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बिहार की वित्त रहित शिक्षा व्यवस्था में 10 लाख विद्यार्थियों का भविष्य दांव पर

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बिहार की वित्त रहित शिक्षा व्यवस्था में 10 लाख विद्यार्थियों का भविष्य दांव पर


डाॅ. अरविंद नाथ तिवारी

बिहार में उच्च शिक्षा की चर्चा जब भी होती है, विश्वविद्यालयों और अंगीभूत महाविद्यालयों का उल्लेख प्रमुखता से किया जाता है। इसी व्यवस्था के समानांतर दशकों से एक ऐसी शिक्षा व्यवस्था भी चल रही है, जिसने सीमित संसाधनों के बावजूद लाखों विद्यार्थियों को उच्च शिक्षा का अवसर उपलब्ध कराया है। ये हैं बिहार के संबद्ध डिग्री महाविद्यालय, जिन्हें लंबे समय से वित्त रहित शिक्षा व्यवस्था का हिस्सा माना जाता रहा है। इन महाविद्यालयों की कहानी केवल कुछ संस्थानों की कहानी नहीं है। यह उन लाखों विद्यार्थियों और परिवारों की कहानी है, जिनके लिए पटना, गया, मुजफ्फरपुर, भागलपुर या किसी दूसरे बड़े शहर में जाकर पढ़ाई करना आर्थिक रूप से संभव नहीं था।

सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब इन महाविद्यालयों में विद्यार्थी पढ़ रहे हैं, परीक्षाएं हो रही हैं, डिग्रियां मिल रही हैं और राज्य की उच्च शिक्षा व्यवस्था में इन संस्थानों की भूमिका बनी हुई है तो वहां काम करने वाले शिक्षकों और शिक्षकेतर कर्मचारियों की आर्थिक सुरक्षा स्थायी क्यों नहीं होनी चाहिए? सरकार को यह विचार करना होगा कि शिक्षा का काम यदि महत्वपूर्ण और स्थायी है तो उससे जुड़े मानव संसाधन को अस्थायी आर्थिक व्यवस्था में कब तक रखा जा सकता है?

220 कॉलेज, लगभग 10 लाख विद्यार्थी

बिहार में लगभग 220 संबद्ध डिग्री महाविद्यालयों और उनसे जुड़े लगभग 10 लाख विद्यार्थियों का आंकड़ा इस विषय की गंभीरता को समझने के लिए पर्याप्त है। यह केवल 220 संस्थानों की संख्या नहीं है। इनके पीछे हजारों शिक्षक और शिक्षकेतर कर्मचारी हैं तथा लाखों परिवारों की उम्मीदें जुड़ी हुई हैं।

अनुदान बनाम वेतनमान

वित्त रहित संस्थानों की सबसे महत्वपूर्ण समस्याओं में से एक अनुदान और नियमित वेतनमान के बीच का अंतर है। कर्मचारियों की मांग है कि उन्हें ऐसी व्यवस्था मिले जिससे उनका जीवन आर्थिक असुरक्षा से बाहर निकल सके। यहां एक गंभीर सवाल भी उठता है, यदि सरकार किसी संस्थान की शैक्षणिक गतिविधियों को मान्यता देती है और उसके विद्यार्थियों को परीक्षा एवं डिग्री की व्यवस्था उपलब्ध कराती है तो वहां कार्यरत शिक्षकों और कर्मचारियों को नियमित वेतनमान और सामाजिक सुरक्षा देने की नीति क्यों नहीं बनाई जा सकती?

अनुदान आधारित व्यवस्था में पारदर्शिता सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा बन जाती है। यदि सरकार करोड़ों रुपये का अनुदान देती है तो उसके वितरण और उपयोग की स्पष्ट, सार्वजनिक और ऑडिट योग्य व्यवस्था होनी चाहिए। पैसा किस संस्था को कितना मिला, किस मद में खर्च हुआ और कर्मचारियों तक कितना पहुंचा- इन सभी सवालों का जवाब सार्वजनिक होना चाहिए।

यह आरोप भी सामने आते रहे हैं कि अनुदान की राशि का लाभ कर्मचारियों तक पूरी तरह नहीं पहुंचता और प्रबंधन स्तर पर वित्तीय अनियमितताएं होती हैं, ऐसी शिकायतें लगातार उठती रही हैं तो सरकार को स्वतंत्र और निष्पक्ष ऑडिट कराना चाहिए। दोषी पाए जाने वालों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। सवाल यह भी है कि कहीं ऐसा तो नहीं कि जिन लोगों को इस व्यवस्था से लाभ मिल रहा है, उनका प्रभाव नीति-निर्माण तक पहुंच रहा हो? यह एक गंभीर लोकतांत्रिक सवाल है और इसका जवाब तथ्यों, पारदर्शिता और जांच के माध्यम से ही मिलना चाहिए, आरोप-प्रत्यारोप के माध्यम से नहीं।

नौ सूत्री मांग

संबद्ध महाविद्यालयों से जुड़े शिक्षक और कर्मचारियों की समस्याओं को लेकर FACTNEB की ओर से नौ सूत्री मांगों के माध्यम से सरकार का ध्यान आकर्षित किया जा रहा है। इनमें कॉलेजों के अधिकार, स्वायत्तता और आर्थिक सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे शामिल हैं। प्रस्तावित विश्वविद्यालय अधिनियम-2026 को लेकर भी स्वायत्तता की रक्षा का सवाल उठाया गया है। संगठनों का कहना है कि विश्वविद्यालय और महाविद्यालयों की अकादमिक एवं प्रशासनिक स्वायत्तता प्रभावित नहीं होनी चाहिए। यदि किसी नए कानून से उच्च शिक्षा संस्थानों की स्वायत्तता कमजोर होती है तो सरकार को शिक्षक, कर्मचारी, विद्यार्थियों और शिक्षा विशेषज्ञों के साथ व्यापक विमर्श करना चाहिए।

सरकार के सामने यक्ष प्रश्न

सरकार के सामने यक्ष प्रश्न यही है कि यदि वित्त रहित कर्मचारी वर्षों से बिहार के विद्यार्थियों को शिक्षा दे रहे हैं, तो उन्हें नियमित वेतनमान और आर्थिक सुरक्षा देने की दिशा में स्थायी समाधान क्यों नहीं खोजा जा रहा? सरकार की जिम्मेदारी है कि इस विवाद का समाधान आंदोलनकारियों से संवाद करके निकाले। सरकार को आंदोलन को केवल दबाव की राजनीति के रूप में नहीं देखना चाहिए। सरकार यदि वास्तव में उच्च शिक्षा को मजबूत करना चाहती है तो उसे नई संस्थाएं खोलने के साथ-साथ पहले से स्थापित संस्थानों को मजबूत करने पर भी ध्यान देना होगा। आधुनिक प्रयोगशालाएं, डिजिटल पुस्तकालय, स्मार्ट कक्षाएं, शोध सुविधाएं, पर्याप्त शिक्षक और नियमित आर्थिक संसाधन किसी भी उच्च शिक्षण संस्थान की बुनियादी जरूरत हैं।

बिहार को ऐसे उच्च शिक्षा मॉडल की आवश्यकता है जिसमें विद्यार्थी को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिले, शिक्षक को सम्मानजनक और सुरक्षित रोजगार मिले तथा संस्थान को पारदर्शी और पर्याप्त वित्तीय संसाधन उपलब्ध हों। वित्त रहित शिक्षा व्यवस्था ने दशकों तक बिहार में उच्च शिक्षा की लौ जलाए रखी है। अब सरकार की जिम्मेदारी है कि उस लौ को बुझने न दे। बिहार की उच्च शिक्षा को मजबूत करने का रास्ता टकराव से नहीं, संवाद, पारदर्शिता, जवाबदेही और स्थायी समाधान से निकलेगा। सरकार को यह तय करना होगा कि वह इन कॉलेजों को बोझ मानती है या बिहार के उच्च शिक्षा तंत्र की उस महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में देखती है, जिसने दशकों से सीमित संसाधनों में लाखों विद्यार्थियों का भविष्य संवारा है।

(लेखक, हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

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हिन्दुस्थान समाचार / अरविन्द नाथ तिवारी