संकट के दौर में वैश्विक पर्यटन उद्योग
-डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा
अमेरिका-इजरायल और ईरान युद्ध के साइड इफेक्ट के रुप में दुनिया का पर्यटन उद्योग बुरी तरह से प्रभावित हुआ है। एक अनुमान के अनुसार 152 करोड़ पर्यटकों से गुलजार रहने वाले वैश्विक पर्यटन उद्योग के मौजूदा हालात के चलते अतिमंदी के दौर से गुजरने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। वैसे तो सभी देशों में पर्यटन उद्योग पर विपरीत असर पड़ने जा रहा है पर सबसे अधिक असर मध्य पूर्व के देशों में देखा जा सकता है। जानकारों के अनुसार अकेले मध्य पूर्व को ही 600 मिलियन अमेरिकी डॉलर का नुकसान भुगतना पड़ सकता है। दुनिया में सबसे अधिक पर्यटक फ्रांस की धरती पर जाते हैं और माना जाता है कि 9 से 10 करोड़ पर्यटक तो फ्रांस का रुख करते हैं। जहां तक भारत का प्रश्न है, हमारे यहां भी लगभग 2 करोड़ विदेशी पर्यटक देश के विभिन्न पर्यटन स्थलों का रुख करते हैं। पर मौजूदा हालात के चलते विश्व के अन्य देशों की तरह भारत में भी विदेशी पर्यटकों की आवाजाही पर विपरीत प्रभाव पड़ना ही है।
एक सकारात्मक पक्ष यह देखा जा सकता है कि भारत और दुनिया के देशों में देशी पर्यटकों की संख्या में उछाल के चलते इस उद्योग को संजीवनी अवश्य मिलती लगती है।
वर्तमान दौर में दुनिया के चौधरी बने देशों को यह समझ लेना चाहिए कि अब वह जमाना गया जब हफ्ते दो हफ्ते में युद्ध का फैसला हो जाया करता था। आज छोटे-से छोटा देश भी युद्ध को लंबा खींचने की कूवत रखता है। इसे हम रुस-यूक्रेन युद्ध से अच्छी तरह से समझ सकते हैं। अमेरिका ने भी जब ईरान पर आक्रमण किया तो ट्रंप भी इसी मुगालते में थे कि दो-चार दिन में ईरान के घुटने टिकवा देंगे पर सारे कयास धरे के धरे रह गए और इनके चक्कर में दुनिया अस्थिरता और संकट में और आ गई। आज हालात यह हो गए हैं कि युद्ध तो आप शुरु कर सकते हैं पर युद्ध शुरु होने के बाद कब बंद होगा यह आपके हाथ में नहीं रहेगा।
युद्ध के चलते हालात ऐसे हो गए हैं कि चाह कर भी पर्यटक घूमने का रुख नहीं कर पा रहे हैं। केवल और केवल ट्रंप के दादागिरी के चलते दुनिया के देशों की जीडीपी में करीब 10 प्रतिशत की हिस्सेदारी निभाने वाला पर्यटन उद्योग बुरी तरह से प्रभावित हो गया है। होटल और ट्रैवल उद्योग से जुड़ी एजेंसियों के सामने बड़ा संकट आ गया है तो दुनिया के देशों और संस्कृतियों से जुड़ने और समझ कर एक-दूसरे के नजदीक आने की जो पहल पर्यटन उद्योग के चलते हुई थी उस पर लगभग विराम के हालात होते जा रहे हैं। 10 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर से भी अधिक का पर्यटन उद्योग आज संकट के दौर में आ गया है। उदाहरण के तौर पर देखा जाए तो थाईलैंड की अर्थव्यवस्था में 20 प्रतिशत हिस्सेदारी पर्यटन उद्योग की है और वह लगातार दूसरे साल गंभीर संकट के दौर में आ गई है। जैसे-तैसे पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए हजार डॉलर प्रतिदिन के लग्जरी कमरों की कीमत घटकर 300 डॉलर तक कर देने के बाद भी पर्यटक रुख नहीं कर रहे हैं। हालात विकट होते जा रहे हैं।
दरअसल वैश्विक हालात के चलते एक ओर उड़ानें रद्द होती जा रही है तो युद्ध के चलते लोगों में असुरक्षा की भावना घर कर रही है। ऐसी आशंका होती है कि कब कहां क्या हो जाए और कहीं जाएं वहीं पर बंद होकर न रह जाएं। मध्य-पूर्व के देशों में तो लगभग यही हालात है। कब किस देश और किस स्थान पर मिसाइल अटैक हो जाए, कहा नहीं जा सकता। क्योंकि अमेरिका-इजरायल व ईरान युद्ध की खास नकारात्मक बात यह है कि इन दो देशों पर मिसाइल अटैक नहीं हो रहे बल्कि इनसे थोड़ी भी सहानुभूति रखने वाले देश कब निशाने पर आ जाएं, कहा नहीं जा सकता। मध्य-पूर्व में मिसाइल अटैक और हार्मुज जलडमरुमध्य के हालात इसके उदाहरण हैं।
हालात तो यहां तक खराब होने की आशंका है कि मध्य-पूर्व के देशों में पानी का गंभीर संकट हो सकता है। आज कच्चा तेल, एलपीजी की ही समस्या नहीं अपितु दुनिया को जोड़ने वाले इंटरनेट के बाधित होने की आशंकाओं को भी नकारा नहीं जा सकता। लगता है एक-दूसरे के अहम् के चलते आम आदमी कहीं हाशिये में चला गया है। युद्ध के सामान्य नियम ताक में रख दिए गए हैं और आम नागरिकों, बच्चों, अस्पतालों, घनी आबादी इलाकों में भी मिसाइल दागने से कोई परहेज नहीं रह गया है।
कोरोना के दौरान जिस तरह पर्यटन उद्योग प्रभावित हुआ था आज उसी तरह के हालात बनते दिख रहे हैं। कोरोना के बाद पिछले सालों में पर्यटन उद्योग ने तेजी पकड़ी थी और लगने लगा था कि 2030 तक पर्यटन उद्योग को जबरदस्त बूस्ट मिलेगा पर अब हालात तेजी से बिगड़ रहे हैं और लगता नहीं है कि आने वाले दिनों में कोई सुधार दिखाई देगा। हालांकि सकारात्मक पक्ष यह देखा जा सकता है कि भारत सहित विश्व के देशों में देशी पर्यटन को अवश्य बढ़ावा मिलने लगा है। लोग अपने ही देश में आसपास के स्थानों को एक्सप्लोर करने लगे हैं। वर्तमान हालात पर्यटन उद्योग के लिए बेहद चुनौती भरा है, जिसके सामान्य होने के आसार दूर-दूर तक नहीं हैं।
(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश

