भारत के आसमान पर किसका अधिकार?
कैलाश चन्द्र
दुनिया में तकनीकी प्रतिस्पर्धा अब बाजार, उत्पाद और ग्राहकों तक सीमित नहीं रह गई है। आज संचार नेटवर्क, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेमीकंडक्टर, अंतरिक्ष और डिजिटल आधारभूत संरचना पर नियंत्रण किसी भी राष्ट्र की आर्थिक शक्ति, सामरिक सुरक्षा और नीतिगत स्वायत्तता को प्रभावित करता है। ऐसे समय में भारत के प्रस्तावित लो-अर्थ-ऑर्बिट (एलईओ) सैटेलाइट नेटवर्क और एलन मस्क की कंपनी स्टारलिंक के बीच उभरती प्रतिस्पर्धा को इंटरनेट सेवा की लड़ाई भर समझना अधूरा होगा। इसके केंद्र में बाजार के साथ तकनीकी क्षमता, नियामक व्यवस्था, राष्ट्रीय सुरक्षा और डिजिटल संप्रभुता के प्रश्न भी हैं। वैश्विक बाजारवादी शक्तियों का सीधे हस्तक्षेप है।
देखा जाए तो अक्टूबर 2026 में भारत में स्टारलिंक की मंजूरी और प्रतिस्पर्धा को लेकर मस्क की तीखी सार्वजनिक टिप्पणियों ने इस बहस को नया आयाम दिया है। दूसरी ओर, रिलायंस जियो की प्रस्तावित सैटेलाइट योजना से जुड़े आंकड़े भारतीय अंतरिक्ष एवं दूरसंचार क्षेत्र की संभावनाओं की ओर संकेत करते हैं। इस पूरे घटनाक्रम को समझने के लिए पुष्ट तथ्यों, प्रस्तावित योजनाओं और उनके आधार पर निकाले जा रहे निष्कर्षों के बीच स्पष्ट अंतर रखना आवश्यक है। साथ ही, वैश्विक शक्तियों के दबाव और भारत की तकनीकी आत्मनिर्भरता के प्रश्नों का अध्ययन भी जरूरी है।
इंटरनेट की लड़ाई अब धरती से अंतरिक्ष तक
अब तक भारत में इंटरनेट का विस्तार मुख्यतः मोबाइल टावरों, ऑप्टिकल फाइबर और स्थलीय दूरसंचार नेटवर्क के माध्यम से हुआ है। इन माध्यमों ने शहरों से लेकर गांवों तक कनेक्टिविटी पहुंचाने में बड़ी भूमिका निभाई है। फिर भी देश के अनेक दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों, द्वीपों, सीमावर्ती चौकियों और विरल आबादी वाले इलाकों में विश्वसनीय इंटरनेट उपलब्ध कराना कठिन और महंगा हो सकता है। सैटेलाइट इंटरनेट इस चुनौती का एक विकल्प है। इसमें पृथ्वी की निचली कक्षा में स्थापित उपग्रहों के माध्यम से डेटा का संचार किया जाता है। एलईओ उपग्रह पृथ्वी के अपेक्षाकृत निकट होते हैं, इसलिए पारंपरिक भूस्थिर उपग्रहों की तुलना में कम विलंबता वाली कनेक्टिविटी उपलब्ध कराने की क्षमता रखते हैं।
यही कारण है कि एलन मस्क की स्टारलिंक, अमेजन की अमेजन लियो और अन्य कंपनियां इस क्षेत्र में निवेश कर रही हैं। भारत में जियो और भारती समूह से जुड़ी वनवेब की योजनाएं इस प्रतिस्पर्धा को एक अलग राष्ट्रीय एवं औद्योगिक संदर्भ प्रदान करती हैं। अब यहां प्रश्न इंटरनेट उपलब्ध कराने वाली कंपनी तक सीमित नहीं है। नेटवर्क का स्वामित्व किसके पास होगा, उसका संचालन किसके नियंत्रण में रहेगा, डेटा और संचार की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित होगी तथा संकट के समय उस पर किसका प्रभावी नियंत्रण होगा, ये सभी विषय भारत की डिजिटल संप्रभुता से सीधे जुड़े हैं।
जियो की योजना : 1,600 उपग्रहों से जुड़ी महत्वाकांक्षा
मध्य-2026 की रिपोर्टों में रिलायंस जियो की लगभग 1,600 से 1,650 लो-अर्थ-ऑर्बिट उपग्रहों वाली प्रस्तावित योजना का उल्लेख किया गया है। इसके साथ भारत में लगभग 20 से 23 ग्राउंड स्टेशन स्थापित करने की योजना की भी चर्चा हुई है। इस तरह के नेटवर्क का उपयोग कई क्षेत्रों में हो सकता है। दूरदराज के गांवों और द्वीपों तक ब्रॉडबैंड पहुंचाना, सीमावर्ती क्षेत्रों में संचार संपर्क मजबूत करना, मोबाइल नेटवर्क के लिए बैकहॉल कनेक्टिविटी उपलब्ध कराना तथा आपदा के समय स्थलीय नेटवर्क बाधित होने पर वैकल्पिक संचार देना इसके प्रमुख संभावित उपयोग हैं।
उपयुक्त तकनीकी और नियामक व्यवस्था के अंतर्गत मोबाइल सैटेलाइट सेवाओं तथा डायरेक्ट-टू-डिवाइस कनेक्टिविटी की संभावनाएं भी विकसित की जा सकती हैं। इससे एक बात स्पष्ट है कि यदि भारत में घरेलू कंपनी अपनी प्रस्तावित अंतरिक्ष-आधारित संचार क्षमता को सफलतापूर्वक विकसित कर पाती है, तो इससे देश के दूरसंचार और अंतरिक्ष उद्योग को नई संभावनाएं मिल सकती हैं।
मीडिया रिपोर्टों में जियो की परीक्षण उड़ान के लिए सितंबर 2027 का लक्ष्य तथा 2028 के आसपास शुरुआती कवरेज के लिए लगभग 90 से 100 उपग्रहों की योजना का उल्लेख किया गया है। आगे 2030 तक 400 से 450 और 2035 तक लगभग 1,600 उपग्रहों की तैनाती का लक्ष्य बताया गया है। फिर भी अंतरिक्ष परियोजनाओं में उपग्रह निर्माण, प्रक्षेपण की उपलब्धता, कक्षीय तैनाती, ग्राउंड स्टेशन, नियामक स्वीकृतियां और नेटवर्क परीक्षण एक-दूसरे से जुड़े होते हैं। इनमें किसी भी स्तर पर देरी होने से पूरे कार्यक्रम की समयरेखा प्रभावित हो सकती है।
इसके बावजूद, दीर्घकालीन योजना का महत्व कम नहीं होता। यदि भारत में निजी क्षेत्र अंतरिक्ष-आधारित संचार नेटवर्क विकसित करने में सफल होता है, तो देश की तकनीकी क्षमता, औद्योगिक आपूर्ति-शृंखला और भविष्य की संचार जरूरतों के लिए विकल्प बढ़ सकते हैं। यही वह क्षेत्र है, जहां प्रतिस्पर्धा का वास्तविक परिणाम किसी एक कंपनी की जीत या हार से नहीं, बल्कि भारत में निर्मित तकनीकी क्षमता और उपभोक्ताओं को मिलने वाले लाभ से मापा जाना चाहिए।
रक्षा पेलोड और राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रश्न
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे संवेदनशील पक्ष रक्षा और सामरिक संचार से जुड़ा है। जियो के कुछ प्रस्तावित उपग्रहों पर रक्षा संबंधी पेलोड लगाने की संभावना पर सरकारी स्तर पर चर्चा का उल्लेख किया गया है। यदि ऐसी व्यवस्था विकसित होती है और उसे आवश्यक स्वीकृतियां मिलती हैं, तो इससे सुरक्षित संचार, सीमावर्ती क्षेत्रों में संपर्क और कुछ सामरिक आवश्यकताओं के लिए अतिरिक्त विकल्प उपलब्ध हो सकते हैं।
इस विषय का एक पक्ष यह भी है कि किसी भारतीय कंपनी का उपग्रह नेटवर्क अपने आप भारतीय सशस्त्र बलों का स्वीकृत सैन्य संचार नेटवर्क नहीं बन जाता। इसके लिए सुरक्षा परीक्षण, तकनीकी एकीकरण, परिचालन प्रोटोकॉल और संबंधित सरकारी अनुमतियां आवश्यक होंगी। फिर भी, यह विषय एक बुनियादी प्रश्न उठाता है, क्या भारत को अपनी सामरिक संचार आवश्यकताओं के लिए विदेशी कंपनियों पर निर्भर रहना चाहिए?
इसका उत्तर राष्ट्रीय हितों और व्यावहारिक आवश्यकताओं के संतुलन में तलाशना होगा। भारत को विदेशी तकनीक और वैश्विक सहयोग से लाभ उठाने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए, लेकिन जहां महत्वपूर्ण राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रश्न हो, वहां अपने विकल्प, तकनीकी क्षमता और निर्णय लेने की स्वतंत्रता विकसित करना भी जरूरी है। यही डिजिटल संप्रभुता का सार है। वस्तुत: डिजिटल संप्रभुता का अर्थ दुनिया से कट जाना नहीं, बल्कि दुनिया से जुड़ते हुए अपने महत्वपूर्ण निर्णय स्वयं लेने की क्षमता बनाए रखना है।
भारत के लिए निर्णायक प्रश्न
जियो की प्रस्तावित योजना भारत के अंतरिक्ष-आधारित संचार क्षेत्र में घरेलू तकनीकी क्षमता विकसित करने की महत्वाकांक्षा को सामने रखती है। इसके सफल क्रियान्वयन से दूरसंचार, उपग्रह निर्माण, औद्योगिक आपूर्ति-शृंखला और सामरिक संचार के क्षेत्र में नए अवसर पैदा हो सकते हैं। भारत के लिए आवश्यक है कि वह घरेलू तकनीकी क्षमता का विस्तार करे, राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मानकों को मजबूत रखे और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के अवसरों का विवेकपूर्ण उपयोग करे।
भारत के आसमान में स्थापित होने वाले उपग्रहों का महत्व उनकी संख्या से आगे जाता है। असली प्रश्न यह है कि इस तकनीक के संचालन, सुरक्षा और भविष्य की दिशा तय करने में भारत की भूमिका कितनी प्रभावी होगी। यही प्रश्न आने वाले वर्षों में भारत की डिजिटल संप्रभुता और सामरिक आत्मनिर्भरता की कसौटी बनेगा। आज एलन मस्क की कंपनी स्टारलिंक की समस्या ही यही है, वह भारत में इंटरनेट सेवा तो आरंभ करना चाहती है, किंतु हर भारतीय का डेटा सुरक्षित रहे, यदि कोई भी भारत से बाहर या अंदर संवाद करता है, तो उसकी जरूरत पड़ने पर सरकार को जानकारी रहे, यह सुनिश्चित करना नहीं चाहती, ऐसे में भला अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा से कैसे कोई सरकार समझौता कर सकती है? इसलिए स्वदेशी को ही हमें चुनना चाहिए, जहां विश्वास बरकरार है।
(लेखक, सामाजिक कार्यकर्ता एवं वरिष्ठ स्तम्भकार हैं।)
हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी

