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(गुरु पूर्णिमा विशेष) गुरु के प्रति कृतज्ञता का दिवस है गुरुपूर्णिमा

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(गुरु पूर्णिमा विशेष) गुरु के प्रति कृतज्ञता का दिवस है गुरुपूर्णिमा


ब्रह्मानन्दं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्तिं, द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं तत्त्वमस्यादिलक्ष्यम् ।

एकं नित्यं विमलमचलं सर्वधीसाक्षिभूतं, भावातीतं त्रिगुणरहितं सद्गुरुं तं नमामि ॥

आषाढ शुक्ल पूर्णिमा का यह पुण्य दिवस भारतीय सनातन वैदिक परम्परा में गुरु-तत्त्व की उपासना का महापर्व है। यह केवल किसी महापुरुष के जन्म अथवा स्मृति का उत्सव नहीं, अपितु उस अनादि ज्ञान-परम्परा के प्रति कृतज्ञता का दिवस है जिसके माध्यम से श्रुति का अमृत, आत्मविद्या का प्रकाश तथा मोक्षमार्ग का यथार्थ स्वरूप युग-युगान्तर से गुरु से शिष्य तक अविच्छिन्न रूप से प्रवाहित होता आया है। इसी कारण यह दिवस 'गुरुपूर्णिमा' के साथ-साथ 'व्यासपूर्णिमा' के नाम से भी विख्यात है।

भारतीय दर्शन का मूलाधार यह है कि मनुष्य का वास्तविक स्वरूप नश्वर शरीर, चंचल मन अथवा सीमित बुद्धि नहीं, अपितु नित्य, शुद्ध, बुद्ध और मुक्त आत्मा है। किन्तु अनादिकाल से अविद्या के कारण जीव अपने इसी स्वरूप को विस्मृत कर संसार के सुख-दुःख, राग-द्वेष तथा जन्म-मृत्यु के चक्र में आबद्ध रहता है। वेदान्त का समस्त प्रयोजन इसी अविद्या का निवारण है। यही कारण है कि उपनिषद् उद्घोष करते हैं- तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत्। आत्मतत्त्व का ज्ञान गुरु के बिना सम्भव नहीं।

गुरु का कार्य शिष्य को कोई नया सत्य प्रदान करना नहीं है। सत्य तो नित्यसिद्ध है। गुरु केवल शिष्य के अन्तःकरण पर पड़े अज्ञान के आवरण को शास्त्रप्रमाण और युक्तिसम्मत उपदेश द्वारा दूर करता है। जब अविद्या निवृत्त होती है, तब वही जीव अपने ब्रह्मस्वरूप का अनुभव करता है। इसलिए वेदान्त में गुरु को परब्रह्म का प्रतिनिधि तथा ब्रह्मविद्या का साक्षात् प्रकाशस्वरूप कहा गया है।

भगवान् श्रीनारायण से प्रवाहित यह ज्ञानधारा ब्रह्मा, महर्षि वसिष्ठ, शक्ति, पराशर, भगवान् वेदव्यास, श्रीगौडपादाचार्य, श्रीगोविन्दभगवत्पादाचार्य तथा आदि जगद्गुरु भगवान् श्रीशङ्करभगवत्पादाचार्य के माध्यम से अखण्ड रूप से प्रवाहित होती रही है। इसी अविच्छिन्न गुरु-परम्परा ने वेदों के यथार्थ अभिप्राय को सुरक्षित रखा और ब्रह्मविद्या को जीवित परम्परा के रूप में संसार के समक्ष प्रतिष्ठित किया।

भगवान् वेदव्यास का भारतीय अध्यात्म में स्थान अद्वितीय है। उन्होंने वेदों का विभाजन कर उन्हें व्यवस्थित रूप प्रदान किया, ब्रह्मसूत्र के माध्यम से उपनिषदों के सिद्धांतों का सूत्रीकरण किया तथा महाभारत और पुराणों द्वारा धर्म को लोकजीवन के साथ जोड़ा। इसीलिए व्यास केवल एक महर्षि नहीं, अपितु सम्पूर्ण वैदिक ज्ञानपरम्परा के मूर्त स्वरूप माने जाते हैं।

कालान्तर में जब वेदान्त का यथार्थ स्वरूप विविध मत-मतान्तरों से आच्छादित होने लगा, तब भगवान् सदाशिव के अवतार आदि जगद्गुरु भगवान् श्रीशङ्करभगवत्पादाचार्य ने ब्रह्मसूत्र, श्रीमद्भगवद्गीता तथा प्रमुख उपनिषदों पर अपने अद्वितीय भाष्यों द्वारा अद्वैत वेदान्त की पुनः प्रतिष्ठा की। उन्होंने यह प्रतिपादित किया कि मोक्ष किसी कर्मविशेष का फल नहीं, प्रत्युत आत्मस्वरूप के ज्ञान से प्राप्त होने वाली अविद्यानिवृत्ति है। भारत की चारों दिशाओं में आम्नाय पीठों की स्थापना कर उन्होंने गुरु-शिष्य-परम्परा को सुदृढ़ आधार प्रदान किया और धर्म, दर्शन तथा संस्कृति की अखण्ड ज्योति को युग-युगान्तर तक प्रकाशित रखने की व्यवस्था की। इसी सत्य का स्मरण कराते हुए परम्परा में श्रद्धापूर्वक कहा गया है— व्यासो नारायणः साक्षात्। शङ्करः शङ्करः स्वयम्॥

गुरुपूर्णिमा का वास्तविक सन्देश केवल गुरु का पूजन करना नहीं, अपितु गुरु के उपदेश को अपने जीवन में प्रतिष्ठित करना है। श्रद्धा तभी सार्थक है जब वह शास्त्राध्ययन में परिणत हो; शास्त्राध्ययन तभी सफल है जब वह मनन और निदिध्यासन में परिणत हो; और साधना तभी पूर्ण होती है जब आत्मस्वरूप का बोध जीवन का आधार बन जाए। यही गुरु-दक्षिणा है, यही गुरु-भक्ति है और यही भारतीय ऋषि-परम्परा का सच्चा सम्मान है।

आज आवश्यकता है कि हम अपने जीवन में सत्य, धर्म, करुणा, संयम, स्वाध्याय और आत्मचिन्तन को पुनः प्रतिष्ठित करें। समाज की स्थायी शांति केवल भौतिक उन्नति से नहीं, अपितु चरित्र, सदाचार और आत्मविद्या से सम्भव है। जिस समाज में गुरु का सम्मान, शास्त्रों में निष्ठा और धर्म में आस्था जीवित रहती है, वही समाज अपने सांस्कृतिक वैभव को अक्षुण्ण रख सकता है।

इस पावन व्यासपूर्णिमा-गुरुपूर्णिमा के अवसर पर भगवान् श्रीद्वारकाधीश, जगज्जननी श्रीशारदाम्बा, भगवान् श्रीसिद्धेश्वर महादेव, आदि जगद्गुरु भगवान् श्रीशङ्करभगवत्पादाचार्य तथा भगवान् वेदव्यास की कृपा समस्त श्रद्धालुजनों पर निरन्तर बनी रहे। प्रत्येक साधक के अन्तःकरण में आत्मविद्या के प्रति अनुराग, गुरु-चरणों में अखण्ड श्रद्धा, शास्त्रों में दृढ़ निष्ठा तथा धर्मपालन का संकल्प सुदृढ़ हो। सम्पूर्ण मानवता शान्ति, सद्भाव, आध्यात्मिक जागरण और लोकमंगल के पथ पर अग्रसर हो—इन्हीं मंगलकामनाओं सहित पावन शुभाशीर्वाद।

धर्म की जय हो। अधर्म का नाश हो। प्राणियों में सद्भावना हो। विश्व का कल्याण हो। गोमाता की जय हो। गोहत्या बन्द हो।

(यह विचार पश्चिमाम्नाय श्रीद्वारकाशारदापीठाधीश्वर जगद्गुरु शङ्कराचार्य स्वामी सदानन्द सरस्वती महाराज के हैं। )

हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी