हरियाली तीज: शिव-पार्वती के प्रेम, सौभाग्य और सावन की हरियाली का महापर्व
-हरियाली तीज का पर्व 15 अगस्त को मनाया जाएगा उदय कुमार सिंह
सावन का महीना आते ही प्रकृति का रूप बदल जाता है। बारिश की बूंदों से धुली धरती हरियाली की चादर ओढ़ लेती है। पेड़ों की डालियों पर झूले पड़ते हैं, हाथों में मेहंदी सजती है और लोकगीतों की मधुर धुन वातावरण में सावन की उमंग घोल देती है। इसी उल्लास और आस्था के बीच आने वाला हरियाली तीज भारतीय संस्कृति में विशेष स्थान रखता है। यह पर्व केवल व्रत और पूजा तक सीमित नहीं है बल्कि प्रेम, दांपत्य जीवन, नारी सौंदर्य, पारिवारिक सुख-समृद्धि और प्रकृति के नवश्रृंगार का उत्सव भी है।
हरियाली तीज सावन मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाई जाती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इसी दिन भगवान शिव ने माता पार्वती की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर उन्हें अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार किया था। इसलिए यह पर्व शिव-पार्वती के प्रेम, तपस्या और पुनर्मिलन का प्रतीक माना जाता है।
वर्ष 2026 में हरियाली तीज 15 अगस्त, शनिवार को मनाई जाएगी। इस दिन सुहागिन महिलाएं अखंड सौभाग्य, पति की दीर्घायु और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना से व्रत रखती हैं। वहीं, अविवाहित कन्याएं मनचाहे जीवनसाथी की प्राप्ति के लिए शिव-पार्वती की आराधना करती हैं।
सावन की हरियाली से जुड़ा है पर्व का नामहरियाली तीज का नाम ही इस पर्व के प्रकृति से गहरे संबंध को दर्शाता है। सावन में वर्षा के बाद चारों ओर हरियाली दिखाई देती है। खेत, पेड़-पौधे और वनस्पतियां नए जीवन से भर उठती हैं। प्रकृति के इसी हरित रूप को तीज के उत्सव से जोड़ा गया है।
पारंपरिक रूप से इस अवसर पर महिलाएं हरे रंग के वस्त्र पहनती हैं। हाथों में मेहंदी रचाती हैं और हरी चूड़ियां पहनकर सोलह श्रृंगार करती हैं। घर-परिवार और आसपास के इलाकों में झूले लगाए जाते हैं। नई-नवेली दुल्हनें विशेष रूप से मायके आती हैं और अपनी सखियों के साथ झूला झूलते हुए सावन के गीत गाती हैं।
इन गीतों में कभी मायके की याद होती है, कभी पिया के प्रेम का वर्णन और कभी सावन की फुहारों का उल्लास। इस तरह तीज महिलाओं के लिए धार्मिक आस्था के साथ-साथ अपनी भावनाओं और सामाजिक संबंधों को अभिव्यक्त करने का अवसर भी बन जाती है।
शिव-पार्वती के पुनर्मिलन की कथाहरियाली तीज की धार्मिक मान्यताओं का केंद्र माता पार्वती और भगवान शिव हैं। कथा के अनुसार, माता पार्वती भगवान शिव को पति के रूप में प्राप्त करना चाहती थीं। इसके लिए उन्होंने कठोर तपस्या की और लंबे समय तक कठिन साधना में लीन रहीं। मान्यता है कि माता पार्वती के 108वें जन्म में उनकी तपस्या पूरी हुई। सावन मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया के दिन भगवान शिव उनकी तपस्या से प्रसन्न हुए और उन्हें अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार किया।
यही वजह है कि हरियाली तीज को शिव-पार्वती के दिव्य मिलन का पर्व माना जाता है। इस दिन शिव-पार्वती की पूजा और व्रत-कथा का श्रवण करने से दांपत्य जीवन में प्रेम, विश्वास और मधुरता बनी रहने की धार्मिक मान्यता है।
सुहागिन महिलाएं पति की लंबी आयु और अखंड सौभाग्य की कामना करती हैं, जबकि अविवाहित युवतियां भगवान शिव और माता पार्वती से अच्छे जीवनसाथी की प्राप्ति का आशीर्वाद मांगती हैं।
तीज में दिखाई देता है नारी उत्सव का रंगहरियाली तीज को महिलाओं का प्रमुख पर्व भी माना जाता है। इस दिन महिलाएं सजती-संवरती हैं, एक-दूसरे के घर जाती हैं, मेहंदी लगाती हैं और सामूहिक रूप से पूजा करती हैं।
सोलह श्रृंगार का इस पर्व पर विशेष महत्व माना जाता है। सिंदूर, मेहंदी, चूड़ियां, बिंदी, काजल, महावर और आभूषण आदि सुहाग के प्रतीकों के रूप में धारण किए जाते हैं। कई स्थानों पर महिलाएं एक-दूसरे को सुहाग सामग्री भी भेंट करती हैं।
हरे रंग के वस्त्र और चूड़ियां सावन की हरियाली तथा समृद्धि का प्रतीक मानी जाती हैं। मेहंदी को प्रेम और सौभाग्य से जोड़कर देखा जाता है। इस तरह तीज के प्रत्येक रंग और परंपरा में कोई न कोई सांस्कृतिक भाव छिपा हुआ है।
व्रत का स्वरूप और धार्मिक महत्वहरियाली तीज पर कई महिलाएं निर्जला व्रत रखती हैं। कुछ महिलाएं अपनी क्षमता और पारिवारिक परंपरा के अनुसार फलाहार करती हैं। व्रत का स्वरूप अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में अलग हो सकता है।
व्रत रखने वाली महिलाएं सुबह स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करती हैं और पूजा का संकल्प लेती हैं। इसके बाद भगवान शिव, माता पार्वती और उनके परिवार का पूजन किया जाता है। कई स्थानों पर मिट्टी या बालू से शिव-पार्वती की प्रतिमा बनाकर पूजा करने की परंपरा है।
पूजा के दौरान तीज की कथा सुनना, शिव-पार्वती का ध्यान करना और परिवार के सुख-शांति की कामना करना विशेष महत्व रखता है।
हरियाली तीज 2026 में पूजा का शुभ समयहरियाली तीज पर शिव-पार्वती की पूजा सुबह और शाम दोनों समय की जा सकती है। दिए गए विवरण के अनुसार सूर्योदय के बाद सुबह करीब 6 बजे से पूजा शुरू करने की परंपरा बताई गई है, जबकि शाम को सूर्यास्त के बाद प्रदोष काल को पूजा के लिए विशेष माना जाता है।
इस दिन रवि योग, शिव योग और सिद्ध योग जैसे शुभ संयोगों का भी उल्लेख किया गया है। हालांकि, पूजा का सटीक समय स्थान विशेष के सूर्योदय-सूर्यास्त और स्थानीय पंचांग के अनुसार अलग हो सकता है। इसलिए व्रत रखने वाले श्रद्धालुओं के लिए स्थानीय पंचांग के अनुसार मुहूर्त देखना अधिक उपयुक्त रहेगा।
पूजा में किन चीजों की जरूरत होगी?हरियाली तीज की पूजा के लिए पहले से सामग्री तैयार कर लेना बेहतर माना जाता है। पूजा सामग्री में मुख्य रूप से सुहाग सामग्री, शिव-पार्वती के वस्त्र और प्राकृतिक पूजन सामग्री शामिल होती है।
प्रमुख पूजन सामग्रियों में मुख्यतः सिंदूर, मेहंदी, बिंदी और चूड़ियां, काजल, महावर, माता पार्वती के लिए चुनरी, भगवान शिव के लिए वस्त्र, बेलपत्र, धतूरा, शमी पत्र, केले का पत्ता, गीली काली मिट्टी या बालू, पंचामृत, मौसमी फल, घेवर, ठेकुआ या अन्य पारंपरिक मिठाइयां शामिल होती है। हलांकि, पूजन सामग्री क्षेत्रीय परंपरा और परिवार की मान्यताओं के अनुसार अलग हो सकती है।
तीज के झूले और लोकगीत क्यों हैं खास?हरियाली तीज का एक आकर्षक पक्ष झूला उत्सव है। सावन में पेड़ों की मजबूत डालियों पर झूले लगाए जाते हैं। महिलाएं और युवतियां समूह में झूला झूलती हैं और सावन के पारंपरिक गीत गाती हैं। इन लोकगीतों में भारतीय परिवार और रिश्तों की पूरी भावनात्मक दुनिया दिखाई देती है। बेटी को मायके की याद आती है, नवविवाहिता अपने पिया को याद करती है और सखियों के साथ हंसी-मजाक का माहौल बनता है। इस लिहाज से तीज केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि लोक संस्कृति को जीवित रखने वाला पर्व भी है। पीढ़ी-दर-पीढ़ी चले आ रहे गीत, रीति-रिवाज और पारंपरिक पकवान इस त्योहार को और समृद्ध बनाते हैं।
देशभर में अलग-अलग रंगों में मनाई जाती है तीज
हरियाली तीज मुख्य रूप से उत्तर भारत में विशेष उत्साह के साथ मनाई जाती है। राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, हरियाणा और दिल्ली सहित कई क्षेत्रों में इसके अलग-अलग रूप देखने को मिलते हैं। कहीं मंदिरों में विशेष पूजा होती है, कहीं महिलाओं के लिए सामूहिक आयोजन किए जाते हैं। कई जगह झूला उत्सव और तीज गीतों की परंपरा आज भी कायम है। शहरी क्षेत्रों में भी महिलाएं घरों और सामुदायिक स्थलों पर तीज मिलन समारोह आयोजित करती हैं। इस तरह बदलते समय के साथ पर्व मनाने का तरीका भले बदला हो, लेकिन इसकी मूल भावना प्रेम, सौभाग्य, आस्था और पारिवारिक मंगलकामना आज भी कायम है।
शिव आराधना और सावन का आध्यात्मिक महत्व
सावन को भगवान शिव की आराधना के लिए विशेष महीना माना जाता है। हरियाली तीज इसी सावन में पड़ती है, इसलिए शिव-पार्वती की पूजा का महत्व और बढ़ जाता है। वास्तव में हरियाली तीज को आमतौर पर पति की लंबी आयु और अखंड सौभाग्य से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन इसके सांस्कृतिक संदेश का दायरा इससे कहीं बड़ा है। यह पर्व प्रेम, विश्वास, त्याग, धैर्य और समर्पण की भावना को मजबूत करने का अवसर देता है।
माता पार्वती की तपस्या संकल्प और धैर्य का प्रतीक है, जबकि शिव-पार्वती का संबंध दांपत्य जीवन में विश्वास और सम्मान की भावना को दर्शाता है। यही कारण है कि तीज की कथा आज भी पारिवारिक और सामाजिक जीवन में अपनी प्रासंगिकता बनाए हुए है। यह पर्व महिलाओं को अपनी परंपराओं से जोड़ने के साथ-साथ मायके और ससुराल के रिश्तों को भी मजबूत करता है। विवाहित महिलाओं के लिए यह अपने मायके से जुड़ने और बचपन की स्मृतियों को फिर से जीने का अवसर बनता है।
इस बार स्वतंत्रता दिवस के साथ तीज का संयोगवर्ष 2026 की हरियाली तीज इसलिए भी खास है क्योंकि यह 15 अगस्त, स्वतंत्रता दिवस के दिन मनाई जाएगी। एक ओर देश स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर राष्ट्रभक्ति और स्वतंत्रता का उत्सव मनाएगा, वहीं दूसरी ओर घर-परिवारों में सावन की हरियाली, शिव-पार्वती की आराधना और तीज की उमंग दिखाई देगी। सावन की फुहारों, हरे परिधानों, मेहंदी, झूलों और तीज गीतों के बीच मनाया जाने वाला यह पर्व धार्मिक और सांस्कृतिक दोनों दृष्टियों से विशेष वातावरण बनाएगा।
प्रकृति, प्रेम और आस्था का संगम है हरियाली तीजहरियाली तीज को यदि तीन शब्दों में समझना हो तो वे हैं प्रकृति, प्रेम और आस्था। प्रकृति सावन की हरियाली में दिखाई देती है। प्रेम शिव-पार्वती के संबंध में दिखाई देता है और आस्था महिलाओं के व्रत, पूजा और प्रार्थना में दिखाई देती है। झूलों की पींग, मेहंदी से सजे हाथ, हरे परिधानों की छटा, लोकगीतों की मिठास और शिव-पार्वती की आराधना इस पर्व को भारतीय संस्कृति का बेहद सुंदर उत्सव बनाते हैं।
हरियाली तीज का मूल संदेश यही है कि जीवन में प्रेम और विश्वास बना रहे, रिश्तों में सम्मान और समर्पण कायम रहे तथा प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता बनी रहे। इस बार 15 अगस्त को जब देश स्वतंत्रता दिवस मनाएगा, उसी दिन सावन की हरियाली के बीच तीज की पींग भी उठेगी। मंदिरों में शिव-पार्वती की आराधना होगी, हाथों में मेहंदी सजेगी और लोकगीतों के साथ भारतीय परंपरा का वह रंग फिर जीवंत होगा, जिसमें प्रेम भी है, तपस्या भी और परिवार के सुखी भविष्य की कामना भी।(लेखक, हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / उदय कुमार सिंह

