ग्रेट निकोबार : क्या राष्ट्रहित से ऊपर है कांग्रेस की राजनीति
डॉ. मयंक चतुर्वेदी
आज जब भारत विश्व मंच पर एक उभरती हुई महाशक्ति के रूप में अपनी पहचान बना रहा है, तब देश को मजबूत सामरिक ढांचा, आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर और वैश्विक व्यापारिक क्षमता की भी आवश्यकता है। हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बढ़ती भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के बीच भारत को अपने समुद्री हितों और राष्ट्रीय सुरक्षा को सुदृढ़ करना समय की मांग है। ऐसे समय में ग्रेट निकोबार परियोजना भारत के सामरिक, आर्थिक और वैश्विक भविष्य की आधारशिला है, लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण है कि कांग्रेस इस परियोजना का लगातार विरोध कर रही है।
वस्तुत: कभी पर्यावरण के नाम पर, कभी आदिवासी हितों के नाम पर और अब राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर प्रश्न उठाकर कांग्रेस ऐसे प्रोजेक्ट को रोकने की कोशिश कर रही है, जो भविष्य में भारत को समुद्री शक्ति, व्यापारिक आत्मनिर्भरता और सामरिक मजबूती प्रदान करने का कारण बनेगा। सवाल यह है कि क्या वास्तव में कांग्रेस को पर्यावरण और जनजातीय समाज की इतनी चिंता है या फिर यह मोदी सरकार का विरोध करने की योजनाबद्ध मानसिकता है?
विरोध नहीं, यह विकास रोकने की राजनीति है
कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने हाल ही में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को पत्र लिखकर ग्रेट निकोबार परियोजना के मौजूदा स्वरूप पर पुनर्विचार की मांग की है। उनका तर्क है कि ट्रांसशिपमेंट पोर्ट और टाउनशिप जैसी योजनाएं सैन्य क्षमता नहीं बढ़ातीं और पर्यावरण तथा आदिवासी समुदायों पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकती हैं। ऐसे में यहां स्वभाविक प्रश्न उभरता है कि यदि कांग्रेस को विकास परियोजनाओं से इतना ही परहेज है, तब अपने दशकों लंबे शासनकाल में उसने देशभर में हजारों बड़े बांध, बंदरगाह, औद्योगिक कॉरिडोर, राजमार्ग और शहरी परियोजनाएं क्यों शुरू कीं?
क्या तब पर्यावरण और जनजातीय हित याद नहीं आए? क्या उस समय पर्यावरण का नुकसान नहीं हो रहा था? असल सच्चाई यह है कि कांग्रेस का यह विरोध सिद्धांत आधारित न होकर सिर्फ राजनीति से प्रेरित है। यदि यही परियोजना कांग्रेस सरकार लेकर आती, तो वही नेता इसे “भारत के भविष्य का द्वार” बताते।
ग्रेट निकोबार : भारत का सामरिक कवच
ग्रेट निकोबार द्वीप की स्थिति हिंद महासागर क्षेत्र में अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह पूर्व-पश्चिम अंतरराष्ट्रीय शिपिंग मार्ग से मात्र लगभग 40 नॉटिकल मील की दूरी पर स्थित है। दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री व्यापारिक मार्गों में से एक के इतना निकट होना भारत के लिए रणनीतिक दृष्टि से अमूल्य अवसर है।
आज भारत का बड़ा हिस्सा विदेशी ट्रांसशिपमेंट बंदरगाहों जैसे कोलंबो, सिंगापुर और क्लांग पर निर्भर है। इसका सीधा अर्थ है कि भारत का व्यापारिक और सामरिक हित दूसरे देशों की बंदरगाह नीतियों पर निर्भर रहता है। ग्रेट निकोबार परियोजना इस निर्भरता को समाप्त करने की दिशा में निर्णायक कदम है। हमें समझना होगा कि 14.2 मिलियन टीईयू क्षमता वाला इंटरनेशनल कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल भारत को समुद्री व्यापार में आत्मनिर्भर बनाएगा। यह आर्थिक परियोजना होने के साथ चीन की बढ़ती समुद्री आक्रामकता के सामने भारत की रणनीतिक उपस्थिति को मजबूत करने वाला कदम है।
क्या कांग्रेस को दिखाई नहीं देता कि भारत के पड़ौसी देश अपनी सामरिक शक्ति एवं अन्य शक्तियां बढ़ाने के लिए क्या कर रहे हैं? जब चीन हिंद महासागर क्षेत्र में लगातार अपने बंदरगाह नेटवर्क का विस्तार कर रहा है, तब भारत यदि अपनी सामरिक क्षमता बढ़ाता है तो कांग्रेस को इसमें समस्या क्यों दिखाई देती है? कांग्रेस का कहना है कि केवल आईएनएस बाज या अन्य सैन्य परिसंपत्तियों के विस्तार से काम चल सकता है। लेकिन क्या भारत जैसे विशाल और उभरते हुए राष्ट्र को केवल “काम चलाने” वाली मानसिकता के साथ आगे बढ़ना चाहिए?
उम्मीद से अधिक नहीं किंतु यह तो कांग्रेस समझ ही सकती है कि 150 करोड़ की जनसंख्या वाले भारत को भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर की आवश्यकता है। यदि भारत को वैश्विक व्यापार, नौसैनिक शक्ति और समुद्री रणनीति में अग्रणी बनना है, तो उसे विश्वस्तरीय बंदरगाह, एयरपोर्ट और आधुनिक शहरी ढांचे की आवश्यकता होगी। कांग्रेस शायद यह भूल रही है कि राष्ट्रीय सुरक्षा सैन्य अड्डों के साथ ही मजबूत आर्थिक और लॉजिस्टिक क्षमता से भी सुनिश्चित होती है। ट्रांसशिपमेंट पोर्ट, एयरपोर्ट और टाउनशिप, ये सभी मिलकर भारत को हिंद-प्रशांत क्षेत्र में स्थायी रणनीतिक बढ़त दिलाएंगे।
पर्यावरण के नाम पर भ्रम फैलाती कांग्रेस
कांग्रेस लगातार यह प्रचारित करने की कोशिश कर रही है कि इस परियोजना से बड़े स्तर पर पर्यावरण को नुकसान होगा किंतु वास्तविकता इससे भिन्न है। यह परियोजना ईआईए अधिसूचना 2006 और आईसीआरजेड अधिसूचना 2019 के तहत सभी आवश्यक पर्यावरणीय मंजूरियां प्राप्त कर चुकी है। इसके लिए विस्तृत पर्यावरण प्रभाव आकलन किया गया है, जिसमें भारतीय प्राणी सर्वेक्षण, भारतीय विज्ञान संस्थान, वन्यजीव संस्थान और सैकॉन जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों ने अध्ययन किया है।
परियोजना के अंतर्गत 42 अनिवार्य पर्यावरणीय शर्तें लागू की गई हैं। द्वीप के केवल 1.82 प्रतिशत वन क्षेत्र का उपयोग किया जाएगा और इसके बदले 97.30 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में क्षतिपूर्ति वनीकरण किया जाएगा। इतना ही नहीं, 65.99 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को ग्रीन जोन के रूप में संरक्षित रखा जाएगा, जहां एक भी पेड़ नहीं काटा जाएगा। क्या कांग्रेस यह बताना चाहेगी कि उसके शासनकाल में बनी परियोजनाओं में इतने व्यापक पर्यावरणीय सुरक्षा प्रावधान कितनी बार देखने को मिले थे?
आदिवासी हितों पर राजनीति बंद होनी चाहिए
कांग्रेस यह आरोप लगा रही है कि परियोजना से शोंपेन और निकोबारी समुदाय प्रभावित होंगे किंतु सही तथ्य यह है कि परियोजना में किसी भी जनजातीय समुदाय के विस्थापन का प्रस्ताव नहीं है। परियोजना के अंतर्गत जनजातीय आरक्षित क्षेत्र में शुद्ध वृद्धि सुनिश्चित की जा रही है। 73.07 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को डी-नोटिफाई करने के बदले 76.98 वर्ग किलोमीटर नई भूमि को पुनः जनजातीय आरक्षित क्षेत्र घोषित किया जा रहा है। यानी कुल आरक्षित क्षेत्र में वृद्धि होगी।
इसके अतिरिक्त, जनजातीय हितों की निगरानी के लिए स्वतंत्र समितियां गठित की गई हैं और जनजातीय कार्य मंत्रालय, एएजेवीएस तथा भारतीय मानव विज्ञान सर्वेक्षण जैसे संस्थानों से विस्तृत परामर्श किया गया है। यदि वास्तव में सरकार आदिवासी विरोधी होती, तब क्या इतनी संवेदनशील और निगरानी आधारित व्यवस्था तैयार की जाती?
भारत को आत्मनिर्भर और शक्तिशाली बनाना अपराध नहीं
आज विश्व तेजी से बदल रहा है। समुद्री व्यापार, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला और सामरिक समुद्री मार्ग आने वाले दशकों की शक्ति का निर्धारण करेंगे। भारत यदि इस दिशा में निर्णायक कदम उठा रहा है तो उसका स्वागत होना चाहिए, न कि राजनीतिक विरोध। मोदी सरकार का उद्देश्य स्पष्ट है कि भारत को आत्मनिर्भर, सामरिक रूप से मजबूत और आर्थिक रूप से शक्तिशाली बनाना है। ग्रेट निकोबार परियोजना उसी दृष्टि का हिस्सा है।
विकास और पर्यावरण साथ-साथ चलते हैं
वस्तुत: आज ग्रेट निकोबार परियोजना यह सिद्ध करती है कि विकास और पर्यावरण एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। आधुनिक तकनीक, वैज्ञानिक मूल्यांकन और चरणबद्ध विकास के माध्यम से दोनों के बीच संतुलन स्थापित किया जा सकता है। गैस और सौर ऊर्जा आधारित हाइब्रिड पावर प्लांट, पर्यावरण प्रबंधन योजना, आपदा प्रबंधन ढांचा और जैव विविधता संरक्षण उपाय यह दर्शाते हैं कि सरकार दीर्घकालिक सतत विकास की सोच के साथ आगे बढ़ रही है।
कांग्रेस समझे, राष्ट्रहित सर्वोपरि
ऐसे में कहना यही होगा कि ग्रेट निकोबार परियोजना भारत के भविष्य की परियोजना है। यह सिर्फ एक बंदरगाह या एयरपोर्ट का निर्माण नहीं हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की शक्ति, प्रतिष्ठा और आत्मनिर्भरता का प्रतीक है। कांग्रेस यदि वास्तव में राष्ट्रहित की राजनीति करना चाहती है तो उसे हर राष्ट्रीय परियोजना का अंधा विरोध बंद कर देना चाहिए। ध्यान रहे- आलोचना होनी चाहिए, सुझाव भी दिए जाने चाहिए पर विकास को रोकने और देश को कमजोर करने वाली मानसिकता किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं हो सकती।
भारत अब 20वीं सदी की सोच से आगे निकल चुका है। यह नया भारत है, जो पर्यावरण का संरक्षण भी करना जानता है, आदिवासी हितों का सम्मान भी करता है और साथ ही राष्ट्रीय सुरक्षा एवं विकास को सर्वोच्च प्राथमिकता भी देता है। स्वभाविक है कि ग्रेट निकोबार परियोजना इसी नए भारत की महत्वाकांक्षा, क्षमता और आत्मविश्वास का प्रतीक है, जिसे हर हाल में पूरा होना ही चाहिए, इसी में हम सभी भारतीयों का हित निहित है।
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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी

