चोरी भी... वापसी भी! आखिर भारत की सांस्कृतिक धरोहरों का प्रहरी कौन?
-डॉ. मयंक चतुर्वेदी
एक ओर दुनिया से लौट रही हैं भारत की बेशकीमती पुरावस्तुएं, दूसरी ओर राज्यों की लापरवाही से देश के भीतर ही असुरक्षित हैं हमारी ऐतिहासिक विरासतें…
भारत इन दिनों अपनी सांस्कृतिक विरासत को लेकर दो बिल्कुल विपरीत धाराओं में चलता हुआ दिखाई दे रहा है। पहली तस्वीर गौरव से भर देने वाली है। दुनिया के बड़े-बड़े संग्रहालयों, निजी संग्रहों और नीलामी घरों में पहुंच चुकी भारत की सैकड़ों प्राचीन मूर्तियां, शिलालेख और कलाकृतियां प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में चलाए गए पुरा-संपदा वापसी अभियान के तहत एक-एक कर स्वदेश लौट रही हैं, तो दूसरी तस्वीर उतनी ही पीड़ादायक है।
वस्तुत: देश के किलों, मंदिरों और संरक्षित स्मारकों से आज भी हमारी अमूल्य धरोहरें और मूर्तियां चोरी हो रही हैं। कई बार प्रशासन को इसकी भनक तक नहीं लगती, जब तक कि कोई इस बारे में ध्यान नहीं दिलाता है! सवाल यह है कि जब भारत विदेशों से अपनी खोई हुई विरासत वापस लाने में सफल हो रहा है, तब हम अपने ही घर की विरासत को सुरक्षित क्यों नहीं रख पा रहे?
मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले के ऐतिहासिक “नरवर” किले में हुई घटना ने इस प्रश्न को और अधिक सोचनीय बना दिया है। करीब पांच सौ वर्ष पुरानी, तीन हजार किलोग्राम से अधिक वजनी अष्टधातु की ऐतिहासिक तोप रात के अंधेरे में हथियारबंद बदमाश क्रेन और ट्रक के सहारे उठाकर ले गए। 25 से 30 बदमाशों का गिरोह आया, सुरक्षा कर्मियों को आधुनिक हथियारों के दम पर धमकाया और सदियों पुरानी धरोहर लेकर चला गया। यह किसी फिल्म की पटकथा नहीं, बल्कि भारत की विरासत सुरक्षा व्यवस्था की वास्तविक तस्वीर है।
सबसे अधिक चिंता की बात इस तोप चोरी प्रकरण में यह है कि घटना से पहले संदिग्ध गतिविधियों की सूचना स्थानीय लोगों ने दी थी। सुरक्षा बढ़ाने की मांग भी हुई थी, किंतु जिम्मेदार तंत्र ने इसे गंभीरता से नहीं लिया। जिस किले में करोड़ों रुपये मूल्य की ऐतिहासिक धरोहर रखी हो, वहां न पर्याप्त रोशनी, न आधुनिक निगरानी व्यवस्था और न प्रशिक्षित सुरक्षा बल! आखिर ऐसी लापरवाही की कीमत कौन चुका रहा है? इतिहास तो पहले ही चुका रहा है, देश के सामने अनेक मसले हैं जो ऐतिहासिक भूल के कारण आज भी भारत के समक्ष नासूर बने हुए हैं!
ऐसे में यह घटना सोचने पर विवश कर रही है कि नरवर ही क्यों पिछले कई दशकों से देश के अनेक राज्य अंतरराष्ट्रीय पुरावस्तु तस्करों के लिए आसान निशाना क्यों बने हुए हैं! भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के आंकड़े बताते हैं कि उसके संरक्षित स्मारकों से ही 480 से अधिक महत्वपूर्ण पुरावशेष गायब हो चुके हैं। सबसे अधिक प्रभावित राज्यों में मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश शामिल हैं। तमिलनाडु के चोलकालीन मंदिरों से लेकर बिहार के नालंदा संग्रहालय, कर्नाटक के होयसल मंदिरों, आंध्र प्रदेश के प्राचीन मंदिरों और हिमालयी क्षेत्रों के दुर्लभ देवस्थानों तक, शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र बचा हो जहां तस्करों ने अपनी पहुंच न बनाई हो।
खजुराहो की दुर्लभ मूर्तियां हों, तंजावुर के मंदिरों की कांस्य नटराज प्रतिमाएं, चंद्रकेतुगढ़ की मौर्यकालीन टेराकोटा कलाकृतियां या मथुरा की कुषाणकालीन प्रतिमाएं, आज भी भारत की हजारों अमूल्य धरोहरें वर्षों तक फर्जी दस्तावेजों के सहारे विदेशों के संग्रहालयों और निजी संग्रहों तक पहुंचती रही हैं। विरासत संरक्षण से जुड़े शोधकर्ताओं द्वारा बार-बार तथ्यों एवं संदर्भों के आधार पर बताया जा रहा है कि भारत से हर दशक हजारों महत्वपूर्ण कलाकृतियां अवैध रूप से बाहर भेजी जाती हैं, जबकि वास्तविक चोरी के मामलों का बहुत छोटा हिस्सा ही पुलिस रिकॉर्ड तक पहुंच पाता है।
अब इसके उलट बात तस्वीर के दूसरे पक्ष की भी करते हैं जोकि आशा जगाता है। वर्ष 2014 के बाद भारत ने अपनी सांस्कृतिक विरासत की वापसी को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाया। पहले जहां विदेशों में पहुंच चुकी भारतीय कलाकृतियों को वापस लाने के प्रयास बिखरे हुए थे, वहीं अब यह भारत की विदेश नीति और सांस्कृतिक कूटनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है।
आंकड़े स्वयं इस परिवर्तन की कहानी कहते हैं। स्वतंत्रता से लेकर वर्ष 2014 तक भारत सिर्फ 13 चोरी हुई पुरावस्तुएं ही वापस ला सका था, किंतु पिछले एक दशक में यह संख्या बढ़कर 600 से अधिक और नवीनतम सरकारी आंकड़ों के अनुसार लगभग 668 तक पहुंच चुकी है। स्वभाविक है ये दृष्य भारत के सांस्कृतिक आत्मविश्वास की पुनर्स्थापना है।
इस अभियान में अमेरिका सबसे बड़ा सहयोगी बनकर सामने आया। अकेले अमेरिका से 500 से अधिक भारतीय पुरावस्तुएं वापस मिली हैं। सितंबर 2024 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अमेरिका यात्रा के दौरान 297 ऐतिहासिक कलाकृतियों की वापसी विश्व इतिहास की सबसे बड़ी सांस्कृतिक प्रत्यावर्तन घटनाओं में गिनी गई। इनमें दो हजार वर्ष ईसा पूर्व से लेकर उन्नीसवीं शताब्दी तक की दुर्लभ मूर्तियां, जैन तीर्थंकर, विष्णु, गणेश, अप्सराएं और अनेक पवित्र कलाकृतियां शामिल थीं।
ऑस्ट्रेलिया ने चोलकालीन नटराज प्रतिमा लौटाई, ब्रिटेन ने दुर्लभ मूर्तियां वापस कीं, इटली, कनाडा, जर्मनी, सिंगापुर और स्कॉटलैंड ने भी भारत की विरासत लौटाने में सहयोग दिया। हाल ही में नीदरलैंड से चोलकालीन दुर्लभ ताम्रपत्र 'सेप्पू पट्टायम' की वापसी ने इस अभियान को नई ऊंचाई दी। यह स्पष्ट संकेत है कि आज विश्व भारत की सांस्कृतिक विरासत पर उसके अधिकार को पहले की तुलना में कहीं अधिक सम्मान दे रहा है। किंतु वहीं एक असहज प्रश्न भी खड़ा हो रहा है?
यदि केंद्र सरकार विदेशों से सदियों पहले चोरी हुई धरोहरों को वापस ला सकती है, तो क्या राज्य सरकारें अपने अधिकार क्षेत्र में मौजूद धरोहरों की सुरक्षा भी उसी गंभीरता से नहीं कर सकतीं? आखिर क्यों आज भी अनेक संरक्षित स्मारकों में सीसीटीवी कैमरे नहीं हैं? क्यों रात में पर्याप्त प्रकाश व्यवस्था नहीं होती? क्यों प्रशिक्षित सुरक्षा बलों की जगह मात्र औपचारिक चौकीदारी से काम चलाया जा रहा है? और इससे भी महत्वपूर्ण प्रश्न? किसी चोरी के बाद प्रशासन की जवाबदेही भी कभी तय होती है क्या ?
वास्तव में यह किसी को नहीं भूलना चाहिए कि सांस्कृतिक विरासत पर्यटन का साधन होने के साथ ही किसी राष्ट्र की स्मृति, उसकी पहचान और उसके आत्मसम्मान का आधार होती है। एक मंदिर से चोरी हुई मूर्ति पत्थर या धातु का टुकड़ा होने तक सीमित नहीं है, वह तो सदियों से उस समाज की आस्था, इतिहास और सांस्कृतिक निरंतरता का केंद्र बिन्दु है, इसलिए जब कोई प्रतिमा चोरी होती है तो वह पूरे समाज की सांस्कृतिक चेतना का भी ह्रास है।
यहां अब कहना यही है कि नरवर किले की चोरी को सिर्फ एक आपराधिक घटना मान लेना बड़ी भूल होगी। यह उन सभी राज्यों के लिए चेतावनी है जहां हजारों संरक्षित स्मारक आज भी न्यूनतम सुरक्षा व्यवस्था के भरोसे खड़े हैं। यदि तीन हजार किलो वजनी तोप को अपराधी योजनाबद्ध तरीके से उठा सकते हैं, तो छोटी प्रतिमाओं और दुर्लभ पुरावशेषों की सुरक्षा का अनुमान सहज लगाया जा सकता है।
अब समय घटनाओं पर एफआईआर दर्ज करने के साथ इस बात का भी है कि देश में विरासत सुरक्षा की नई राष्ट्रीय कार्यसंस्कृति विकसित हो। प्रत्येक राज्य को अपने सभी पुरावशेषों की डिजिटल सूची तैयार करनी चाहिए। साथ ही वह आधुनिक निगरानी प्रणाली स्थापित करे। विरासत अपराधों के लिए विशेष पुलिस इकाइयां बनाए और पुरातत्व विभाग, स्थानीय प्रशासन तथा खुफिया एजेंसियों के बीच समन्वय को अनिवार्य बनाया जाए। इसे सभी समझें कि विरासत संरक्षण किन्हीं फाइलों तक सीमित हो जानेवाला विषय नहीं है, यह तो शासन की प्राथमिकता में सबसे ऊपर के मुख्य 10 पायदानों में होना चाहिए।
आज इस बात को भी सभी गहराई से समझ लें; वस्तुत: भारत आज दुनिया से अपनी बिखरी हुई सांस्कृतिक पहचान वापस ला रहा है। यह स्वतंत्र भारत की सबसे बड़ी सांस्कृतिक उपलब्धियों में से एक है, किंतु इस उपलब्धि का वास्तविक सम्मान तभी होगा, जब देश के भीतर मौजूद प्रत्येक मंदिर, प्रत्येक किला, प्रत्येक संग्रहालय और प्रत्येक पुरावशेष भी उतना ही सुरक्षित होगा, जितनी मेहनत से उन्हें विदेशों से वापस लाया जा रहा है। यदि एक हाथ से हम अपनी विरासत वापस ला रहे हैं और दूसरे हाथ से उसे लापरवाही के कारण खोते जा रहे हैं, तो यह निश्चित तौर पर राष्ट्रीय चेतना के सामने खड़ा सबसे बड़ा आज का मुख्य प्रश्न है?
---------------
(लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबंद्ध हैं)
हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी

