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गणेशोत्सव : प्रथम पूज्य गणपति में समाहित है बुद्धि, विवेक और मंगल का संदेश

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गणेशोत्सव : प्रथम पूज्य गणपति में समाहित है बुद्धि, विवेक और मंगल का संदेश


गणेशोत्सव : प्रथम पूज्य गणपति में समाहित है बुद्धि, विवेक और मंगल का संदेश


गणेश चतुर्थी (14 सितंबर) पर विशेषउदय कुमार सिंह

देशभर में गणेशोत्सव की तैयारियां पूरी कर ली गई हैं। 14 सितंबर से शुरू होने वाले इस महोत्सव की धूम 25 सितंबर तक रहेगी। लोग श्रद्धा-भक्ति के साथ भगवान गणेश का पूजन-अर्चन कर संपूर्ण मनोकामनाओं की पूर्ति का आशीर्वाद प्राप्त करेंगे। वास्तव में विघ्नहर्ता, मंगलमूर्ति, गणनायक, एकदंत, लंबोदर और गजानन जैसे अनेक नामों से पूजे जाने वाले भगवान गणेश भारतीय धार्मिक और सांस्कृतिक जीवन में विशिष्ट स्थान रखते हैं। किसी भी शुभ कार्य के आरंभ में प्रथम पूज्य के रूप में गणपति का स्मरण करने की परंपरा रही है। धार्मिक मान्यताओं में उन्हें बुद्धि, विवेक, विद्या और शुभारंभ का देवता माना गया है। यही कारण है कि विवाह, गृहप्रवेश, यज्ञ, पूजा, व्यापार और शिक्षा जैसे मांगलिक कार्यों में सबसे पहले गणेश पूजन किया जाता है।

इस वर्ष गणेश चतुर्थी 14 सितंबर को मनाई जाएगी। इसी दिन घरों और सार्वजनिक पंडालों में भगवान गणेश की प्रतिमाएं स्थापित की जाएंगी। दस दिवसीय गणेशोत्सव का समापन 25 सितंबर को अनंत चतुर्दशी के दिन होगा। हालांकि परंपरा के अनुसार कई परिवार डेढ़, तीन, पांच या सात दिन बाद भी अपनी सुविधा और कुलाचार के अनुसार गणपति विसर्जन करते हैं।

गणेशोत्सव अब केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं है। यह कला, लोकसंस्कृति, सामुदायिक सहभागिता और सामाजिक चेतना से जुड़ा व्यापक पर्व बन चुका है। महाराष्ट्र में सार्वजनिक गणेशोत्सव ने सामाजिक एकता और स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में जनजागरण का माध्यम बनने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। समय के साथ यह पर्व देश के विभिन्न हिस्सों और विदेशों में बसे भारतीय समुदायों तक पहुंच गया।

गणेश : बुद्धि और मंगल के प्रतीकसनातन परंपरा में भगवान गणेश को विघ्नहर्ता और बुद्धि-विवेक का अधिष्ठाता माना जाता है। धार्मिक विश्वास है कि किसी भी शुभ कार्य से पहले गणेश पूजन करने से कार्य निर्विघ्न संपन्न होता है। गणेश शब्द की व्याख्या ‘गणों के ईश’ के रूप में की जाती है। वे भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र तथा शिवगणों के अधिपति माने जाते हैं।

धार्मिक परंपराओं में गणेश को विद्या, बुद्धि, सिद्धि, समृद्धि और आनंद से भी जोड़ा गया है। बुधवार को भी गणेश आराधना का विशेष महत्व माना जाता है। धार्मिक और ज्योतिषीय मान्यताओं में बुध ग्रह को बुद्धि, वाणी, गणना और व्यापार से जोड़ा जाता है। हालांकि इससे जुड़े फल धार्मिक और ज्योतिषीय विश्वासों का हिस्सा हैं।

गणेश चतुर्थी का धार्मिक महत्वभाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को गणेश चतुर्थी मनाई जाती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इसी तिथि को भगवान गणेश का प्राकट्य हुआ था। श्रद्धालु इस दिन विधि-विधान से गणपति की स्थापना कर दूर्वा, मोदक, लड्डू और पुष्प अर्पित करते हैं। घरों और पंडालों में पूजा, आरती, भजन-कीर्तन तथा अन्य धार्मिक-सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। अंतिम चरण में गणपति प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है। धार्मिक भाव में इसे भगवान गणेश के अपने धाम लौटने और अगले वर्ष फिर आने के निमंत्रण से जोड़ा जाता है।

वर्ष 2026 में गणेश चतुर्थी 14 सितंबर को और अनंत चतुर्दशी 25 सितंबर को होगी। चतुर्थी तिथि 14 सितंबर से 15 सितंबर की सुबह तक रहने के बावजूद पर्व का पालन उदयातिथि के अनुसार 14 सितंबर को किया जाएगा।

महाराष्ट्र से देशव्यापी जनोत्सव तकगणेश पूजा की परंपरा प्राचीन है लेकिन महाराष्ट्र में इसे सार्वजनिक और व्यापक सामाजिक उत्सव का स्वरूप अपेक्षाकृत आधुनिक दौर में मिला। मराठा शासन और पेशवा काल में गणेश आराधना को विशेष महत्व प्राप्त था। बाद में सार्वजनिक गणेशोत्सव को व्यापक स्वरूप देने का श्रेय लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक से जुड़ा।

1893 में पुणे में तिलक ने गणेशोत्सव को सार्वजनिक रूप देने का प्रयास किया। उनका उद्देश्य धार्मिक आयोजन को सामाजिक एकता, जनजागरण और राष्ट्रीय चेतना के मंच के रूप में विकसित करना था। ब्रिटिश शासन के दौर में बड़े राजनीतिक जमावड़ों पर कई तरह की पाबंदियां थीं। ऐसे समय में धार्मिक-सांस्कृतिक आयोजन समाज के विभिन्न वर्गों को एक साथ लाने का माध्यम बने।

सार्वजनिक गणेशोत्सव ने महाराष्ट्र में सामूहिक भागीदारी और राष्ट्रवादी चेतना को मजबूत किया। बाद के वर्षों में इसकी लोकप्रियता महाराष्ट्र से बाहर भी फैलती गई। आज मुंबई, पुणे, नागपुर, हैदराबाद, बेंगलुरु, दिल्ली, कोलकाता, चेन्नई सहित देश के अनेक शहरों में बड़े सार्वजनिक आयोजन होते हैं।

विदेशों में भी गूंजता है ‘गणपति बप्पा मोरया’भारतीय प्रवासी समुदाय के विस्तार के साथ गणेशोत्सव दुनिया के कई देशों तक पहुंच चुका है। अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, सिंगापुर, मलेशिया और मॉरीशस सहित अनेक देशों में भारतीय समुदाय गणेश चतुर्थी पर पूजा और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करता है। विदेशों में यह पर्व भारतीय समुदाय की सांस्कृतिक पहचान और नई पीढ़ी को अपनी परंपराओं से जोड़ने का माध्यम भी बन रहा है।

दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया के कई हिस्सों में गणेश की प्राचीन प्रतिमाएं और उनसे जुड़े सांस्कृतिक प्रतीक मिलते हैं। इंडोनेशिया सहित कई देशों में गणेश की ऐतिहासिक प्रतिमाएं भारतीय सांस्कृतिक प्रभाव के पुराने प्रसार की ओर संकेत करती हैं। हालांकि इन क्षेत्रों में गणेश चतुर्थी भारत जैसी एकरूप परंपरा में मनाई जाती रही हो, ऐसा कहना उचित नहीं होगा।

क्यों हैं गणपति प्रथम पूज्य?भगवान गणेश के प्रथम पूज्य होने को लेकर पुराणों और लोकपरंपराओं में अनेक कथाएं प्रचलित हैं। इनमें गणेश और उनके बड़े भाई कार्तिकेय से जुड़ी कथा सबसे प्रसिद्ध है। कथानुसार एक बार दोनों भाइयों के बीच श्रेष्ठता को लेकर प्रश्न उठा। भगवान शिव ने कहा कि जो पूरे संसार की परिक्रमा करके पहले लौटेगा, वही श्रेष्ठ माना जाएगा। कार्तिकेय अपने वाहन मयूर पर सवार होकर निकल पड़े। गणेश का वाहन मूषक था। उन्होंने अपनी बुद्धि का प्रयोग करते हुए माता-पिता की परिक्रमा की और कहा कि उनके लिए माता-पिता ही संपूर्ण संसार हैं।

गणेश की बुद्धिमत्ता से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें प्रथम पूज्य होने का वर दिया। धार्मिक परंपरा में यह कथा शक्ति और गति के मुकाबले बुद्धि और विवेक की महत्ता का प्रतीक मानी जाती है। इसका संदेश है कि हर चुनौती का समाधान केवल शारीरिक सामर्थ्य या गति से नहीं बल्कि सूझबूझ से भी संभव है।

गणेश के स्वरूप में छिपे जीवन-संदेशभगवान गणेश का स्वरूप प्रतीकों से समृद्ध माना जाता है। उनका विशाल मस्तक व्यापक चिंतन, छोटी आंखें एकाग्रता और बड़े कान अधिक सुनने की क्षमता का प्रतीक माने जाते हैं। उनकी सूंड सक्रियता और परिस्थितियों के अनुरूप स्वयं को ढालने की क्षमता का संकेत देती है।

विशाल उदर को जीवन में मिलने वाली अच्छी-बुरी परिस्थितियों को धैर्यपूर्वक स्वीकार करने और उन्हें पचाने की क्षमता से जोड़ा जाता है। इसी कारण उन्हें ‘लंबोदर’ कहा जाता है। उनका एक टूटा हुआ दांत उन्हें ‘एकदंत’ नाम देता है। धार्मिक व्याख्याओं में इसे त्याग, ज्ञान और उद्देश्य के प्रति समर्पण का प्रतीक माना गया है।

गणेश का वाहन मूषक भी अपने भीतर प्रतीकात्मक अर्थ समेटे है। धार्मिक व्याख्या में मूषक को चंचल मन, इच्छाओं और भटकती प्रवृत्तियों से जोड़ा जाता है। विशाल गणेश के साथ छोटे मूषक की कल्पना इस संदेश को व्यक्त करती है कि बुद्धि और विवेक से मन की चंचलता पर नियंत्रण पाया जा सकता है।

चार भुजाओं में जीवन-दर्शनभगवान गणेश के चार हाथों में विभिन्न वस्तुओं का चित्रण मिलता है। इनमें पाश, अंकुश, मोदक और वरद अथवा अभय मुद्रा प्रमुख हैं। धार्मिक व्याख्याओं में पाश को आसक्ति पर नियंत्रण, अंकुश को मन को सही दिशा देने, मोदक को ज्ञान से मिलने वाले आनंद और वरदहस्त को कृपा एवं संरक्षण का प्रतीक माना जाता है।

हालांकि गणेश के स्वरूप और हाथों में धारण की जाने वाली वस्तुओं की व्याख्या विभिन्न ग्रंथों और परंपराओं में अलग-अलग मिलती है। यह विविधता भारतीय धार्मिक प्रतीक परंपरा की विशेषता है।

गणेश जन्म और महाभारत से जुड़ी कथाएंभगवान गणेश के जन्म को लेकर विभिन्न पुराणों में अलग-अलग कथाएं मिलती हैं। सबसे लोकप्रिय कथा के अनुसार माता पार्वती ने अपने शरीर के उबटन से एक बालक का निर्माण किया और उसे द्वारपाल बनाया। जब भगवान शिव वहां पहुंचे तो बालक ने उन्हें भीतर जाने से रोक दिया। विवाद बढ़ने पर शिव ने उसका मस्तक अलग कर दिया। बाद में माता पार्वती के आग्रह पर भगवान शिव ने हाथी का मस्तक लगाकर उसे पुनर्जीवन दिया। इसी कारण गणेश ‘गजानन’ कहलाए।

गणेश का संबंध महाभारत की रचना की प्रसिद्ध कथा से भी जुड़ा है। धार्मिक परंपरा के अनुसार महर्षि वेदव्यास ने महाभारत की रचना की और भगवान गणेश ने उसे लिपिबद्ध किया। कथा के अनुसार गणेश ने लगातार लिखने की शर्त रखी, जबकि व्यास ने प्रत्येक श्लोक का अर्थ समझने के बाद ही उसे लिखने की शर्त रखी। इस कथा ने गणेश को लेखन, ज्ञान और बुद्धि के प्रतीक के रूप में प्रतिष्ठित किया।

श्रद्धा से सामाजिक सहभागिता तकआधुनिक समय में गणेशोत्सव का स्वरूप धार्मिक अनुष्ठान से आगे बढ़कर सामाजिक और सांस्कृतिक आयोजन का रूप ले चुका है। सार्वजनिक पंडालों में पूजा के साथ संगीत, नाटक, कला प्रदर्शनियां, सामाजिक जागरूकता अभियान और सेवा कार्य आयोजित किए जाते हैं। पर्व का एक नया पक्ष पर्यावरण संरक्षण से भी जुड़ा है। कई स्थानों पर मिट्टी की प्रतिमाओं, प्राकृतिक रंगों, कृत्रिम विसर्जन कुंडों और प्लास्टिक के सीमित इस्तेमाल को बढ़ावा दिया जा रहा है। इससे धार्मिक आस्था के साथ पर्यावरणीय जिम्मेदारी का संदेश भी जुड़ रहा है।

गणेशोत्सव की खासियत यही है कि इसमें धर्म, लोकजीवन, कला और सामुदायिक सहभागिता एक साथ दिखाई देती है। घर में स्थापित छोटी प्रतिमा हो या सार्वजनिक पंडाल में विराजमान विशाल गणपति, दोनों के केंद्र में श्रद्धा और उत्सव की सामूहिक भावना रहती है।

लोकमान्य तिलक ने जिस सार्वजनिक गणेशोत्सव को सामाजिक एकता और राष्ट्रीय चेतना से जोड़ने का प्रयास किया था, वह परंपरा बदलते समय के साथ नए रूपों में आगे बढ़ रही है। आज यह पर्व धार्मिक आस्था के साथ सामाजिक सेवा, सांस्कृतिक संरक्षण और सामुदायिक भागीदारी का माध्यम भी बन गया है।

भगवान गणेश का स्वरूप भारतीय चिंतन में बुद्धि, विवेक, धैर्य, विनम्रता और मंगल का संदेश देता है। गणेश चतुर्थी से अनंत चतुर्दशी तक चलने वाला उत्सव इसी भाव को व्यक्त करता है कि जीवन में किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत श्रद्धा और विवेक के साथ हो। ‘गणपति बप्पा मोरया’ का जयघोष विघ्नों पर विजय, बुद्धि की प्रधानता और मंगल की कामना की सांस्कृतिक अभिव्यक्ति है।(लेखक, हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

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हिन्दुस्थान समाचार / उदय कुमार सिंह