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ग्रेट निकोबार पर राजनीति बनाम राष्ट्रनीति

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ग्रेट निकोबार पर राजनीति बनाम राष्ट्रनीति


-डॉ. मयंक चतुर्वेदी

भारत आज ऐसे दौर से गुजर रहा है, जहां आर्थिक शक्ति, समुद्री सुरक्षा और ऊर्जा आत्मनिर्भरता भविष्य की वैश्विक प्रतिस्पर्धा के प्रमुख आधार बन चुके हैं। ऐसे समय में ग्रेट निकोबार परियोजना भारत के हित में महत्वपूर्ण हिस्सा बनकर उभरी है। बावजूद इसके, कांग्रेस नेतृत्व इस परियोजना का लगातार विरोध कर रहा है, जिससे विकास और राजनीति के बीच एक नई बहस खड़ी हो गई है। करीब 90 हजार करोड़ रुपये की लागत वाली ग्रेट निकोबार परियोजना में अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल, ग्रीनफील्ड अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, आधुनिक टाउनशिप और ऊर्जा अवसंरचना का निर्माण प्रस्तावित है, जिसमें कि इसकी सबसे बड़ी विशेषता इसका भू-राजनीतिक महत्व है।

इस योजना की आलोचना करनेवालों को यह भी ध्यान रखना चाहए कि ग्रेट निकोबार द्वीप मलक्का जलडमरूमध्य के बेहद निकट स्थित है, जहां से विश्व व्यापार का बड़ा हिस्सा गुजरता है। वर्तमान में भारत को अपने अधिकांश कंटेनर ट्रांसशिपमेंट के लिए सिंगापुर, कोलंबो और अन्य विदेशी बंदरगाहों पर निर्भर रहना पड़ता है। यह परियोजना भारत को इस निर्भरता से बाहर निकालने और हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी रणनीतिक स्थिति मजबूत करने का अवसर प्रदान कर सकती है।

कांग्रेस का विरोध और उठते सवाल

राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खड़गे और जयराम रमेश लगातार यह आरोप लगा रहे हैं कि परियोजना पर्यावरण को नुकसान पहुंचाएगी और कुछ बड़े कारोबारी हितों को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से बनाई गई है। राहुल गांधी ने इसे ग्रीन बनाम ग्रीड की लड़ाई के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश की है, किंतु इन आरोपों के बीच यह प्रश्न भी उठता है कि यदि परियोजना का उद्देश्य सिर्फ निजी लाभ होता, तो इसमें राष्ट्रीय सुरक्षा, समुद्री व्यापार, बंदरगाह विकास, हवाई संपर्क और ऊर्जा अवसंरचना जैसे व्यापक आयाम क्यों शामिल किए जाते?

यह सच है कि आलोचना लोकतंत्र का हिस्सा है, पर क्या इस का अर्थ यह माना जाए कि आलोचना तथ्यों के आधार पर न होकर सिर्फ कल्पना या जो मन में आ गया अथवा सत्ता पक्ष पर आरोप ही लगाना है, इसलिए कुछ भी बोल दिया जाएगा? आरोप लगा दो, बाद में सामने वाला अपनी सफाई देता रहे! वह भी आरोप सिर्फ राजनीतिक धारणा पर केंद्रित होकर लगा दिए जाएं, यह कहां तक सही है?

पर्यावरणीय चिंताएं: समाधान की मांग या पूर्ण विरोध?

कांग्रेस का कहना है कि परियोजना से बड़े पैमाने पर वन क्षेत्र प्रभावित होगा और जैव विविधता को नुकसान पहुंचेगा। यह चिंता निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है। किसी भी विकास परियोजना में पर्यावरणीय प्रभावों का गंभीर मूल्यांकन आवश्यक होता है। यहां कांग्रेस स्वयं यह भूल रही है या देखना ही नहीं चाहती कि इस परियोजना से जुड़ा तथ्य यह है कि इसे भी विस्तृत पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) प्रक्रिया से गुजरना पड़ा है। विभिन्न विशेषज्ञ संस्थानों द्वारा अध्ययन किए गए हैं और अनेक पर्यावरणीय शर्तों के साथ मंजूरी दी गई है।

सरकार का दावा है कि सीमित क्षेत्र का उपयोग होगा, क्षतिपूरक वनीकरण किया जाएगा और संवेदनशील क्षेत्रों को संरक्षित रखा जाएगा। सरकार तो केंद्र में पहले कांग्रेस की भी रही है, उसने भी कई परियोजनाओं पर काम किया, आज के तर्कों के आधार पर तो कांग्रेस के लिए फिर यही कहा जाएगा कि उसे भी वह सब कुछ नहीं करना चाहिए था, जिसे वह कभी भारत के विकास के लिए आवश्यक मानती रही है, इसलिए वास्तविक बहस का विषय यह होना चाहिए कि इन शर्तों का कठोरता से पालन कैसे सुनिश्चित किया जाए, न कि परियोजना को रोक दिया जाए।

जनजातीय अधिकार: वास्तविक चिंता या राजनीतिक हथियार?

कांग्रेस का एक प्रमुख तर्क शोंपेन और निकोबारी जनजातियों के अधिकारों को लेकर है। निश्चित रूप से आदिवासी समुदायों की संस्कृति, परंपरा और जीवनशैली की रक्षा राष्ट्रीय दायित्व है, किंतु आधिकारिक दस्तावेजों के अनुसार किसी भी जनजातीय समुदाय के व्यापक विस्थापन का प्रस्ताव नहीं है। निगरानी तंत्र, जनजातीय कल्याण उपाय और संरक्षित क्षेत्रों की व्यवस्था भी की गई है। यदि कहीं कमियां हैं, तो उन्हें दूर करने की आवश्यकता है। लेकिन पूरी परियोजना को जनजातीय हितों के खिलाफ बताना वास्तविक मुद्दों की गंभीरता को कमजोर कर सकता है।

प्राकृतिक गैस की खोज ने बढ़ाया परियोजना का महत्व

कांग्रेस यह समझे कि हाल ही में अंडमान-निकोबार क्षेत्र में प्राकृतिक गैस के बड़े भंडार मिलने की खबर ने इस पूरे क्षेत्र के महत्व को और बढ़ा दिया है। केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने जानकारी भी साझा की है कि ऑयल इंडिया लिमिटेड को अंडमान अपतटीय बेसिन में श्री विजय पुरम-3 क्षेत्र में प्राकृतिक गैस की महत्वपूर्ण उपस्थिति मिली है।

यह खोज निश्चित ही ऊर्जा संसाधन के रूप में आज भारत की ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि है। इससे पहले भी इसी क्षेत्र में गैस भंडार मिलने की पुष्टि हो चुकी है। ऐसे में पूरा अंडमान बेसिन भविष्य में भारत के लिए ऊर्जा क्रांति का केंद्र बन सकता है। नई खोजों से यह सुनिश्चित है कि यह ग्रेट निकोबार परियोजना बंदरगाह और हवाई अड्डे तक सीमित नहीं रह जाती, यह संभावित ऊर्जा हब के रूप में भी उभरती है। इससे राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक विकास और ऊर्जा रणनीति के बीच एक मजबूत संबंध स्थापित होता है।

मोदी सरकार का समुद्री और ऊर्जा विजन

प्रधानमंत्री मोदी की सरकार ने पिछले एक दशक में भारत को समुद्री शक्ति बनाने पर विशेष जोर दिया है। 'सागर' नीति, इंडो-पैसिफिक रणनीति और अब 'समुद्र मंथन मिशन' इसी व्यापक दृष्टिकोण का हिस्सा हैं। भारत ऐसे समय में यह कदम उठा रहा है जब चीन हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी मौजूदगी लगातार बढ़ा रहा है और पड़ोसी देश अपने समुद्री ढांचे का विस्तार कर रहे हैं। ऐसे माहौल में भारत के लिए निष्क्रिय बने रहना रणनीतिक दृष्टि से नुकसानदेह हो सकता है। ग्रेट निकोबार परियोजना भारत को समुद्री व्यापार, रक्षा तैयारी और ऊर्जा सुरक्षा के क्षेत्र में नई ताकत देने की क्षमता रखती है।

विपक्ष की भूमिका: सुधार या अवरोध?

लोकतंत्र में विपक्ष का दायित्व केवल विरोध करना नहीं, बल्कि बेहतर विकल्प और रचनात्मक सुझाव देना भी होता है। पर्यावरणीय मंजूरियों, पारदर्शिता और स्थानीय समुदायों के हितों पर सवाल उठाना आवश्यक है, लेकिन जब लगभग हर बड़ी राष्ट्रीय परियोजना विरोध का विषय बन जाए, तब जनता के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि उद्देश्य सुधार है या अवरोध! वस्तुत: कांग्रेस को यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि यदि ग्रेट निकोबार जैसी परियोजनाओं का विरोध किया जाता है, तो भारत अपनी समुद्री, व्यापारिक और ऊर्जा क्षमताओं का विस्तार किस वैकल्पिक मॉडल के माध्यम से करेगा।

राष्ट्रहित को राजनीति से ऊपर रखने की जरूरत

अत: यहां कांग्रेस समेत जो इस योजना का विरोध कर रहे हैं, उन सभी के लिए यही कहना होगा कि “ग्रेट निकोबार परियोजना” पर सवाल उठाना लोकतांत्रिक अधिकार है, परन्तु राष्ट्रीय हितों से जुड़े मुद्दों पर संतुलित दृष्टिकोण भी उतना ही आवश्यक है। पर्यावरण, जैव विविधता और जनजातीय अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए विकास की राह पर आगे बढ़ना ही सर्वोत्तम विकल्प हो सकता है।

प्राकृतिक गैस की हालिया खोज ने यह स्पष्ट संकेत दिया है कि अंडमान-निकोबार केवल एक द्वीप समूह नहीं, बल्कि भारत की सामरिक, आर्थिक और ऊर्जा शक्ति का भविष्य बन सकता है। ऐसे में राजनीतिक दलों को विरोध और समर्थन की सीमाओं से ऊपर उठकर राष्ट्रहित को प्राथमिकता देनी होगी। क्योंकि अंततः यह बहस किसी सरकार या विपक्ष की नहीं होकर भारत के भविष्य की है, जिसमें हम सभी को मिलकर अपने देश को हर तरीके से और हर क्षेत्र में शक्तिशाली बनाना है।

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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी