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एआई, क्वांटम और सेमी कंडक्टर्स से लेकर ऊर्जा व खनिज तक, व्यापक है भारत-कनाडा अनुबंध

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एआई, क्वांटम और सेमी कंडक्टर्स से लेकर ऊर्जा व खनिज तक, व्यापक है भारत-कनाडा अनुबंध


डॉ. मयंक चतुर्वेदी

भारत और कनाडा के रिश्तों में बीते कुछ वर्षों में कई उतार-चढ़ाव देखने को मिले लेकिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी की हालिया मुलाकात ने द्विपक्षीय संबंधों को नई दिशा और ऊर्जा दी है। भारत के चार दिवसीय दौरे पर आए कनाडा के प्रधानमंत्री के साथ हुई वार्ताओं में जिस तरह से भविष्य की तकनीक, ऊर्जा सुरक्षा, सप्लाई चेन और व्यापार विस्तार पर ठोस समझौते हुए, वे 21वीं सदी की वैश्विक भू-राजनीति और अर्थव्यवस्था में भारत की भूमिका को और मजबूत करने वाले कदम हैं।

यह दौरा ऐसे समय हुआ है जब दुनिया तकनीकी क्रांति, ऊर्जा संक्रमण और सप्लाई चेन संकट के दौर से गुजर रही है। इसलिए भारत और कनाडा के बीच हुआ यह सहयोग दोनों देशों के लिए रणनीतिक, आर्थिक और तकनीकी दृष्टि से बेहद अहम साबित हो सकता है। प्रधानमंत्री मोदी द्वारा कही गई यह बात कि “हमारी पहली बैठक में ही दोनों देशों के संबंधों में नई ऊर्जा, परस्पर विश्वास और सकारात्मकता आई है,” पिछले कुछ वर्षों में रिश्तों में आई ठंडक को पिघलाने की एक गंभीर कोशिश का रूप में साफ दिखाई देती है।

कहना होगा कि भारत और कनाडा दोनों लोकतांत्रिक मूल्य, मानवाधिकार और बहुलतावादी समाज में विश्वास रखने वाले देश हैं। दोनों का साझा विजन ‘मानवता की भलाई’ है। इसी साझा सोच को अब “नेक्स्ट पार्टनरशिप” यानी भविष्य की रणनीतिक साझेदारी में बदलने की कोशिश की जा रही है। साल 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को 50 बिलियन डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य इस दिशा में एक ठोस रोडमैप प्रस्तुत करता है।

भारत और कनाडा के बीच हुए समझौतों का सबसे महत्वपूर्ण और दूरगामी असर डालने वाला पक्ष है, भविष्य की तकनीकों में सहयोग। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई), क्वांटम कंप्यूटिंग, सुपरकंप्यूटिंग और सेमीकंडक्टर्स जैसे क्षेत्रों में साझेदारी, भारत को तकनीकी महाशक्ति बनने की दिशा में एक बड़ा कदम है। आज दुनिया नई तकनीकी दौड़ में शामिल है, जहां डेटा, कंप्यूटिंग क्षमता और चिप निर्माण ही शक्ति संतुलन तय कर रहे हैं। अमेरिका-चीन टेक वॉर के बीच भारत के लिए यह अवसर है कि वह विश्वसनीय तकनीकी साझेदार के रूप में उभरे। कनाडा इस क्षेत्र में शोध, नवाचार और स्टार्टअप इकोसिस्टम में मजबूत स्थिति रखता है, जबकि भारत के पास विशाल टैलेंट पूल और तेजी से बढ़ता डिजिटल बाजार है।

अंतरिक्ष क्षेत्र में स्टार्टअप्स और निजी उद्योगों को जोड़ने की योजना भारत के न्यू स्पेस सेक्टर के लिए मील का पत्थर साबित हो सकती है। इसरो की सफलताओं के बाद भारत में अंतरिक्ष स्टार्टअप्स की संख्या तेजी से बढ़ी है। कनाडा के साथ साझेदारी से तकनीक, फंडिंग और वैश्विक बाजार तक पहुंच आसान होगी। इससे रोजगार के नए अवसर पैदा होने के साथ ही भारत अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी में एक प्रमुख वैश्विक खिलाड़ी बन सकता है।

ऊर्जा क्षेत्र में हुआ सहयोग भारत-कनाडा संबंधों का दूसरा बड़ा स्तंभ है। हाइड्रोकार्बन्स, रिन्यूएबल एनर्जी, ग्रीन हाइड्रोजन और ऊर्जा भंडारण जैसे क्षेत्रों में साझेदारी, भारत की ऊर्जा सुरक्षा और जलवायु लक्ष्यों दोनों के लिए अहम है। वस्तुतः भारत तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है और उसकी ऊर्जा जरूरतें भी तेजी से बढ़ रही हैं। वहीं कनाडा के पास प्राकृतिक संसाधनों और स्वच्छ ऊर्जा तकनीकों का विशाल भंडार है। दोनों देशों के सहयोग से ऊर्जा आपूर्ति स्थिर होगी, कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने की दिशा में भी ठोस प्रगति संभव होगी।

‘भारत-कनाडा रिन्यूएबल एनर्जी और स्टोरेज समिट’ का आयोजन इस साझेदारी को व्यावहारिक धरातल पर उतारने का मंच बनेगा। इसके साथ ही कनाडा का अंतरराष्ट्रीय सोलर अलायंस (ISA) और ग्लोबल बायोफ्यूल अलायंस में शामिल होना, भारत की वैश्विक नेतृत्व भूमिका को और मजबूत करता है।

आज की वैश्विक अर्थव्यवस्था में क्रिटिकल मिनरल्स जैसे लिथियम, कोबाल्ट, निकल और रेयर अर्थ एलिमेंट्स का महत्व किसी भी देश की आर्थिक और सामरिक शक्ति को तय करता है। इलेक्ट्रिक वाहन, बैटरी, सेमीकंडक्टर और रक्षा उपकरण इन्हीं पर निर्भर हैं। कनाडा इन खनिजों का बड़ा उत्पादक है, जबकि भारत इनका बड़ा उपभोक्ता बनने जा रहा है। ऐसे में क्रिटिकल मिनरल्स पर हुआ MoU भारत की सप्लाई चेन सुरक्षा के लिए बेहद अहम है। इससे चीन पर निर्भरता कम होगी और भारत को अपनी ग्रीन एनर्जी व इलेक्ट्रिक मोबिलिटी योजनाओं के लिए स्थायी आपूर्ति सुनिश्चित होगी।

यह अनुबंध रणनीतिक दृष्टि से भी भारत की स्थिति को मजबूत करता है, क्योंकि भविष्य की लड़ाइयाँ संसाधनों और तकनीक पर आधारित होंगी। प्रधानमंत्री मोदी द्वारा बताया गया कि कनाडा के पेंशन फंड्स ने भारत में 100 बिलियन डॉलर का निवेश किया है, यह भारत की अर्थव्यवस्था पर वैश्विक विश्वास का बड़ा संकेत है। इंफ्रास्ट्रक्चर, रियल एस्टेट, फिनटेक और ग्रीन एनर्जी जैसे क्षेत्रों में यह निवेश रोजगार सृजन और विकास की गति को तेज करेगा।

सीईपीए (व्यापक आर्थिक भागीदारी समझौता) के लिए टर्म्स ऑफ रेफरेंस और जॉइंट पल्स प्रोटीन सेंटर ऑफ एक्सीलेंस पर हुए समझौते कृषि, खाद्य सुरक्षा और व्यापार संतुलन को मजबूत करेंगे। इससे किसानों, स्टार्टअप्स और एमएसएमई सेक्टर को सीधा लाभ मिलेगा। अत: इन तथ्यों के आधार पर आज यही कहना होगा कि भारत-कनाडा अनुबंध को सिर्फ द्विपक्षीय नजरिए से देखना पर्याप्त नहीं होगा। यह साझेदारी वैश्विक शक्ति संतुलन में भारत की स्थिति को और मजबूत करती है। पश्चिमी देशों के साथ मजबूत संबंध भारत को एक भरोसेमंद, स्थिर और लोकतांत्रिक साझेदार के रूप में स्थापित करते हैं। इसके साथ ही यह सहयोग भारत की बहुपक्षीय कूटनीति को भी मजबूती देता है, जहां वह अमेरिका, यूरोप, जापान, ऑस्ट्रेलिया और अब कनाडा के साथ मिलकर एक संतुलित वैश्विक ढांचा तैयार कर रहा है।

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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी