अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए हमें वैकल्पिक रास्तों पर चलना ही होगा
-डॉ. मयंक चतुर्वेदी
भारत आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां ऊर्जा की बढ़ती मांग, विदेशी तेल पर निर्भरता, पर्यावरणीय चुनौतियां और आर्थिक आत्मनिर्भरता। वस्तुत: ये सभी प्रश्न एक साथ हमारे सामने खड़े हैं। दुनिया तेजी से बदल रही है, ऊर्जा के स्रोत बदल रहे हैं और राष्ट्र अपनी ऊर्जा सुरक्षा को लेकर नए विकल्प तलाश रहे हैं। ऐसे समय में भारत ने भी एक साहसिक और दूरदर्शी कदम उठाया है और वह है पेट्रोल में इथेनॉल मिश्रण को बढ़ावा देने का।
प्रधानमंत्री मोदी अनेक अवसरों पर स्पष्ट कर चुके हैं कि भारत को ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनना होगा। वहीं केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी भी लगातार इथेनॉल आधारित अर्थव्यवस्था को भारत के भविष्य का महत्वपूर्ण आधार बताते रहे हैं। उनका मानना है कि इथेनॉल ईंधन होने के साथ ही हमारे किसानों की समृद्धि, विदेशी मुद्रा की बचत और पर्यावरण संरक्षण का एक प्रभावी माध्यम है, इसीलिए आज भारत में ई-20 पेट्रोल का उपयोग तेजी से बढ़ रहा है।
वस्तुत: ई-20 का अर्थ है, ऐसा ईंधन जिसमें 20 प्रतिशत इथेनॉल और 80 प्रतिशत पेट्रोल का मिश्रण हो। कुछ लोगों के मन में यह आशंका अवश्य है कि क्या इथेनॉल मिश्रित ईंधन उनके वाहन को नुकसान पहुंचाएगा? किंतु उनके लिए कहना यही होगा कि वर्तमान समय में दुनिया के अनेक देशों में वर्षों से ई-10, ई-20 और यहां तक कि ई-85 जैसे इथेनॉल मिश्रित ईंधनों का सफल उपयोग हो रहा है। भारत भी उसी दिशा में आगे बढ़ रहा है और इसके पीछे ठोस आर्थिक, सामाजिक और पर्यावरणीय कारण मौजूद हैं।
भारत अपनी लगभग 85 प्रतिशत कच्चे तेल की आवश्यकता आयात के माध्यम से पूरी करता है। इसके कारण हर वर्ष भारी मात्रा में विदेशी मुद्रा देश से बाहर चली जाती है। जब भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ती हैं, उसका सीधा प्रभाव भारतीय अर्थव्यवस्था और आम नागरिकों की जेब पर पड़ता है। ऐसे में पेट्रोल में घरेलू स्तर पर उत्पादित इथेनॉल का मिश्रण विदेशी तेल पर निर्भरता कम करने का प्रभावी उपाय बनकर सामने आया है।
इसके प्रभावी परिणाम भी स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगे हैं। वर्ष 2014 में जहां पेट्रोल में इथेनॉल मिश्रण का औसत स्तर मात्र 1.5 प्रतिशत था, वहीं आज यह लगभग 20 प्रतिशत तक पहुंच चुका है। वर्ष 2022-23 में 12.06 प्रतिशत मिश्रण के कारण लगभग 24,300 करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा बची। वर्ष 2023-24 में यह बचत बढ़कर 30,000 से 35,000 करोड़ रुपये तक पहुंच गई। वहीं 2024-25 में लगभग 19 प्रतिशत मिश्रण के साथ करीब 40,000 करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा बचत का अनुमान है।
सरकारी और संसदीय आंकड़ों के अनुसार, इथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम से अब तक देश को 17 लाख करोड़ रुपये से अधिक की विदेशी मुद्रा बचत हुई है। कच्चे तेल के आयात में 18 लाख मीट्रिक टन से अधिक की कमी आई है और कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में लगभग 736 लाख मीट्रिक टन की कमी दर्ज की गई है। किसानों को भी 12 लाख करोड़ रुपये से अधिक की अतिरिक्त आय प्राप्त हुई है। ये आंकड़े बताते हैं कि इथेनॉल अब भारत की आर्थिक और ऊर्जा रणनीति का मजबूत स्तंभ बन चुका है।
फिर इथेनॉल के लाभ सिर्फ विदेशी मुद्रा बचाने तक सीमित नहीं हैं। इसका सबसे बड़ा लाभ किसानों को मिल रहा है। इथेनॉल उत्पादन के लिए गन्ने से प्राप्त शीरा, अधिशेष अनाज, क्षतिग्रस्त खाद्यान्न, मक्का तथा अन्य स्वीकृत कृषि उत्पादों का उपयोग किया जाता है। इससे किसानों को अपनी उपज का अतिरिक्त बाजार मिलता है और उनकी आय बढ़ती है। ग्रामीण क्षेत्रों में नए उद्योग स्थापित होते हैं, रोजगार के अवसर पैदा होते हैं और स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलती है।
पर्यावरणीय दृष्टि से भी इथेनॉल अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह पेट्रोल की तुलना में अधिक स्वच्छ रूप से जलता है और ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करता है। जब दुनिया जलवायु परिवर्तन की चुनौती से जूझ रही है, तब भारत का इथेनॉल मिशन पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक सार्थक प्रयास बनकर उभर रहा है। यहां कुछ आलोचक यह तर्क देते हैं कि इथेनॉल उत्पादन से खाद्य सुरक्षा प्रभावित हो सकती है। किंतु उनके लिए कहना यही होगा कि भारत की वर्तमान नीति इस चिंता का संतुलित समाधान प्रस्तुत करती है।
वस्तुत: देश में उपलब्ध अधिशेष कृषि उत्पादन, अतिरिक्त अनाज भंडार और उपभोग के लिए अनुपयुक्त खाद्यान्न का उपयोग इथेनॉल उत्पादन में किया जा रहा है। वर्ष 2025 में रणनीतिक आवश्यकताओं से अधिक उपलब्ध चावल भंडार को भी इथेनॉल उत्पादन की ओर मोड़ा गया, इसलिए यह “भोजन बनाम ईंधन” का प्रश्न नहीं, बल्कि कृषि अधिशेष के बेहतर उपयोग का मॉडल है।
जहां तक वाहनों की बात है, अप्रैल 2023 के बाद निर्मित अधिकांश बीएस6 फेज-II वाहन ई-20 ईंधन के अनुकूल बनाए गए हैं। नए वाहन मालिकों को किसी विशेष चिंता की आवश्यकता नहीं है। पुराने वाहनों में केवल कुछ सामान्य सावधानियां बरतने की जरूरत है, जैसे ईंधन प्रणाली की नियमित जांच, रबर होज और सीलों का निरीक्षण तथा ईंधन फिल्टर की समय-समय पर सफाई। इस तरह से उचित रखरखाव के साथ पुराने वाहन भी ई-20 ईंधन का सुरक्षित उपयोग कर सकते हैं।
माइलेज को लेकर भी अनेक भ्रांतियां हैं। यह सही है कि इथेनॉल का ऊर्जा घनत्व पेट्रोल से थोड़ा कम होता है, जिसके कारण माइलेज में 1 से 4 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है, किंतु यदि 100 लीटर ई-20 ईंधन में केवल 80 लीटर पेट्रोल और 20 लीटर इथेनॉल है, तो मामूली माइलेज कमी के बावजूद पेट्रोल की वास्तविक खपत में उल्लेखनीय कमी आती है। दूसरे शब्दों में, देश को पेट्रोल आयात पर कम निर्भर रहना पड़ता है और विदेशी मुद्रा की बचत होती है, जिसमें कि व्यापक राष्ट्रीय हित निहित है।
आज ब्राजील जैसे देशों में फ्लेक्स-फ्यूल वाहन पहले से ही बड़ी सफलता के साथ उपयोग किए जा रहे हैं। ये वाहन ई-20, ई-50, ई-85 और पारंपरिक पेट्रोल, सभी प्रकार के मिश्रणों पर चल सकते हैं। भारत भी भविष्य में इसी दिशा में आगे बढ़ रहा है। फिर यदि हमें आने वाली पीढ़ियों के लिए एक मजबूत, आत्मनिर्भर और पर्यावरण-अनुकूल भारत का निर्माण करना है, तो हमें ऊर्जा के क्षेत्र में वैकल्पिक रास्तों पर चलना ही होगा।
वास्तव में इथेनॉल उसी वैकल्पिक रास्ते का नाम है, जो भारत को आयात-निर्भरता से आत्मनिर्भरता, प्रदूषण से स्वच्छता और आर्थिक कमजोरी से ऊर्जा-सशक्त राष्ट्र की ओर ले जा रहा है, इसलिए समय की मांग है कि हम इस परिवर्तन को समझें, स्वीकार करें और भारत की ऊर्जा क्रांति का सक्रिय हिस्सा बनें।
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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी

