न तो उसके प्राकृतिक संसाधन होंगे और न ही उसकी सैन्य शक्ति। किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी पूंजी उसके युवा होते हैं। भारत इस दृष्टि से विश्व का सबसे सौभाग्यशाली देश है। लगभग 38 करोड़ युवाओं वाली भारतीय जेनजी (Generation Z) वह जीवंत ऊर्जा है जो आने वाले भारत की दिशा और दशा दोनों तय करेगी, किंतु इन सभी जेनजी के बीच कभी-कभी कुछ सौ या कुछ हजार युवाओं की नकारात्मक गतिविधियां पूरे युवा समाज को बदनाम कर देती हैं।
वस्तुत: सोशल मीडिया पर वायरल होने वाले कुछ दृश्य यह भ्रम पैदा कर देते हैं कि पूरी पीढ़ी दिशाहीन हो गई है, जबकि वास्तविकता इसके ठीक विपरीत है। भारत की असली जेनजी वह है जो सीमाओं पर देश की रक्षा कर रही है, प्रयोगशालाओं में नई तकनीक विकसित कर रही है, खेल मैदानों में तिरंगा लहरा रही है, स्टार्टअप के माध्यम से रोजगार सृजित कर रही है, गांवों में नवाचार कर रही है और समाज सेवा से लेकर पर्यावरण संरक्षण तक हर क्षेत्र में देश का भविष्य गढ़ रही है। यदि हम आज विकसित भारत-2047 के सपने को साकार करने की बात करें तो यही युवा शक्ति उसका आधार बनेगी।
यही कारण है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बार-बार युवाओं को अमृत पीढ़ी कहकर संबोधित करते हैं। उनका विश्वास है कि विकसित भारत का संकल्प सरकारी योजनाओं के साथ इन सभी करोड़ों युवाओं की प्रतिभा, परिश्रम और नवाचार से पूरा होगा। ऐसे में कुछ प्रतियोगी परीक्षाओं या आंदोलनों के दौरान सामने आए अनुशासनहीन दृश्यों को देखकर पूरी जेनजी को कटघरे में खड़ा करना वास्तव में उन करोड़ों युवाओं के साथ अन्याय है जोकि प्रतिदिन राष्ट्रनिर्माण में लगे हुए हैं। यदि 38 करोड़ युवाओं में से कुछ हजार गलत दिशा में चले जाते हैं, तो उससे पूरी पीढ़ी का चरित्र निर्धारित नहीं किया जा सकता। समाज की परिपक्वता इसी में है कि वह विकृतियों का उपचार करे।
यदि भारत की जेनजी का वास्तविक चेहरा देखना हो तो सोशल मीडिया से बाहर निकलकर देश की सीमाओं की ओर देखना चाहिए। अग्निपथ योजना के माध्यम से हर वर्ष हजारों युवा भारतीय सेना में भर्ती होकर राष्ट्ररक्षा का दायित्व संभाल रहे हैं। भारतीय सेना, नौसेना, वायुसेना, केंद्रीय अर्धसैनिक बलों और राज्य पुलिस में लाखों युवा दिन-रात देश की सुरक्षा में लगे हैं।
भारत की वैज्ञानिक उपलब्धियों के पीछे भी आज यही युवा शक्ति खड़ी है। देश में करोड़ों विद्यार्थी विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित की शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। लाखों युवा शोधकर्ता कृत्रिम बुद्धिमत्ता, रोबोटिक्स, अंतरिक्ष विज्ञान, जैव प्रौद्योगिकी, रक्षा अनुसंधान और चिकित्सा विज्ञान जैसे क्षेत्रों में नए आयाम स्थापित कर रहे हैं। विश्व का सबसे हल्का उपग्रह 'कलामसैट' विकसित करने वाले रिफत शारूक हों, मातृ स्वास्थ्य के लिए अभिनव उपकरण तैयार करने वाले युवा शोधकर्ता हों, पार्किंसंस रोगियों के लिए नई तकनीक विकसित करने वाली वैज्ञानिक हों या फिर 'द अर्थ प्राइज' जैसे वैश्विक मंचों पर भारत का नाम रोशन करने वाले किशोर वैज्ञानिक; ये सभी इस बात के प्रमाण हैं कि भारतीय युवा भविष्य की तकनीक के निर्माता बन रहे हैं।
खेल जगत में भारत की नई पहचान भी इसी पीढ़ी ने गढ़ी है। कभी क्रिकेट तक सीमित समझे जाने वाले भारत ने अब एथलेटिक्स, शतरंज, बैडमिंटन, मुक्केबाजी, निशानेबाजी, तीरंदाजी, कुश्ती और हॉकी जैसे खेलों में विश्व स्तर पर अपनी अलग पहचान बनाई है। स्कॉटलैंड के ग्लासगो में चल रहे राष्ट्रमंडल खेलों में भारत के लिए मीराबाई चानू दिलीप गावित, ऋषिकांता सिंह चानंबम, मुरली श्रीशंकर मोहम्मद बासिल, झंडू कुमार राजा मुथु पांडे स्वर्ण से लेकर अन्य पदक जीत चुके हैं। अन्य खिलाड़ी भी पदक जीतने के लिए तैयार हैं। नीरज चोपड़ा, मनु भाकर, डी. गुकेश, आर. प्रज्ञानानंद, अमन सहरावत, शुभमन गिल, यशस्वी जायसवाल और अनेक युवा खिलाड़ियों ने यह सिद्ध किया है कि भारतीय युवा विश्व विजेता बनने का संकल्प लेकर आगे बढ़ रहे हैं।
भारतीय अर्थव्यवस्था की नई कहानी भी युवाओं के हाथों लिखी जा रही है। आज भारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा स्टार्टअप इकोसिस्टम बन चुका है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, फिनटेक, एग्रीटेक, हेल्थटेक, डीप टेक और क्विक कॉमर्स जैसे क्षेत्रों में हजारों युवा उद्यमी नई कंपनियां स्थापित कर रहे हैं। आदित पालिचा, कैवल्य वोहरा, शाश्वत नाकराणी और अनेक युवा उद्यमियों ने यह साबित किया है कि आज का भारतीय युवा नौकरी खोजने के स्थान पर रोजगार सृजित करने वाला बन चुका है। यही परिवर्तन आत्मनिर्भर भारत की सबसे बड़ी शक्ति है।
देश की इस नई पीढ़ी को हम तकनीक और उद्योग के साथ ही राष्ट्रीय सेवा योजना, राष्ट्रीय कैडेट कोर, नेहरू युवा केंद्र और विभिन्न स्वयंसेवी संगठनों से जुड़कर सेवा कार्य करते हुए भी देख सकते हैं। लाखों युवा शिक्षा, स्वास्थ्य, रक्तदान, आपदा राहत, महिला सशक्तीकरण और ग्रामीण विकास जैसे क्षेत्रों में निस्वार्थ भाव से कार्य कर रहे हैं। पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में भी भारत की युवा पीढ़ी उल्लेखनीय भूमिका निभा रही है। जल संरक्षण, वृक्षारोपण, प्लास्टिक मुक्त अभियान, जैव विविधता संरक्षण और स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देने वाले हजारों युवा आज सामाजिक परिवर्तन के वाहक बने हुए हैं।
यह भी सत्य है कि इस पीढ़ी के सामने अनेक चुनौतियां हैं। तीव्र प्रतिस्पर्धा, रोजगार की चिंता, मानसिक तनाव, डिजिटल व्यसन और सोशल मीडिया का बढ़ता प्रभाव युवाओं को प्रभावित करता है। इन समस्याओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। किंतु इन चुनौतियों का समाधान पूरी पीढ़ी को प्रोत्साहित करते रहने में ही है। वास्तविकता यही है कि युवाओं को उपदेश से अधिक अवसर चाहिए, आलोचना करने के स्थान पर उनका मार्गदर्शन किया जाना जरूरी है और संदेह से अधिक विश्वास उन्हें चाहिए।
यही पीढ़ी चंद्रयान और गगनयान के सपनों को साकार करेगी, यही भारत को कृत्रिम बुद्धिमत्ता, क्वांटम कंप्यूटिंग और सेमीकंडक्टर निर्माण में वैश्विक नेतृत्व दिलाएगी, यही ओलंपिक में तिरंगा ऊंचा करेगी, यही खेतों में नई तकनीक पहुंचाएगी और यही भारत को 2047 तक विकसित राष्ट्र बनाने के संकल्प को साकार करेगी। अत: आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अपनी युवा शक्ति पर विश्वास करें।
वस्तुत: भारत के जेनजी के संदर्भ में कहना यही होगा कि करोड़ों की उक्त संख्या जेनजी की आज भी हर सुबह एक नए सपने के साथ उठती है और हर शाम अपने श्रम से राष्ट्र की प्रगति में एक नई ईंट जोड़ देती है। यही पीढ़ी भारत की सबसे बड़ी पूंजी है, यही उसकी सबसे बड़ी आशा है और यही विकसित भारत की सबसे विश्वसनीय आधारशिला है। (लेखक, हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी

