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एफसीआरए: धन का “दान” चाहिए, “दानव” नहीं

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एफसीआरए: धन का “दान” चाहिए, “दानव” नहीं


-विनोद बंसल

भारत में विदेशी धन के प्रवेश और उसके उपयोग को लेकर बहस नई नहीं है। लंबे समय से विदेशी सहायता से चलने वाले अनेक संगठन देश में शिक्षा, स्वास्थ्य, आपदा राहत, सामाजिक सेवा, धार्मिक गतिविधियों और शोध जैसे अनेक महत्वपूर्ण कार्य करते रहे हैं। ऐसे सभी वैध और पारदर्शी कार्यों का स्वागत होना चाहिए लेकिन प्रश्न तब उठता है जब विदेशी धन का प्रयोग घोषित उद्देश्यों से हटकर राजनीतिक प्रभाव, सामाजिक अस्थिरता, धर्मांतरण व अवैध गतिविधियों अथवा भारत के राष्ट्रीय हितों के प्रतिकूल कार्यों के लिए होने लगे।

इसी मूल चिंता को ध्यान में रखते हुए ही विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम यानि फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट (FCRA) बनाया गया। इसे पहली बार आपातकाल (Emergency) के दौरान वर्ष 1976 में बनाया गया था जिसका मूल उद्देश्य उस समय विदेशी फंडिंग और राजनीतिक गतिविधियों पर नजर रखना था। बाद में साल 2010 में पुराने कानून को बदलकर एक नया और अधिक सख्त FCRA 2010 अधिनियमित किया गया, जो 1 मई 2011 से प्रभावी हुआ। इस विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम का उद्देश्य विदेशी धन पर पूर्ण प्रतिबंध लगाना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि भारत में आने वाला विदेशी धन पारदर्शी तरीके से प्राप्त हो और उसी उद्देश्य के लिए खर्च हो जिसके लिए उसे अनुमति दी गई है।

एफसीआरए संशोधन को समझने की आवश्यकता

प्रस्तावित कानून को संसद के इसी सत्र में सदन में पेश किए जाने की चर्चा आजकल जोरों पर है। विधेयक का एक महत्वपूर्ण प्रावधान उन संस्थाओं की विदेशी धन से बनी संपत्तियों और विदेशी योगदान के संबंध में व्यवस्था तैयार करना है जिनका FCRA प्रमाणपत्र रद्द हो जाता है, संस्था स्वयं उसे वापस कर देती है अथवा उसका नवीनीकरण नहीं होता। इसके लिए एक Designated Authority (निर्दिष्ट प्राधिकारी) की व्यवस्था प्रस्तावित है जो ऐसी स्थिति में संपत्तियों के अस्थायी नियंत्रण, उनके प्रबंधन और आगे की व्यवस्था देखेगी। यदि संस्था निर्धारित प्रक्रिया के तहत अपना FCRA पंजीकरण बहाल करा लेती है तो संपत्तियों और अप्रयुक्त विदेशी धन की वापसी का प्रावधान भी है। विधेयक का प्रावधान यह भी कहता है कि यदि इन संपत्तियों में कोई धर्मस्थल आता है तो वहाँ के धार्मिक कार्यकलापों को यथावत जारी रखा जाएगा।

विधेयक में एक और महत्वपूर्ण बदलाव दंड व्यवस्था से जुड़ा है। मौजूदा अधिकतम पांच वर्ष की सजा को घटाकर इसे एक वर्ष करने का प्रस्ताव है। साथ ही निर्दिष्ट प्राधिकारी के आदेश के विरुद्ध पुनरीक्षण और न्यायिक अपील का रास्ता भी प्रस्तावित किया गया है। अर्थात इसे केवल “विदेशी संस्थाओं पर कार्रवाई” के रूप में देखना अधूरा होगा। असल मुद्दा विदेशी धन के साथ जवाबदेही, पारदर्शिता और राष्ट्रीय हित का है।

विदेशी धन पर निगरानी क्यों जरूरी

किसी भी संप्रभु राष्ट्र के लिए यह सामान्य बात है कि वह अपने देश में आने वाले विदेशी धन के स्रोत और उपयोग पर निगरानी रखे। भारत अकेला देश नहीं है जो ऐसा करता है। अमेरिका सहित अनेक देशों में विदेशी धन, विदेशी एजेंटों, विदेशी संस्थाओं और राजनीतिक प्रभाव से संबंधित अलग-अलग कानून और व्यवस्थाएं हैं। इसलिए भारत द्वारा अपने यहां विदेशी योगदान के लिए नियमन तय करना किसी धर्म या समुदाय के विरुद्ध कार्रवाई मानना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं है।

पहले भी अनेक संशोधन हुए

इस कानून में संशोधन भी कोई पहली बार नहीं हो रहा। इससे पूर्व वर्ष 1984, 2010, 2016, 2018, 2020 व 2022 में भी इस कानून में विभिन्न पूर्ववर्ती सरकारों द्वारा संशोधन किए गए। बल्कि वर्ष 2010 में तो इस कानून को पूरी तरह से निरस्त कर एक नया और कठोर कानून बनाया गया था।

आंकड़े बताते हैं कि समस्या काल्पनिक नहीं है। गृह मंत्रालय के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 2016 से 2020 के बीच ही 6,600 से अधिक गैर सरकारी संस्थाओं के FCRA पंजीकरण रद्द किए गए थे। एक अन्य आँकड़े के अनुसार विदेशी पैसों से चलने वाले कुल 52,156 एनजीओ व संस्थानों में से अभी सिर्फ 14,435 ही सक्रिय हैं। 22,496 के पंजीयन रद्द किए जा चुके हैं तथा 15,225 पूरी तरह से निष्क्रिय हैं। नियमानुसार, पंजीकरण रद्द होने के बाद ऐसी संस्थाएं FCRA के अंतर्गत विदेशी योगदान प्राप्त या उपयोग नहीं कर सकतीं। इसलिए इन सभी संस्थाओं को अपने पंजीयन को नवीनीकृत कराना ही चाहिए।

कार्रवाई के उदाहरण

ग्रीन पीस इंडिया पर 2015 में FCRA नियमों के उल्लंघन के कई आरोप लगे थे। इनमें विदेशी योगदान के निर्धारित बैंक खाते से बाहर लेन-देन, योगदान की गलत/कम रिपोर्टिंग, प्रशासनिक खर्च की सीमा से अधिक व्यय, विदेशी NGO से भारतीय NGOs/activists के कानूनी खर्च को सहायता और अन्य अनुपालन संबंधी मुद्दे शामिल थे। गृह मंत्रालय ने जांच के बाद उसका पंजीकरण निलंबित किया और आगे कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू की। इसी प्रकार 2025 में लद्दाख स्थित स्टूडेंट्स एजुकेशन एंड कल्चरल मूवमेन्ट ऑफ लद्दाख (SECMOL), का FCRA लाइसेंस भी गृह मंत्रालय द्वारा रद्द किया गया था। देशभर में ऐसे सैकड़ों उदाहरण हैं।

यह भी समझना चाहिए कि हर विदेशी फंड लेने वाली संस्था संदिग्ध नहीं है। भारत में अनेक संस्थाएं विदेशी सहायता के माध्यम से अस्पताल, विद्यालय, अनाथालय, आपदा राहत, ग्रामीण विकास, शोध, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं और अन्य सामाजिक कार्य करती हैं। FCRA का उद्देश्य ऐसी वैध गतिविधियों को समाप्त करना नहीं अपितु उसे संरक्षण देना है। सरकार की मंशा है कि वैध विदेशी सहायता का तो स्वागत होगा लेकिन विदेशी धन के दुरुपयोग को किसी भी तरह बर्दास्त नहीं किया जाएगा। जो संस्था नियमों का पालन करती है तथा पारदर्शी तरीके से हिसाब देती है, उसे या उसके प्रति किसी अन्य को संदेह का कोई कारण नहीं। आखिर धन की आवश्यकता तो सभी व्यक्तियों समाज और सरकारों को है।

ईसाई संस्थाओं द्वारा इतना भ्रम और विरोध क्यों

इस अधिनियम में हो रहे संशोधन को लेकर सबसे अधिक राजनीतिक विवाद इस बात पर पैदा करने का प्रयास किया जा रहा है कि इसका निशाना चर्च या ईसाई संस्थाएं हैं। वास्तव में FCRA का ढांचा ना तो किसी एक धर्म विशेष के लिए बनाया गया और ना ही किसी धर्म का उसमें जिक्र है। हाँ, धार्मिक गतिविधियों से जुड़े संगठन भी तभी विदेशी योगदान प्राप्त कर सकते हैं, जब वे कानून की निर्धारित शर्तों का पालन करें। हालांकि, पीछे अनेक मामलों में चर्च व उससे जुड़ी अनेक संस्थाओं द्वारा विदेशी धन का दुरुपयोग करते हुए किस प्रकार भारत की धर्म-प्राण जनता का अवैध रूप से धर्मांतरण किया जा रहा था, यह विषय भी किसी से छुपा नहीं है। कानून को धता बताते हुए देश के अनुसूचित क्षेत्रों में बने अनेक अवैध चर्च, मस्जिदें, मदरसे तथा अन्य मजहबी संस्थान तथा उनकी कारगुजारियाँ भी सर्व विदित हैं। शायद इसीलिए उन्हीं के मन में डर है जिनको पकड़े जाने का भय है!

हमारे यहाँ यदि कोई संस्था ईमानदारी से धार्मिक, शैक्षणिक या सामाजिक सेवा कर रही है और विदेशी धन का वैधानिक उपयोग कर रही है, तो उसे केवल विदेशी सहायता प्राप्त करने के कारण संदेह की दृष्टि से नहीं देखा जाता अपितु उसका सार्वजनिक सम्मान किया जाता है। किन्तु यह भी स्पष्ट रहे कि किसी की धार्मिक पहचान उस संस्था को भारतीय कानूनों से ऊपर भी नहीं रख सकती। यदि हम सही हैं तो कानून का विरोध क्यों और उससे डरने या डराने के प्रपंच क्यों!

विदेशी धन बनाम विदेशी प्रभाव

असल बहस विदेशी धन को रोकने या अनुमति देने की नहीं अपितु, उस धन के माध्यम से हो रहे विदेशी प्रभाव को समझने की है। विदेश से आया पैसा यदि किसी अस्पताल में मरीज का इलाज करता है, किसी गरीब बच्चे की शिक्षा में लगता है, किसी प्राकृतिक आपदा में राहत पहुंचाता है या किसी वैज्ञानिक शोध में उपयोग होता है, तो वह मानव कल्याण का माध्यम हो सकता है। लेकिन यदि वही पैसा देश के भोले भाले लोगों के अवैध धर्मांतरण करने, उसकी सामाजिक संरचना को प्रभावित करने, राजनीतिक वातावरण को निर्देशित करने, हिंसक अथवा विघटनकारी गतिविधियों को बढ़ावा देने या स्वदेशी कानून को तोड़ने के लिए प्रयोग किया जाता है, तो वह अस्वीकार्य है।

देश में विदेशी धन की प्रयोगकर्ता प्रत्येक संस्था को भी-

- विदेशी धन का पूरा स्रोत बताना चाहिए।

- प्राप्त धन और खर्च का सही हिसाब देना चाहिए।

- निर्धारित बैंकिंग व्यवस्था का पालन करना चाहिए।

- विदेशी योगदान को निर्धारित उद्देश्य व क्षेत्र के लोगों में ही खर्च करना चाहिए।

- संबंधित दस्तावेज और लेखे समय पर प्रस्तुत करने चाहिए।

- विदेशी दान और भारतीय संस्था के बीच किसी भी संदिग्ध वित्तीय या राजनीतिक संबंध को छिपाना नहीं चाहिए। यही तो वास्तविक पारदर्शिता है।

देशी और कुछ विदेशी शक्तियों द्वारा नागरिकता संशोधन अधिनियम के विरोध में जिस प्रकार का भ्रम और दुष्प्रचार फैलाया गया वैसे ही कुछ पादरी, चर्च, भड़काऊ भाईजान और कुछ अन्य संस्थाएं आजकल भारत विरोधी ऐसे झूठे अभियान चला रही हैं जिनसे देश को सावधान रहना होगा। देश में विदेशी धन आए लेकिन भारतीय कानून के रास्ते से। सेवा हो लेकिन पारदर्शिता के साथ। धार्मिक या सामाजिक कार्य भी हों लेकिन संविधान और कानून के दायरे में रहकर। हमारे राष्ट्रीय हितों से खिलवाड़ करने वाले किसी भी विदेशी धन पर बिना भेदभाव, बिना दबाव और बिना डर के कठोर कार्रवाई होनी ही चाहिए। यही एक संप्रभु और आत्मविश्वासी भारत की नीति है।

(लेखक, विहिप के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं।)

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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी