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होली : रंग, संस्कृति और जीवन दर्शन का उत्सव

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होली : रंग, संस्कृति और जीवन दर्शन का उत्सव


होली : रंग, संस्कृति और जीवन दर्शन का उत्सव


-उदय कुमार सिंह

भारत विविधताओं, परंपराओं और उत्सवों का देश है। यहां मनाए जाने वाले प्रत्येक पर्व का अपना सांस्कृतिक, सामाजिक और आध्यात्मिक महत्व है। इन्हीं पर्वों में होली का विशेष स्थान है। रंगों, उमंगों और प्रेम का संदेश देने वाला यह त्योहार केवल एक उत्सव नहीं बल्कि भारतीय जीवन दर्शन का जीवंत प्रतीक है। होली प्रकृति, संस्कृति और मानवीय भावनाओं का अद्भुत संगम है, जो समाज में प्रेम, सौहार्द और भाईचारे की भावना को मजबूत करता है।

भारतीय सनातन संस्कृति में प्रत्येक पर्व उत्सव के साथ-साथ आध्यात्मिक संदेश और जीवन दर्शन का प्रतीक होता है। उन्हीं पावन पर्वों में से एक है होली, जो रंगों, उल्लास और भक्ति का अद्भुत संगम माना गया है। फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला यह पर्व केवल बाहरी रंगों का उत्सव नहीं बल्कि अंतर्मन को प्रेम, करुणा और सद्भाव से रंगने का अवसर है।

रंगों का त्योहार

होली का नाम लेते ही मन में रंगों की फुहार, हंसी-ठिठोली और उल्लास का वातावरण सजीव हो उठता है। होली जीवन के उत्साह और आनंद का प्रतीक है। यह पर्व मनुष्य के भीतर छिपी प्रसन्नता को बाहर लाने का अवसर प्रदान करता है। यह केवल रंगों का त्योहार नहीं बल्कि भावनाओं का उत्सव है। फाग गीतों की मधुरता, ढोल-मंजीरों की थाप, मित्रों और परिजनों की हंसी तथा अबीर-गुलाल की रंगत इस पर्व को विशेष बनाती है। प्रकृति भी मानो इस उत्सव में सहभागी बन जाती है। आम के पेड़ों पर आई बौर, भंवरों की गूंज, खिले हुए फूल और कोयल की मधुर कूक वातावरण को आनंदमय बना देती है।

इसबार होली कब है?

इस साल 3 मार्च को चंद्रग्रहण लगने जा रहा है। इसलिए सबसे बड़ा सवाल यह है कि रंग कब खेला जाएगा? ज्योतिष के अनुसार , चंद्रग्रहण लगने के नौ घंटे पहले से सूतक काल प्रारंभ हो जाता है। सूतक काल में किसी भी तरह के धार्मिक उत्सव मनाने से परहेज किया जाता है। ऐसे में होली 4 मार्च 2026 को मनाया जाएगा। अगर शास्त्र सम्मत विधि की बात की जाए तो ग्रहण के समापन के उपरांत रंग खेल सकते हैं इसलिए धुलंडी (रंगों की होली) 4 मार्च को ही खेली जाएगी।

चंद्रग्रहण का समय

पंचांग के अनुसार, इस बार होली के साथ चंद्रग्रहण भी लगने जा रहा है, जो भारत में दृश्यमान रहेगा। इसलिए सम्पूर्ण भारत में ग्रहण का सूतक काल भी लागू रहेगा। भारतीय समयानुसार, चंद्रग्रहण 3 मार्च को दोपहर में 3 बजकर 20 मिनट से प्रारंभ हो जाएगा, जिसका समापन शाम 6 बजकर 47 मिनट पर होगा। अगर कुल अवधि की बात की जाए तो इस बार का चंद्रग्रहण 3 घंटे 27 मिनट तक दिखेगा।

ऋतु से होली का संबंध

होली का सीधा संबंध ऋतुओं के राजा बसंत से है। बसंत ऋतु प्रकृति के नवजीवन का प्रतीक मानी जाती है। पतझड़ के बाद जब वृक्षों पर नई कोपलें फूटती हैं, खेतों में सरसों पीली चादर ओढ़ लेती है और वातावरण सुगंधित हो उठता है, तब होली का आगमन होता है।

बसंत प्रेम, नवचेतना और उल्लास का संदेश लेकर आता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इसी ऋतु में भगवान श्रीराम का माता सीता से प्रथम मिलन हुआ था। भगवान श्रीकृष्ण ने वृंदावन में गोपियों संग रास रचाकर प्रेम और आनंद का संदेश दिया। महाशिवरात्रि का पावन पर्व भी इसी काल में आता है, जो भगवान शिव और माता पार्वती के दिव्य मिलन की स्मृति से जुड़ा है। इस प्रकार होली केवल सामाजिक नहीं, बल्कि धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है।

होली का संदेश

होली बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक पर्व है। होलिका दहन की परंपरा हमें यह सिखाती है कि अहंकार, अन्याय और अधर्म का अंत निश्चित है। पौराणिक कथा के अनुसार, भक्त प्रह्लाद की अटूट भक्ति के सामने अत्याचारी हिरण्यकश्यप और होलिका का अहंकार नष्ट हो गया। इसलिए होलिका दहन केवल एक अनुष्ठान नहीं, बल्कि जीवन की नकारात्मकताओं को त्यागने का प्रतीक है।

यह पर्व नवसंवत्सर के स्वागत की भी तैयारी है। होली हमें मन की कलुषता, ईर्ष्या, द्वेष और वैमनस्य को त्याग कर नए उत्साह और सकारात्मक सोच के साथ जीवन की नई शुरुआत करने का संदेश देती है। होली मिलन कार्यक्रम सामाजिक समरसता और आपसी मेल-जोल को बढ़ावा देते हैं।

होली और रंगों की परंपरा

होली रंगों का त्योहार है और रंग जीवन के विविध भावों के प्रतीक हैं। लाल रंग प्रेम और ऊर्जा का, पीला रंग खुशहाली का, हरा रंग समृद्धि का तथा नीला रंग शांति और विश्वास का प्रतीक माना जाता है।

होली के दिन बच्चे, युवा और बुजुर्ग सभी रंगों में सराबोर हो जाते हैं। गलियों, मोहल्लों, गांवों और शहरों में उत्साह का वातावरण दिखाई देता है। हाथों में पिचकारियां, चेहरे पर मुस्कान और दिलों में अपनापन-यही होली की असली पहचान है। इस दिन सामाजिक भेदभाव समाप्त हो जाते हैं और सभी लोग एक समान होकर उत्सव मनाते हैं। “बुरा न मानो होली है” केवल एक वाक्य नहीं बल्कि जीवन को सहजता और प्रसन्नता से जीने का संदेश है। यह पर्व हमें क्षमा, अपनापन और सकारात्मक सोच अपनाने की प्रेरणा देता है।

होली की सामाजिक और सांस्कृतिक महत्ता

होली आपसी प्रेम, एकता और भाईचारे का प्रतीक है। यह पर्व रिश्तों में आई दूरियों को मिटाने का अवसर प्रदान करता है। लोग पुराने गिले-शिकवे भूलकर एक-दूसरे को गले लगाते हैं और शुभकामनाएं देते हैं। परंपरा के अनुसार, होली के दिन लोग मित्रों और रिश्तेदारों के घर जाकर अबीर-गुलाल लगाते हैं, बुजुर्गों का आशीर्वाद लेते हैं और बच्चों को स्नेह प्रदान करते हैं। मिठाइयों और पकवानों का आदान-प्रदान सामाजिक संबंधों को और मजबूत बनाता है।

आज के व्यस्त जीवन में जहां लोगों के बीच दूरी बढ़ती जा रही है, वहां होली जैसे पर्व समाज को जोड़ने का कार्य करते हैं। यह हमें याद दिलाती है कि जीवन का वास्तविक आनंद प्रेम, सहयोग और सद्भाव में ही निहित है।

प्रह्लाद की अटूट भक्ति

होली का मूल संबंध भक्त प्रह्लाद और उनके पिता हिरण्यकशिपु की कथा से जुड़ा है। हिरण्यकशिपु असुरराज था, जिसने अपने अहंकार में स्वयं को ईश्वर घोषित कर दिया था। किंतु उसका पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु का अनन्य भक्त था। अनेक यातनाएं देने के बावजूद प्रह्लाद की भक्ति अडिग रही। अंततः हिरण्यकशिपु की बहन होलिका, जिसे अग्नि से न जलने का वरदान प्राप्त था, प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठ गई। किन्तु दैवीय न्याय देखिए, होलिका जलकर भस्म हो गई और प्रह्लाद सुरक्षित रहे। इसी स्मृति में होलिका दहन किया जाता है। यह दहन केवल लकड़ियों, गोबर के उपलों और बल्लों का नहीं बल्कि अहंकार, क्रोध, ईर्ष्या और पाप प्रवृत्तियों का होता है।

रंगों की होली

होलिका दहन के दूसरे दिन रंगों की होली खेली जाती है। यह दिन सामाजिक समरसता और आपसी प्रेम का प्रतीक है। छोटे-बड़े, अमीर-गरीब, जाति-पंथ के भेद मिटाकर सभी एक-दूसरे को रंग लगाते हैं। सनातन परंपरा में ब्रजभूमि में इस त्यौहार का विशेष महत्व है। वृंदावन और बरसाना की लठमार होली विश्व प्रसिद्ध है। इस त्यौहार राधा-कृष्ण की दिव्य लीलाओं की स्मृति है, जो ब्रज जी गलियों सहित पूरे भारत में आज भी जीवंत है।

होली मनाने की परंपराएं

होली भारत के अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग तरीकों से मनाई जाती है। होली मानने की कुछ परंपराओं में ब्रज की लठमार होली (बरसाना और नंदगांव) शामिल है। ब्रज की लठमार होली दुनिया भर में प्रसिद्ध है। यहां पर खेली जाने वाली होली भगवान कृष्ण व राधा के प्रेम का प्रतीक मानी जाती है। मान्यता है कि कृष्ण अपने सखाओं के साथ बरसाना होली खेलने जाते थे और राधा व उनकी सखियां उन्हें लाठियों से रोकती थीं। इसलिए आज भी यह होली खेली जाती है, जिसमें महिलाएं पुरुषों को डंडों से पीटती हैं। पुरुष खुद को ढाल से बचाते हैं। यह पूरी होली हंसी-मजाक और गीतों के साथ होती है।

फूलों की होली (वृंदावन, उत्तर प्रदेश): फूलों की होली वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर में एकादशी के दिन मनाई जाती है। यहां रंगों या गुलाल की जगह ताजे फूलों की पंखुड़ियों का उपयोग किया जाता है। मंदिर के पुजारी भक्तों पर फूल बरसाते हैं। भक्त भगवान पर फूल और गुलाल उड़ाते हैं।

धुलंडी और डोलची होली (राजस्थान): यह मुख्य रूप से राजस्थान के जयपुर, उदयपुर और कोटा जैसे शहरों के आस पास के क्षेत्र में मनाई जाती है। इस दिन लोग एक-दूसरे को अबीर-गुलाल और पानी वाले रंगों से सराबोर कर देते हैं। टोलियां बनाकर ढोल-नगाड़ों के साथ शहर या गांव की गलियों में निकलते हैं और ‘होली है’ का शोर मचाते हैं। साथ ही मारवाड़ क्षेत्र में पारंपरिक कपड़े पहनकर ढोल-नगाड़ों के साथ नृत्य करते हैं। बीकानेर की डोलची होली में डोलची भरकर एक दूसरे के ऊपर पानी डालते हैं।

होला मोहल्ला (पंजाब): यह पंजाब में खेली जाने वाली होली है जिसे सिख समुदाय वीरता के प्रतीक के रूप में मनाता है। इसकी शुरुआत गुरु गोविंद सिंह जी ने की थी ताकि सिखों में सैन्य कौशल और वीरता का विकास हो सके। आनंदपुर साहिब में लगने वाले इस मेले में निहंग सिख घुड़सवारी, तलवारबाजी और युद्ध कला का प्रदर्शन करते हैं।

रंगपंचमी (महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश): रंगपंचमी विशेष तौर पर महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश के कुछ हिस्सों में मनाई जाती है। मध्य परदेश के मालवा क्षेत्र में इस दिन बड़े आयोजन होते हैं। इंदौर के राजवाड़ा में निकालने वाली रंगपंचमी ‘गेर’ विश्व प्रसिद्ध है। रंग पंचमी के दिन सड़कों पर पानी की बौछारें की जाती हैं और लोग रंगों में डूब जाते हैं।

बैठकी और खड़ी होली (कुमाऊं, उत्तराखंड): इसे ‘बैगवाल’ या कुमाऊंनी होली के नाम से भी जाना जाता है, जो मुख्य तौर से उत्तराखंड के कुमाऊं में मनाई जाती है। इस होली में संगीत का विशेष महत्व है। यहां होली केवल एक दिन का पर्व नहीं बल्कि महीनों चलने वाला संगीत का उत्सव है। लोग घरों में जमा होकर पहाड़ी होली गीत गाते हैं। साथ ही ग्रामीण पारंपरिक वेशभूषा पहनकर घेरा बनाकर नृत्य करते हुए गीत गाते हैं।

होली रंगों के पर्व के साथ पकवानों और मिठाई का भी त्यौहार है। इस पर्व में हर घर में तरह-तरह की मिठाइयां और पकवान बनाए जाते हैं। आइए जानते हैं इस त्यौहार पर बनाएं जाने वाले कुछ खास पकवानों के बारे में।

गुझिया: गुझिया एक खास पकवान है, जिसके बिना इस त्यौहार का पर्व अधूरा-सा रहता है। यह पकवान भारतवर्ष के लगभग हर घर में बनाया जाता है और लोग होली के रंगों के साथ गुझिया खाना व खिलाना खूब पसंद करते हैं।

दही बड़े: दही बड़े भी इस त्यौहार का एक खास पकवान है जिसके बिना होली अधूरी-सी लगती है। इस त्यौहार पर यह पकवान खास तौर पर ब्रज के घरों में अवश्य बनाया जाता है।

गुलाब जामुन: गुलाब जामुन एक प्रसिद्ध भारतीय मिठाई है, जिसके बिना उत्सव का रंग ही फीका पड़ जाता है इसलिए हर घर में इस त्यौहार के उत्सव में इस मिठाई को जरूर शामिल किया जाता है। घर वाले खुद भी इस मिठाई को बड़े चाव के साथ खाते हैं और होली मिलन के लिए आए मेहमानों को भी गुलाब जामुन जरूर खिलाते हैं। इन मिठाई और पकवानों के अलावा घरों में गाठिये, नमकीन पूड़ियां और मालपुए भी इस त्यौहार का जायका बढ़ाते हैं।

आज के समय में होली मनाते हुए हमें पर्यावरण का भी ध्यान रखना चाहिए। रासायनिक रंगों के स्थान पर प्राकृतिक और हर्बल रंगों का उपयोग करना चाहिए। जल की बचत करें और इस त्यौहार को सात्विक, मर्यादित तथा आनंदमय बनाएं।

होली केवल रंगों का उत्सव नहीं बल्कि आत्मशुद्धि और प्रेम का पर्व है। जीवन में परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, यदि हमारे हृदय में भक्ति और सत्य का प्रकाश है, तो कोई भी होलिका हमें जला नहीं सकती। इस पावन अवसर पर अपने भीतर की दुर्भावनाओं को होलिका में अर्पित करें और प्रेम, क्षमा तथा सद्भाव के रंगों से अपने जीवन को आलोकित करें।

होली केवल रंग खेलने का पर्व नहीं बल्कि जीवन को रंगीन बनाने का संदेश है। यह मन की नीरसता को दूर कर आशा, उत्साह और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती है। होली हमें सिखाती है कि जीवन में प्रेम के रंग सबसे महत्वपूर्ण हैं। आइए, इस होली पर हम केवल शरीर ही नहीं बल्कि अपने मन और विचारों को भी प्रेम, सद्भाव और खुशियों के रंगों से रंगें तथा समाज में भाईचारे और मानवता का संदेश फैलाएं।

(लेखक, हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

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हिन्दुस्थान समाचार / उदय कुमार सिंह