home page

यमुना चौराहे पर: जल सुरक्षा और जनस्वास्थ्य के लिए निर्णायक बजटीय संकल्प

 | 
यमुना चौराहे पर: जल सुरक्षा और जनस्वास्थ्य के लिए निर्णायक बजटीय संकल्प


डॉ. शिव सिंह रावत

यमुना आज इतिहास के एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। कभी जीवन, संस्कृति और समृद्धि की धारा रही यह नदी अब हमारे विकास मॉडल की विडंबनाओं को उजागर कर रही है। तेजी से फैलते शहर, सिकुड़ते बाढ़क्षेत्र और बढ़ता प्रदूषण। जब केंद्र, हरियाणा और दिल्ली की सरकारें अपनी बजटीय प्राथमिकताएं तय कर रही हैं, तब सुशासन की असली कसौटी एक्सप्रेस-वे या गगनचुंबी इमारतें नहीं, बल्कि यह होगी कि क्या करोड़ों नागरिकों के लिए स्वच्छ और पर्याप्त यमुना जल सुनिश्चित किया जा सका। जल सुरक्षा अब केवल पर्यावरणीय विमर्श नहीं, बल्कि जनस्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता का आधार है।

हरियाणा के लिए यमुना जिम्मेदारी और सुधार- दोनों का प्रतीक है। यमुना में प्रवेश करने वाला बड़ा प्रदूषण भार पानीपत, सोनीपत, दिल्ली, फरीदाबाद और गुरुग्राम जैसे औद्योगिक एवं शहरी क्षेत्रों से होकर गुजरता है। अनुपचारित सीवेज, वस्त्र उद्योगों के रासायनिक अपशिष्ट और अनियंत्रित नालों ने नदी की पारिस्थितिकी को गंभीर क्षति पहुंचाई है। अब बजट में केवल बढ़ी हुई राशि नहीं, बल्कि स्पष्ट और मापनीय परिणामों का संकल्प आवश्यक है- शत-प्रतिशत सीवेज शोधन, शून्य अनुपचारित डिस्चार्ज, औद्योगिक अपशिष्ट का रियल-टाइम निगरानी तंत्र, नदी में मिलने से पहले नालों का समयबद्ध अवरोधन, तथा आर्द्रभूमियों और बाढ़क्षेत्रों का पुनर्जीवन।

विशेष रूप से नहर-आधारित क्षेत्रों के लिए चिंता का विषय हैं, जहां सिंचाई ओखला बैराज से छोड़े गए यमुना जल पर निर्भर है। यदि इस जल की गुणवत्ता गिरती है तो इसका सीधा प्रभाव कृषि उत्पादकता, खाद्य शृंखला और ग्रामीण स्वास्थ्य पर पड़ता है। इसलिए यमुना संरक्षण केवल पर्यावरणीय पहल नहीं, बल्कि किसानों की आय, खाद्य सुरक्षा और सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ा प्रश्न है।

दिल्ली की जवाबदेही भी उतनी ही केंद्रीय है। राष्ट्रीय राजधानी अपनी पेयजल आवश्यकताओं के लिए यमुना पर अत्यधिक निर्भर है, किंतु शहर के भीतर नदी का स्वरूप अक्सर अपशिष्ट नाले जैसा प्रतीत होता है। बजट में अनधिकृत कॉलोनियों में विकेन्द्रीकृत सीवेज शोधन संयंत्र, इंटरसेप्टर सीवर परियोजनाओं की शीघ्र पूर्णता, जर्जर जल एवं सीवर पाइपलाइनों का व्यापक प्रतिस्थापन तथा उपचारित जल के अनिवार्य पुनः उपयोग को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए। सार्वजनिक रूप से उपलब्ध रियल-टाइम जल गुणवत्ता डैशबोर्ड पारदर्शिता को सुदृढ़ करेगा और जनविश्वास बहाल करेगा।

भूजल संकट इस परिदृश्य को और जटिल बनाता है। दिल्ली–एनसीआर के कई क्षेत्रों में नाइट्रेट, यूरेनियम और उच्च टीडीएस स्तर चिंताजनक हैं, जो अंधाधुंध दोहन और क्षीण होते जलभृतों का संकेत देते हैं। अत्यधिक कंक्रीटीकरण और अतिक्रमण ने प्राकृतिक रिचार्ज क्षेत्रों को समाप्त कर दिया है, जिसके परिणामस्वरूप मानसून में बाढ़ और ग्रीष्म में जल-अभाव का दुष्चक्र बन गया है। यह संकट केवल जलविज्ञान का नहीं, बल्कि अव्यवस्थित भूमि उपयोग और कमजोर संस्थागत समन्वय का परिणाम है।

अतः बजट को पारंपरिक ‘ग्रे इंफ्रास्ट्रक्चर’ से आगे बढ़कर पुनर्योजी, प्रकृति-आधारित समाधानों की ओर निर्णायक परिवर्तन का संदेश देना चाहिए।

बजट में निम्नलिखित कार्यों के लिए प्रावधान किया जाना चाहिए-

प्रथम, सभी शहरी परिसरों में अनिवार्य वर्षा जल संचयन और प्रेरित भूजल रिचार्ज को सख्ती से लागू किया जाए। पार्कों, स्टेडियमों और सार्वजनिक स्थलों के नीचे भूमिगत बाढ़-जल भंडारण संरचनाएं विकसित कर बाढ़ को भविष्य के जल भंडार में बदला जा सकता है।

द्वितीय, गहरे भूमिगत सीवर सुरंग नेटवर्क विकसित किए जाएं, ताकि अनुपचारित सीवेज सीधे नदियों में न पहुँचे। रिसावग्रस्त पाइपलाइनों का प्रतिस्थापन नियमित रखरखाव नहीं, बल्कि तात्कालिक अवसंरचनात्मक सुधार माना जाए।

तृतीय, तालाबों, आर्द्रभूमियों और नहर प्रणालियों का क्लस्टर-आधारित पुनर्जीवन किया जाए। यमुना बाढ़क्षेत्र और अरावली क्षेत्र में देशी प्रजातियों का बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण, निर्मित आर्द्रभूमियाँ और जैव-उपचार गलियारे—ये सभी टिकाऊ एवं किफायती समाधान सिद्ध हो सकते हैं।

चतुर्थ, प्रकृति-आधारित अपशिष्ट जल शोधन उपाय जो प्राकृतिक प्रक्रियाओं का उपयोग करके कम लागत, टिकाऊ तथा दीर्घकालिक समाधान प्रदान कर सकते हैं।

अंत में तकनीक को जवाबदेही का आधार बनाया जाए। जल गुणवत्ता, भूजल स्तर और बाढ़ जोखिम की रियल-टाइम निगरानी के लिए डिजिटल डैशबोर्ड विकसित किए जाएं। ब्लू-ग्रीन इंफ्रास्ट्रक्चर की अवधारणा—जो हरित क्षेत्रों को जल निकायों से जोड़ती है—बाढ़ जोखिम कम करने, जल गुणवत्ता सुधारने और जैव विविधता बढ़ाने में सहायक होगी।

अंततः, जवाबदेही को संस्थागत स्वरूप देना अनिवार्य है। जल शक्ति अभियान और जल जीवन मिशन जैसे कार्यक्रमों की निधियों को स्पष्ट प्रदर्शन संकेतकों से जोड़ा जाए। विभागों और अधिकारियों की जिम्मेदारी पारदर्शी रूप से निर्धारित हो, ताकि लापरवाही के परिणाम सुनिश्चित हों।

यमुना का पतन अपरिहार्य नहीं है; यह नीतिगत प्राथमिकताओं का परिणाम है। बजट दिशा बदल सकते हैं- यदि वे विज्ञान, दीर्घकालिक स्थिरता और जनहित से संचालित हों। स्वच्छ और पर्याप्त यमुना जल को पारदर्शी वित्तपोषण और समयबद्ध लक्ष्यों के साथ राष्ट्रीय संकल्प बनाया जाना चाहिए।

यदि नदियां अस्वस्थ होंगी, तो शहर भी सुरक्षित नहीं रहेंगे। विकल्प स्पष्ट है- या तो हम संकटों का प्रबंधन करते रहें, या स्थायी सुधार में निवेश करें। यमुना प्रतीक्षा नहीं कर सकती और न ही वे करोड़ों लोग जिनका जीवन उसकी धारा से जुड़ा है।

पानी प्रतीक्षा नहीं करता। यदि सरकार का बजट वास्तव में प्राथमिकताओं का दर्पण हैं, तो यमुना को सर्वोच्च स्थान मिलना ही चाहिए।

(लेखक, हरियाणा सिंचाई एवं जल संसाधन विभाग के पूर्व अधीक्षण अभियंता और वॉक फॉर यमुना अभियान के संयोजक हैं।)

-----------------------

हिन्दुस्थान समाचार / पवन कुमार