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हल्दीघाटी विजय के 450 वर्ष : राष्ट्रधर्म रक्षणार्थ सर्वस्व अर्पण करने वाले मेवाड़ी शौर्य को नमन

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हल्दीघाटी विजय के 450 वर्ष : राष्ट्रधर्म रक्षणार्थ सर्वस्व अर्पण करने वाले मेवाड़ी शौर्य को नमन


- कौशल मूंदड़ा

18 जून 1576 को खमणोर-हल्दीघाटी की धरती पर लड़ा गया युद्ध केवल दो सेनाओं का संघर्ष नहीं था बल्कि स्वाधीनता, स्वाभिमान, धर्म और मातृभूमि की रक्षा के लिए लड़ी गई एक युगांतकारी लड़ाई थी। वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप के नेतृत्व में मेवाड़ के गुहिलोत-सिसोदिया के अलावा झाला, चौहान, राठौड़, सोलंकी, पंवार आदि क्षत्रियों के साथ भीलों, ब्राह्मणों, कायस्थों तथा विभिन्न छत्तीस समाजों के रणबांकुरों ने अद्वितीय साहस, त्याग और राष्ट्रनिष्ठा का परिचय दिया। इसलिए मेवाड़ के गुहिलोतों को कवि नाथूसिंह महियारिया ने गरूड़वन्ता गहलौतिया कह कर सम्बोधित किया। झाला बीदा के आत्म बलिदान से लेकर राजा रामशाह तंवर और उनके पुत्रों की वीरगति, हकीम खां सूर की निष्ठा, भामाशाह-ताराचंद के समर्पण, हाथी रामप्रसाद की स्वामी भक्ति तथा चेतक के अतुलनीय त्याग तक, यह युद्ध असंख्य अमर गाथाओं से आलोकित है। वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप की हल्दीघाटी विजय के 450वें वर्ष पर उन सभी ज्ञात-अज्ञात वीरों को स्मरण करना मेवाड़ ही नहीं, सम्पूर्ण राष्ट्र का कर्तव्य है, जिन्होंने अपने रक्त से स्वाधीनता और अस्मिता के इस गौरवशाली अध्याय को अमर बना दिया।

महाराणा प्रताप की सेना में ग्वालियर के राजा रामशाह तंवर अपने पुत्रों- शालिवाहन, भवानी सिंह तथा प्रताप सिंह और पौत्र बलभद्र साहि, भामाशाह और उसका भाई ताराचन्द कावड़िया, राजराणा झाला बीदा बिच्छीवाड़ा, झाला मानसिंह देलवाड़ा, सोनगरा मानसिंह अखयराजोत, डोडिया भीमसिंह सरदारगढ़, रावत किसनदास चूण्डावत सलूम्बर, रावत नेतसिंह सारंगदेवोत बम्बोरा, रावत सांगा चूण्डावत देवगढ़, राठौड़ रामदास मेड़तिया बदनोर, पानरवा का रावत पूंजा, पुरोहित गोपीनाथ, पुरोहित जगन्नाथ, पड़िहार कल्याण, बच्छावत महता जयमल, खेतावत महता रत्नचन्द, महासानी जगन्नाथ, राठौड़ शंकरदास, मेरपुर का रावत पूँजा (जूड़ा नाहेसर परगने के मेरपुर के भीलों का मुखिया), चारण जेसा और केशव आदि वीर सेनानायक थे। वहीं, चंदावल में महाराज कुमार अमर सिंह, मेवाड़ का भाणेज तथा रामशाह तंवर का पौत्र बलभद्र भी उपस्थित थे। इनके अतिरिक्त हकीम खां सूर भी मुगलों से लड़ने के लिए महाराणा की सेना में सम्मिलित हुआ।

उदयपुर से हल्दीघाटी मार्ग पर पहले आने वाले लोसिंग गांव से आगे बढ़कर सेनाएं मान सिंह की गतिविधियों पर नजर गढ़ाए हुए थीं, मान सिंह की सेना के तीन कोस की दूरी पर महाराणा प्रताप ने अपना सैन्य शिविर लगाया और शत्रु की प्रत्येक गतिविधि पर नजर बनाए रखी।

जब अकबर ने आम्बेर के मान सिंह के नेतृत्व में दस हजार घुड़सवार और पांच हजार पैदल सैनिकों को मेवाड़ पर भेजा, तो उसने जून, 1576 ई. के तीसरे सप्ताह में मोलेला ग्राम (नाथद्वारा-हल्दीघाटी मार्ग) के पास पहुंच कर बनास नदी के उत्तरी किनारे पर मुगल सैन्य शिविर स्थापित करते हुए युद्ध की तैयारी शुरू कर दी।

झाला बीदा और उनका पराक्रम-17 जून, 1576 ईस्वी को मध्याह्न के बाद मान सिंह लगभग एक हजार सैनिकों के साथ अगले दिन युद्ध की व्यूह रचना के लिए क्षेत्र का सर्वेक्षण करने हल्दीघाटी की पहाड़ियों में आखेट के बहाने निकला। संयोग से उस समय महाराणा प्रताप, झाला बीदा और हकीम खां सूर भी, अगले दिन के युद्ध की व्यूह रचना के लिए उन्हीं पहाड़ियों में मौजूद थे। मान सिंह और उनके सैनिकों को उनका आभास नहीं हुआ, लेकिन ये लोग महाराणा प्रताप, झाला बीदा और हकीम खां सूर के घेरे में आ गए थे।

इस स्वतःस्फूर्त सुअवसर को भांप कर हकीम खां सूर ने महाराणा प्रताप से कहा कि परिस्थितियां अनुकूल हैं, हमें घात कर आमेर के मान सिंह का इसी समय काम तमाम कर देना चाहिए। इस पर महाराणा प्रताप कुछ बोले, उसके पहले ही सहज भाव से झाला बीदा ने यह कहा कि हकीम खां, आप सही कह रहे हैं। युद्ध नीति के अनुसार यह अवसर अनुकूल है, किन्तु हम क्षत्रिय हैं और क्षत्रिय कभी भी अपने दुश्मन पर छल से या पीछे से घात नहीं करता है। परिणाम जो भी होगा, कल युद्ध क्षेत्र में ही देखा जाएगा। महाराणा प्रताप ने झाला बीदा के कहने पर इस बात को स्वीकार कर लिया। इस प्रकार संयोग से अनजाने में ही सही झाला बीदा द्वारा रोकने के कारण आमेर के मान सिंह को नया जीवन मिल गया।

तैं सिर छत्र पुल घड़ी, रखियौ झाला राज।छत्र छांया अमर करी, हिंदू धर्म पर आज।।

कवि नाथू सिंह महियारिया लिखते हैं कि हे झाला राजा/सरदार, तुमने अपने सिर पर मेवाड़ का राज छत्र धारण कर एक पुलिया बनाई अर्थात संकट के समय राज्य की रक्षा का भार अपने ऊपर लिया। तुम्हारी इस बलिदानी और गौरवपूर्ण छत्र-छाया ने आज हिंदू धर्म को अमर कर दिया।

झाला बीदा ने 18 जून, 1576 ईस्वी को हल्दीघाटी के समरांङ्गण में महाराणा प्रताप को मुगल सेना द्वारा चारों तरफ से घेर लिये जाने के बाद प्रताप के जीवन की रक्षा के निमित्त, स्वयं के जीवन को खतरे में डालते हुए, महाराणा प्रताप को युद्ध क्षेत्र से बाहर निकलने के लिए बाध्य किया। उसके बाद झाला बीदा ने समरांङ्गण में युद्ध करते हुए अपने प्राण न्योछावर कर दिए।

तंवरों की दो पीढ़ियों का बलिदान—राजा मान सिंह तंवर के पौत्र राम सिंह (रामशाह) तंवर ग्वालियर के अंतिम राजपूत राजा थे। अकबर के ग्वालियर पर आक्रमण में रामशाह को पराजय देखनी पड़ी और उन्हें ग्वालियर छोड़ना पड़ा। इससे पूर्व महाराणा सांगा के काल में तंवर मेवाड़ के ध्वज तले उपस्थित थे। अकबर से हार कर तंवरों ने मेवाड़ में शरण ली। रामशाह तंवर की वीरता के कारण उदय सिंह ने उन्हें शाहों का शाह की उपाधि दी और अपनी एक बेटी का विवाह रामशाह के पुत्र शालिवाहन सिंह तंवर से किया।

हल्दीघाटी की लड़ाई में रामशाह के खिलाफ लड़ने वाले मुगल इतिहासकार अब्द अल-कादिर बदायूंनी ने अपनी पुस्तक मुन्तखाब-उत-तवारीख में उनकी प्रशंसा की है। उन्होंने लिखा है, मैंने देखा कि योद्धा दाहिनी ओर हाथियों के युद्ध को छोड़कर मुगल सेना के मुख्य भाग तक पहुंच गया और वहां भयंकर नरसंहार किया। ग्वालियर के प्रसिद्ध राजा मान सिंह के पोते रामशाह, जो हमेशा राणा के हरावल (अग्र पंक्ति) में रहते थे, ने ऐसा शौर्य दिखाया जो शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता। उनके शक्तिशाली हमले के कारण हरावल के बाईं ओर मानसिंह कछवाहा को भागकर दाहिनी ओर के सैयदों की शरण लेनी पड़ी, जिसके कारण आसफ खान भी भाग गया। यदि उस समय सैयद लोग न बचते, तो हरावल (अग्र पंक्ति) की भागती हुई सेना ऐसी स्थिति पैदा कर देती कि हमें शर्मनाक हार का सामना करना पड़ता।

वहीं, अकबर के दरबारी लेखक अबुल फ़ज़ल जिन्होंने अकबरनामा लिखा था, ने लिखा था, ये दोनों रामशाह और शालिवाहन युद्ध के मित्र और जीवन के शत्रु थे, जिन्होंने जीवन को सस्ता और सम्मान को महंगा बना दिया था। वीरतापूर्वक लड़ते हुए रामशाह तीन पुत्र शालिवाहन सिंह, भवानी सिंह, प्रताप सिंह और उनके 300 तंवर अनुयायी शहीद हो गए। उनकी वीरता और भक्ति के कारण, महाराणा करण सिंह (महाराणा प्रताप के पोते) ने रक्त तलाई में रामशाह तोमर और शालिवाहन सिंह तोमर के लिए दो छतरियां (स्मारक) बनवाईं।

हकीम खां सूर, भामाशाह और ताराचंद-इस समय तक महाराणा प्रताप को सात घाव लग चुके थे। ऐसी स्थिति में झाला बीदा (मान सिंह) ने पूर्व नियोजित योजना के अनुसार महाराणा प्रताप को मुगलों के साथ भावी युद्ध संघर्ष जारी रखने के लिए युद्ध क्षेत्र से बाहर निकलने का आग्रह किया। महाराणा प्रताप के मना करने पर झाला बीदा ने हकीम खां सूर को कहा कि चेतक की वाग (लगाम) पकड़ कर चेतक का मुंह मोड़ो। इसके साथ ही भामाशाह और ताराचन्द को कहा कि आप अपनी सैन्य टुकड़ी के साथ महाराणा प्रताप की रक्षा के लिए पीछे से सुरक्षा प्रदान कर महाराणा को युद्ध क्षेत्र से बाहर निकालो। इसके पूर्व अवसर देखकर झाला बीदा ने प्रताप के छत्र व मेवाड़ के अन्य राजचिह्न धारण कर लिए जिससे मुगल सेना का ध्यान आसानी से भटकाया जा सके। महाराणा प्रताप को भामाशाह और ताराचंद कावड़िया की सैनिक टुकड़ी के सहयोग से सुरक्षित युद्ध क्षेत्र से बाहर निकाल दिया गया। इस घटना का वर्णन अब्दुल कादिर बदायूंनी ने मुन्तखाब-उत-तवारीख में किया है।

यहां पर तीसरे चरण का युद्ध आरम्भ होता है और मुगल सेना की मदद के लिए मिहतर खां भागी हुई सेना और सुरक्षित सेना को लेकर आता है और अन्तिम चरण का भीषण युद्ध आरम्भ होता है। इसमें झाला बीदा (मानसिंह) और हकीम खां सूर वीरगति को प्राप्त होते हैं। अन्तिम चरण दोपहर के पश्चात् समाप्त हो जाता है। मुगल सेना युद्ध के दौरान तीनों चरणों में पीछे हटती रही और बनास के किनारे पर हुए युद्ध संघर्ष के दौरान तेजी से बारिश होने से पूरे मैदान में पानी भर गया और यह रक्त मिल जाने से रक्तवर्णी हो उठा। यहीं से इस स्थान का नाम रक्त तलाई हो जाता है।

वीर हाथी रामप्रसाद-दोनों सेनाओं के मस्त हाथी अपनी-अपनी फौज में से निकल कर एक दूसरे से खूब लड़े और हाथियों का दरोगा हुसैन खां, जो मानसिंह के पीछे वाले हाथी पर सवार था, हाथियों की लड़ाई में शामिल हो गया। उनमें से अकबर का एक खास हाथी महाराणा के रामप्रसाद नामक हाथी से खूब लड़ता रहा, जब वह पराजित हो गया तो मुगल फौजदार कमाल खां ने गजमुक्ता हाथी को सामने किया। बादशाही हाथी घायल हो गया। रामप्रसाद हाथी ने कई मुगल सैनिकों को मार गिराया। अब राम प्रसाद से लड़ने के लिए मुगलों की ओर से गजराज हाथी को आगे किया गया, किंतु गजराज भी हाथी रामप्रसाद से मुकाबला न कर सका। अब राम प्रसाद का सामना करने के लिए मुगल महावत पंजू राममदार को लेकर आया। दोनों हाथियों के बीच भीषण संघर्ष हुआ। राममदार हाथी भी पीछे हटने लगा, किंतु दुर्भाग्य से युद्ध में अपने पराक्रम से दुश्मनों के दांत खट्टे करने वाले रामप्रसाद हाथी के महावत को गोली लग गई और स्थिति पूर्णतः बदल गई। अवसर देखकर शाही हाथियों के प्रबन्धक हुसैन खां ने महावत के मरते ही उसका स्थान लेकर रामप्रसाद को अपने नियन्त्रण में कर लिया। इसके बाद बदायूंनी कुछ सैनिकों के साथ हाथी रामप्रसाद को लेकर अजमेर की ओर रवाना हो गया।

बदायूंनी मुन्तखाब-उत-तवारीख में लिखता है, जब वह और मुगल सैनिक रामप्रसाद के साथ अजमेर की ओर बढ़ रहे थे तो मेवाड़ के बाशिन्दे उन पर मिट्टी के ढेले फेंककर उन्हें अपमानित कर रहे थे। रामप्रसाद मुगलों के अधिकार में अजमेर पहुंचा जहां अकबर ने उसका नाम पीर प्रसाद रख दिया, लेकिन यह हाथी अपने स्वामी का इतना वफादार था कि 18 दिन भूखे रहकर प्राण त्याग दिये लेकिन मुगल शिविर का एक तिनका नहीं खाया।

वीरों का वीर चेतकमानसिंह पर आक्रमण करते समय चेतक का एक पांव मानसिंह के हाथी की सूण्ड में लगी तलवार से कट चुका था। इसके बावजूद घायल चेतक ने महाराणा प्रताप के एक विश्वस्त साथी के समान तब तक साथ नहीं छोड़ा जब तक कि उसने अपने स्वामी को सुरक्षित स्थान तक नहीं पहुंचा दिया। हल्दीघाटी से लगभग दो मील दूर वलीचा गांव के निकट 20-25 फीट चौड़े एक बहते बरसाती नाले को एक ही छलांग में पार कर खोड़ी आमली के निकट घायल चेतक ने भी अपने प्राण त्याग दिए। आज भी स्वामीभक्त चेतक की स्मृति, वहां बनी समाधि के रूप में चिरस्थायी है।

संख्या नहीं संकल्प से बनता है इतिहास खमणोर-हल्दीघाटी के इस महासमर में महाराणा प्रताप के नेतृत्व में लड़े मेवाड़ के वीरों ने सिद्ध कर दिया कि संख्या नहीं बल्कि संकल्प इतिहास का निर्माण करता है। विभिन्न ऐतिहासिक स्रोतों के अनुसार लगभग साढ़े तीन हजार मेवाड़ी सैनिकों में से सैकड़ों रणबांकुरों ने मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। इनमें अनेक वीरों के नाम इतिहास के पन्नों में अंकित हैं, जबकि अनेक गुमनाम रहकर भी अमर हो गए। विभिन्न स्रोतों के आधार पर करीब 3500 मेवाड़ी सैनिकों में से 350 मात्र चार घण्टे में रणचण्डी की बलिवेदी पर अपना शीश चढ़ा कर अमर हो गए। इनमें से करीब 200 की सूची नाम के साथ इतिहास में उपलब्ध होती है। हल्दीघाटी विजय के 450वें वर्ष पर मेवाड़ उन सभी ज्ञात-अज्ञात हुतात्माओं को श्रद्धापूर्वक नमन करता है, जिनके बलिदान ने स्वाभिमान, स्वतंत्रता और राष्ट्रधर्म की ज्योति को सदियों तक प्रज्वलित रखा।

माई एहड़ा पूत जण, जेहड़ा राण प्रताप। अकबर सूतो ओझकै, जाण सिराणै सांप॥

(लेखक, इतिहास व पुरातत्व शोधार्थी हैं।)——————

हिन्दुस्थान समाचार / सुनीता