उत्पादन से पूंजी तक, भारत की अर्थव्यवस्था में बढ़ते भरोसे की दस्तक
डॉ. मयंक चतुर्वेदी
औद्योगिक उत्पादन में 6.7 प्रतिशत की तेज वृद्धि, विनिर्माण क्षेत्र की 7.3 प्रतिशत छलांग, पूंजीगत वस्तुओं में 16.1 प्रतिशत उछाल और विदेशी मुद्रा भंडार का 729.33 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचना निश्चित ही भारत की अर्थव्यवस्था एक साथ कई मोर्चों पर मजबूती के संकेत दे रही है।
औद्योगिक उत्पादन जुलाई 2026 और अगस्त में सामने आया विदेशी मुद्रा भंडार का रिकॉर्ड इसी श्रेणी में आता है। एक तरफ देश की फैक्ट्रियों में उत्पादन की गति बढ़ी है, दूसरी तरफ भारत के पास बाहरी आर्थिक झटकों से निपटने के लिए विदेशी मुद्रा का मजबूत सुरक्षा कवच तैयार हुआ है। इनके बीच दुबई में भारतीय कंपनियों की बढ़ती मौजूदगी यह संकेत देती है कि भारत का कारोबारी आत्मविश्वास अब घरेलू सीमाओं से बाहर भी दिखाई दे रहा है।
उद्योग की मशीनें बता रही हैं विकास की दिशाजुलाई में औद्योगिक उत्पादन सूचकांक यानी आईआईपी में 6.7 प्रतिशत की सालाना वृद्धि इसका सबसे सकारात्मक पक्ष है। इसमें विनिर्माण क्षेत्र की प्रमुख भूमिका रही, जिसने 7.3 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की। औद्योगिक उत्पादन में तीन-चौथाई से अधिक हिस्सेदारी रखने वाला विनिर्माण क्षेत्र यदि लगातार गति पकड़ता है तो उसका असर आनेवाले दिनों में ओर अधिक सकारात्मक आएगा, यही उम्मीद है।
मोटर वाहन निर्माण में 22.2 प्रतिशत, विद्युत उपकरणों में 28.3 प्रतिशत और मशीनरी एवं उपकरण निर्माण में 12.1 प्रतिशत वृद्धि इस बात की ओर संकेत करती है कि भारत में औद्योगिक क्षमता का विस्तार हो रहा है। विनिर्माण के 23 में से 19 उद्योग समूहों का सकारात्मक प्रदर्शन भी बताता है कि वृद्धि कुछ चुनिंदा क्षेत्रों तक सिमटी हुई नहीं है।
भारत के लिए इसका महत्व इसलिए भी अधिक है क्योंकि विनिर्माण ही वह क्षेत्र है जो इंजीनियरिंग, तकनीक, प्रबंधन और कौशल से जुड़े युवाओं के लिए बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा करने की क्षमता रखता है। उत्पादन बढ़ने के साथ आपूर्ति श्रृंखला, परिवहन, लॉजिस्टिक्स और सेवा क्षेत्र में भी अवसर बढ़ते हैं।
पूंजीगत वस्तुओं में उछाल सबसे बड़ा संकेतइन आंकड़ों में शायद सबसे अधिक ध्यान आकर्षित करने वाला आंकड़ा पूंजीगत वस्तुओं में 16.1 प्रतिशत की वृद्धि है। पूंजीगत वस्तुओं की मांग में तेज वृद्धि को भविष्य के निवेश की तैयारी के रूप में भी देखा जाना चाहिए। यदि कंपनियां नई मशीनें खरीद रही हैं और उत्पादन क्षमता बढ़ा रही हैं, तो इसका अर्थ है कि उन्हें आने वाले समय में मांग और बाजार पर भरोसा दिखाई दे रहा है।
बुनियादी ढांचा एवं निर्माण सामग्री क्षेत्र में 6.9 प्रतिशत वृद्धि भी महत्वपूर्ण है। राजमार्गों, रेलवे, बंदरगाहों और अन्य सार्वजनिक परियोजनाओं पर खर्च का असर सीमेंट, स्टील, इंजीनियरिंग, परिवहन और निर्माण से जुड़े अनेक क्षेत्रों पर पड़ता है। सरकारी निवेश का यही गुणक प्रभाव अर्थव्यवस्था में मांग और रोजगार पैदा करता है।हालांकि खनन क्षेत्र में 0.9 प्रतिशत गिरावट और उपभोक्ता गैर-टिकाऊ वस्तुओं में 1 प्रतिशत कमी यह बताती है कि तस्वीर पूरी तरह एकरंगी नहीं है। विकास की इस गति को टिकाऊ बनाने के लिए कमजोर क्षेत्रों को भी गति देनी होगी।
भारत का कारोबार अब वैश्विक मंच परभारत के आर्थिक भरोसे का दूसरा महत्वपूर्ण अध्याय दुबई में दिखाई देता है। जून 2026 के अंत तक दुबई चैंबर के सक्रिय सदस्यों के रूप में पंजीकृत भारतीय कंपनियों की संख्या 85,841 तक पहुंचना इस बात का प्रमाण है कि भारतीय उद्यमी वैश्विक बाजारों में अपनी मौजूदगी लगातार बढ़ा रहे हैं। 2026 की पहली छमाही में ही 7,579 नई भारतीय कंपनियों का दुबई चैंबर से जुड़ना, पिछले वर्ष की तुलना में 15 प्रतिशत वृद्धि दर्शाता है जिसमें भारतीय कंपनियां दुबई को मध्य पूर्व, अफ्रीका और अन्य वैश्विक बाजारों तक पहुंचने के संचालन केंद्र के रूप में देख रही हैं।
2025 में भारत और दुबई के बीच गैर-तेल व्यापार 60.6 अरब डॉलर तक पहुंचा। 2016 से 2025 के बीच द्विपक्षीय व्यापार में 136.2 प्रतिशत वृद्धि यह बताती है कि दोनों अर्थव्यवस्थाओं के बीच संबंध पारंपरिक व्यापार से आगे बढ़ चुके हैं।यही किसी उभरती अर्थव्यवस्था के वैश्विक एकीकरण का वास्तविक संकेत है। भारत-यूएई व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौता यानी सीईपीए इस प्रक्रिया को और गति देने वाला माध्यम बना है।
729 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा कवचइसी बीच विदेशी मुद्रा भंडार का रिकॉर्ड स्तर भारत की बाहरी आर्थिक स्थिति को और मजबूती देता है। 21 अगस्त 2026 को समाप्त सप्ताह में विदेशी मुद्रा भंडार 12.4 अरब डॉलर बढ़कर 729.33 अरब डॉलर पहुंच गया। फरवरी 2026 के 728.5 अरब डॉलर के पिछले रिकॉर्ड को पार करना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता के दौर में पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार किसी भी अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण सुरक्षा कवच होता है।
विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियां 9.482 अरब डॉलर बढ़कर 591.333 अरब डॉलर हो गईं, जबकि स्वर्ण भंडार 2.801 अरब डॉलर बढ़कर 114.218 अरब डॉलर पहुंच गया। एसडीआर होल्डिंग और आईएमएफ में रिजर्व ट्रेंच पोजीशन में भी वृद्धि हुई। निश्चित ही यह भंडार भारत को आयात भुगतान, बाहरी दायित्वों और मुद्रा बाजार में अचानक आने वाले दबावों से निपटने के लिए अधिक क्षमता देता है। रुपए की स्थिरता के लिए भी यह महत्वपूर्ण है।
मजबूती के बीच जोखिमों को भूलना नहीं होगाइसके साथ हमें यह भी ध्यान रखना है कि रिकॉर्ड आंकड़ों के बीच आत्मसंतोष के लिए जगह नहीं होनी चाहिए। विदेशी पूंजी का प्रवाह भारत की बाहरी स्थिति मजबूत करता है, लेकिन उसके साथ लागत और वैश्विक वित्तीय परिस्थितियों का जोखिम भी जुड़ा है। ऊंची अमेरिकी ब्याज दरें, हेजिंग लागत और कच्चे तेल की कीमतें भारत की अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण बाहरी कारक बने हुए हैं।
विशेष रूप से तेल की ऊंची कीमतें भारत के आयात बिल और रुपए पर दबाव बढ़ा सकती हैं, इसलिए विदेशी मुद्रा भंडार का मजबूत होना जरूरी है, मगर दीर्घकालिक समाधान निर्यात बढ़ाने, ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने और घरेलू उत्पादन क्षमता को और व्यापक बनाने में है।
वस्तुत: इन आंकड़ों का सबसे बड़ा संदेश यही है कि भारत की आर्थिक यात्रा में अब कई मजबूत धाराएं एक साथ दिखाई दे रही हैं; उद्योग बढ़ रहा है, विनिर्माण गति पकड़ रहा है, पूंजीगत वस्तुओं की मांग निवेश की संभावना जगा रही है, बुनियादी ढांचा विस्तार पा रहा है, भारतीय कंपनियां दुनिया में जा रही हैं और विदेशी मुद्रा भंडार ऐतिहासिक ऊंचाई पर है। अत: जुलाई के औद्योगिक आंकड़ों और 729.33 अरब डॉलर के विदेशी मुद्रा भंडार को हमें उत्सव से अधिक अवसर के संकेत के रूप में देखना चाहिए। (लेखक, हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी

