वैश्विक ऊर्जा संकट 1970 के दशक से भी भयंकर और भारत!
डॉ. मयंक चतुर्वेदी
पश्चिम एशिया में अमेरिका–इजराइल और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य टकराव ने वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा को अभूतपूर्व संकट में डाल दिया है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) के प्रमुख फातिह बिरोल द्वारा दी गई चेतावनी कि यह संकट 1970 के दशक के तेल संकट से भी अधिक गंभीर हो सकता है, वर्तमान स्थिति की भयावहता को रेखांकित करती है। विशेष रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास बढ़ते तनाव ने वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला को अस्थिर कर दिया है, जिससे ऊर्जा बाजारों में अनिश्चितता चरम पर पहुंच गई है।
इतिहास में पीछे जाएं और 1970 के दशक को देखें तो ध्यान में आता है कि उस दौरान भी तेल संकट मुख्यतः उत्पादन में कटौती और राजनीतिक दबावों के कारण उत्पन्न हुआ था, किंतु उस तुलना में वर्तमान संकट कहीं अधिक जटिल है। इसमें सैन्य संघर्ष, समुद्री मार्गों पर खतरा, साइबर और भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा जैसे कई आयाम शामिल हैं। डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा ईरान को दी गई सख्त चेतावनी कि यदि ‘होर्मुज जलडमरूमध्य’ को नहीं खोला गया तो ईरानी ऊर्जा ढांचे को निशाना बनाया जाएगा ने स्थिति को और अधिक विस्फोटक बना दिया है।
इसी के समानांतर, इजराइल ने भी अपने सैन्य अभियानों को तेज किया है, जिससे क्षेत्र में अस्थिरता और बढ़ गई है। मिसाइल हमलों और जवाबी कार्रवाई ने वैश्विक ऊर्जा प्रवाह को भी बाधित किया है। जबकि ये सर्वविदित है कि ‘होर्मुज जलडमरूमध्य’ विश्व के कुल तेल और गैस परिवहन का लगभग 20 फीसद वहन करता है। इस मार्ग में किसी भी प्रकार की रुकावट का अर्थ है वैश्विक ऊर्जा बाजार में भारी उथल-पुथल। वर्तमान संघर्ष के कारण कई टैंकर इस मार्ग से गुजरने में असमर्थ रहे हैं और सैकड़ों जहाज खाड़ी में लंगर डाले प्रतीक्षा कर रहे हैं। इस स्थिति के चलते वर्तमान में ऊर्जा कीमतों में अस्थिरता, परिवहन लागत में वृद्धि और वैश्विक मुद्रास्फीति के बढ़ने का भी संकेत लगतार मिल रहा है। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) सदस्य देशों ने 40 करोड़ बैरल तेल अपने रणनीतिक भंडार से जारी करने का निर्णय लिया है। यह कदम बाजार में अस्थिरता को नियंत्रित करने का प्रयास है, किंतु यदि संघर्ष लंबा खिंचता है, तो यह उपाय भी सीमित साबित हो सकता है।
भारत के लिए चुनौती और अवसर
भारत, जोकि अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है, इस संकट से सीधे प्रभावित होने वाला देश है। फिर भी, इस संकट के दौरान भारत ने जिस प्रकार बहुस्तरीय रणनीति अपनाई है, वह उल्लेखनीय है। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने कूटनीति, सैन्य तैयारी और आर्थिक प्रबंधन का संतुलित समन्वय प्रस्तुत किया है। जहां कई देश केवल प्रतिक्रिया देते नजर आए, वहीं भारत ने सक्रिय नीति अपनाते हुए संकट को अवसर में बदलने का प्रयास किया।
भारत ने इस पूरे संघर्ष में किसी एक पक्ष का खुला समर्थन करने के बजाय संतुलित कूटनीति अपनाई। ईरान, खाड़ी देशों और पश्चिमी शक्तियों के साथ संवाद बनाए रखते हुए भारत ने अपने जहाजों के लिए सुरक्षित मार्ग सुनिश्चित किया। इस नीति का सबसे बड़ा लाभ यह हुआ कि भारत की ऊर्जा आपूर्ति पूरी तरह बाधित नहीं हुई। साथ ही, वैश्विक मंच पर भारत की छवि एक जिम्मेदार और विश्वसनीय शक्ति के रूप में मजबूत हुई।
भारत ने संकट के शुरुआती चरण में ही अपनी नौसेना को सक्रिय कर दिया। संवेदनशील समुद्री क्षेत्रों में एस्कॉर्ट ऑपरेशन चलाए गए, जिससे भारतीय टैंकरों को सुरक्षित मार्ग मिल सका। ‘जग लाडकी’, ‘शिवालिक’ और ‘नंदा देवी’ जैसे टैंकरों की सुरक्षित वापसी इस रणनीति की सफलता का प्रमाण है। इन जहाजों के माध्यम से कच्चे तेल और एलपीजी की निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित हुई, जिससे देश में ऊर्जा संकट टल गया।
एक तरह से देखा जाए तो ऊर्जा संकट के दौरान सबसे बड़ा खतरा आपूर्ति में कमी नहीं, “घबराहट” होता है। भारत ने इसे समझते हुए आपूर्ति प्रबंधन को प्राथमिकता दी। सरकार ने घरेलू उपभोक्ताओं को प्राथमिकता दी, जबकि औद्योगिक उपयोग को नियंत्रित किया गया। आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत जमाखोरी और कालाबाजारी पर कड़ी कार्रवाई की गई। परिणामस्वरूप, देश में गैस और ईंधन की व्यापक कमी या सामाजिक असंतोष देखने को नहीं मिला।
कीमत नियंत्रण और आर्थिक संतुलन
वैश्विक बाजार में तेल की कीमतों में तेजी के बावजूद भारत ने पेट्रोल-डीजल की कीमतों को अपेक्षाकृत नियंत्रित रखा। यह संभव हुआ कर नीति, वैकल्पिक स्रोतों से आयात और कुशल आपूर्ति प्रबंधन के कारण। इस नीति का सकारात्मक प्रभाव यह हुआ कि महंगाई पर नियंत्रण बना रहा और आर्थिक गतिविधियां बाधित नहीं हुईं। जहां कई देशों में ऊर्जा संकट ने अर्थव्यवस्था को झटका दिया, वहीं भारत अपेक्षाकृत स्थिर बना रहा।
यहां उल्लेखित है कि पिछले एक दशक में भारत ने ऊर्जा स्रोतों के विविधीकरण पर विशेष ध्यान दिया है। रूस, अमेरिका और अन्य देशों से आयात बढ़ाने की नीति ने इस संकट में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसका परिणाम यह हुआ कि किसी एक क्षेत्र में संकट आने के बावजूद भारत की ऊर्जा आपूर्ति पूरी तरह बाधित नहीं हुई। यह रणनीति भविष्य के लिए भी ऊर्जा सुरक्षा का मजबूत आधार तैयार करती है।
संकट प्रबंधन में डिजिटल तकनीक का उपयोग भी भारत की सफलता का एक प्रमुख कारण रहा। रियल-टाइम डेटा के माध्यम से आपूर्ति और वितरण की निगरानी की गई, जिससे त्वरित निर्णय लेना संभव हुआ। राज्यों के साथ समन्वय स्थापित कर स्थानीय स्तर पर समस्याओं का समाधान किया गया। इससे संकट अराजकता में परिवर्तित नहीं हुआ और व्यवस्था बनी रही।
इस पूरे घटनाक्रम का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि भारत एक “संतुलनकारी शक्ति” के रूप में उभरा है। वैश्विक नेताओं द्वारा यह संकेत दिया जाना कि भारत इस संघर्ष को कम करने में भूमिका निभा सकता है, उसकी बढ़ती कूटनीतिक शक्ति का प्रमाण है। अमेरिका–इजरायल और ईरान के बीच युद्ध ने वैश्विक ऊर्जा व्यवस्था को गहरे संकट में डाल दिया है। होर्मुज जलडमरूमध्य की अस्थिरता ने यह स्पष्ट कर दिया है कि आधुनिक विश्व में ऊर्जा सुरक्षा उनके प्रबंधन और रणनीतिक नियंत्रण का विषय है।
इस संकट के बीच भारत ने जिस प्रकार संतुलित कूटनीति, सैन्य तैयारी, आर्थिक नीति और प्रशासनिक दक्षता का समन्वय किया, वह एक आदर्श मॉडल प्रस्तुत करता है। भविष्य में, जैसे-जैसे वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव बढ़ेंगे, ऊर्जा सुरक्षा और भी महत्वपूर्ण होती जाएगी। ऐसे में भारत की रणनीति उसे संकट से उबारने में सहायक सिद्ध होगी, बल्कि कहना होगा कि उसे वैश्विक मंच पर एक निर्णायक शक्ति के रूप में स्थापित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। फिलहाल तो यही नजर आ रहा है।
(लेखक, हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी

