‘हैप्पीनेस इंडेक्स’ के नाम पर भारत से छल! युद्धरत देश भी हैं भारत से आगे
-डॉ. मयंक चतुर्वेदी
वैश्विक स्तर पर किसी देश की प्रगति को लंबे समय तक उसकी आर्थिक ताकत, विशेषकर सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) से मापा जाता रहा है, किंतु बदलती वैश्विक सोच ने तथ्यों एवं आंकड़ों से समझाया कि आर्थिक वृद्धि ही मानव जीवन की गुणवत्ता और संतुष्टि का पूर्ण मापदंड नहीं हो सकती। इसी दृष्टिकोण से “विश्व खुशी रिपोर्ट” का जन्म हुआ, जिसका उद्देश्य नागरिकों के जीवन-संतोष को मापना है। इस साल की रिपोर्ट हाल ही में प्रकाशित हुई है, जिसमें भारत के साथ छल किया जाना स्पष्ट दिखाई देता है। भारत को 116वां स्थान दिया गया है, जबकि वह तीव्र आर्थिक प्रगति के दौर से गुजर रहा है।
यहां हम देखते हैं कि “विश्व खुशी रिपोर्ट” भारत की रैंकिंग पिछले कुछ वर्षों में सीमित सुधार ही दर्शाती है, उदाहरण स्वरूप : 2021 में 139, 2022 में 136, 2023 और 2024 में 126 और अब 2026 में 116वां स्थान। अब इस संख्या को गहराई से देखें तो यह आंकड़ा का सुधार भारत के संदर्भ में बहुत ही सतही प्रतीत होता है, क्योंकि देश की आर्थिक और सामाजिक उपलब्धियों के अनुपात में यह प्रगति अत्यंत धीमी है। इससे यह स्पष्ट होता है कि खुशी सूचकांक और वास्तविक विकास के बीच एक गहरी खाई मौजूद है, जिसे कि “विश्व खुशी रिपोर्ट” में नहीं बताया गया है। यहीं से इस रिपोर्ट की विश्वसनीयता पर संदेह पैदा होता है और भारत के प्रति इस रिपोर्ट को बनानेवालों की दुराग्रह भावना समझ आती है।
भारत की आर्थिक प्रगति
आज विश्व भी इन आंकड़ों को भारत के संदर्भ में नजरअंदाज नहीं कर सकता कि वर्ष 2015 में 2.1 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था 2025 तक बढ़कर 4.3 ट्रिलियन डॉलर हो गई, जो लगभग 105 प्रतिशत की वृद्धि को दर्शाती है। इस तेज़ी से भारत विश्व की पाँचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है। इसका प्रभाव व्यापक सामाजिक बदलावों के रूप में भी सामने आया है।
भारत में अत्यधिक गरीबी में उल्लेखनीय गिरावट आई है। 2011-12 में 27.1 प्रतिशत रही गरीबी दर 2022-23 में घटकर लगभग 5.3 प्रतिशत रह गई। अनुमानतः 269 मिलियन लोग गरीबी से बाहर निकले हैं। विभिन्न सरकारी योजनाओं, जिसमें कि प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण और आवास योजनाओं ने सामाजिक सुरक्षा को मजबूत किया है। इससे यह स्पष्ट होता है कि विकास का लाभ समाज के निचले तबकों तक पहुंचा है।
आर्थिक विकास के साथ-साथ आय असमानता में भी गिरावट दर्ज की गई है। शहरी गिनी गुणांक 36.7 से घटकर 31.9 और ग्रामीण गिनी गुणांक 28.7 से घटकर लगभग 27.0 हो गया है। वस्तुत: यह प्रवृत्ति दर्शाती है कि विकास अपेक्षाकृत संतुलित रहा है। ऐसे में यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि जीवन संतोष में भी वृद्धि होनी चाहिए, किंतु “खुशी सूचकांक” इस वास्तविकता को पर्याप्त रूप से नहीं दर्शाता।
चौंकाने वाला विरोधाभास: संघर्षग्रस्त देशों से पीछे भारत
देखा जाए तो इस “हैप्पीनेस इंडेक्स” का सबसे विवादास्पद पहलू यह है कि भारत कई ऐसे देशों से पीछे है जो गंभीर संकटों से जूझ रहे हैं। इज़राइल (8), ईरान (99), इराक (101), फिलिस्तीन (108), पाकिस्तान (109) और यूक्रेन (111) जैसे देश भारत से खुशी के मामले में ऊपर हैं! यही वो तथ्य हैं, जो इस रिपोर्ट के विश्वसनीय होने का संदेह पैदा करते हैं। यह कैसे संभव है कि जिन देशों में युद्ध, राजनीतिक अस्थिरता और आर्थिक संकट व्यापक स्तर पर मौजूद हैं, वे खुशी के मामले में भारत से ऊपर हो जाएं ? वास्तविकता में तो यह असंभव है।
इस संबंध में विभिन्न अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के आर्थिक आंकड़े भी देखे जा सकते हैं, जो बताते हैं कि फिलिस्तीन में 80 प्रतिशत बेरोजगारी है। 238 प्रतिशत मुद्रास्फीति और अकाल जैसी स्थिति है। यानी जहां लाखों लोग गंभीर संकट में हैं। यूक्रेन युद्ध के कारण लोग जहां व्यापक जनहानि, विस्थापन और मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का सामना कर रही है, वहां इन परिस्थितियों के बावजूद देशों की रैंकिंग भारत से बेहतर! ये कैसे संभव है?
पाकिस्तान और ईरान: अस्थिरता के बावजूद भारत से ऊपर
यह भी आश्चर्यचकित कर देनेवाला तथ्य है कि पाकिस्तान में आर्थिक अस्थिरता, बढ़ते आतंकी हमले और उच्च अपराध दर जैसी गंभीर समस्याएं मौजूद हैं। ईरान में सामाजिक दमन, महिलाओं पर प्रतिबंध और राजनीतिक अशांति बनी हुई है। इस वक्त अमेरिका, इजराइल और ईरान युद्ध से पूरा विश्व परेशान है, किंतु इसके बावजूद इन देशों को “हैप्पीनेस इंडेक्स” में भारत से ऊपर दर्शाया, आज वास्वत में यही बताता है कि इस सूचकांक में शामिल कारक वास्तविक जीवन की कठिनाइयों को पूरी तरह प्रतिबिंबित नहीं करते।
इस तरह देखें तो इस “हैप्पीनेस इंडेक्स” की सबसे बड़ी कमी यह है कि इसमें अपराध, आतंकवाद, सामाजिक अशांति और सार्वजनिक सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण पहलुओं को शामिल नहीं किया गया है, जबकि ये कारक किसी भी व्यक्ति के जीवन की गुणवत्ता को सीधे प्रभावित करते हैं। यदि कोई समाज सुरक्षित और स्थिर है, तभी वह अपने आप में खुशी का एक महत्वपूर्ण आधार होता है, जिसे यहां इस रिपोर्ट में पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया गया है। इसके साथ ही इस “हैप्पीनेस इंडेक्स” की विश्वसनीयता इसलिए भी संकट में है, क्योंकि इसमें जिस गैलप सर्वेक्षण के अंतर्गत प्रत्येक देश से औसतन 1000 लोगों का नमूना लिया है, उसमें भारत जैसे विशाल देश के लिए ये सर्वेक्षण फिट नहीं बैठता, क्योंकि भारत जैसे देश में क्षेत्रीय, सामाजिक और आर्थिक विविधताएं अत्यधिक हैं, जिन्हें इतने छोटे नमूने में समाहित करना कठिन ही नहीं पूर्णत: असंभव है।
कुल मिलाकर कहना यही है कि जब तक खुशी के मापन में वास्तविक जीवन के सभी महत्वपूर्ण आयामों को शामिल नहीं किया जाएगा, तब तक यह सूचकांक पूर्ण सत्य का प्रतिनिधित्व नहीं करेगा। भारत का उदाहरण इस बात का प्रमाण है कि आर्थिक प्रगति और वास्तविक जीवन की संतुष्टि के बीच संबंध को समझने के लिए अधिक गहन और संतुलित दृष्टिकोण की आवश्यकता है, जिसका कि फिलहाल इस सर्वेक्षण “हैप्पीनेस इंडेक्स” में पूरी तरह से अभाव दिखाई देता है। इसलिए भारतवासियों इस “हैप्पीनेस इंडेक्स” को देखकर अपने देश की खुशी का अनुमान मत लगा लेना, भारत कल भी पाकिस्तान, फिलिस्तीन, यु्क्रेन समेत तमाम देशों से प्रसन्नता में आगे था और आज भी है। वास्तविकता में ये रिपोर्ट भारत के लोगों के साथ एक छलावा ही है, इससे अधिक अन्य कुछ नहीं!
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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी

