जंतर-मंतर पर प्रदर्शनों के खर्च से वित्तीय पारदर्शिता पर उठते सवाल
डाॅ. अरविंद नाथ तिवारी
जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी के पिछले दिनों हुए तीन प्रदर्शनों के खर्च को लेकर राजनीतिक और बौद्धिक हलकों में चर्चा हो रही है। मुख्य सवाल यह है कि इन आयोजनों के लिए धन कहां से जुटाया जा रहा है? क्या आम लोगों के छोटे-छोटे स्वैच्छिक योगदान से ऐसे प्रदर्शन आयोजित किए जा सकते हैं या इसके पीछे कोई दूसरी आर्थिक व्यवस्था भी है? इन सवालों का जवाब आरोपों और अनुमानों के बजाय तथ्यों तथा वित्तीय पारदर्शिता के आधार पर तलाशना जरूरी है। लोकतंत्र में किसी भी राजनीतिक संगठन को सरकार की नीतियों के विरोध में प्रदर्शन करने और जनसमर्थन जुटाने का अधिकार है। साथ ही, उसके आर्थिक संसाधनों और खर्च को लेकर सवाल उठाना भी स्वाभाविक है। विशेषकर तब, जब सीमित संसाधनों के बावजूद बड़े आयोजन किये जाने की चर्चा हो, हालांकि केवल प्रदर्शन में जुटी भीड़ देखकर किसी संदिग्ध वित्तीय स्रोत का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
मीडिया में उपलब्ध जानकारियों के अनुसार, कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने बोस्टन यूनिवर्सिटी से पब्लिक रिलेशंस में मास्टर डिग्री हासिल की है। संगठन की स्थापना से पहले उन्होंने आम आदमी पार्टी की डिजिटल मीडिया टीम के साथ काम किया और दिल्ली सरकार के शिक्षा विभाग में संचार सलाहकार के रूप में भी सेवाएं दीं। उनकी यह पृष्ठभूमि राजनीतिक संचार, जनसंपर्क और मीडिया प्रबंधन के क्षेत्र में अनुभव को दर्शाती है लेकिन इससे उनकी वर्तमान आय, निजी आर्थिक स्थिति या संगठन के कार्यक्रमों में उनके व्यक्तिगत योगदान की जानकारी नहीं मिलती। इसी प्रकार, पार्टी के मुख्य प्रवक्ता बताए जाने वाले सौरभ दास स्वतंत्र खोजी पत्रकार और सूचना का अधिकार कार्यकर्ता के रूप में काम करते हैं। उपलब्ध विवरणों के अनुसार, उनकी आय का संबंध पत्रकारिता और विभिन्न मीडिया मंचों के लिए लेखन से है। वहीं, संगठन के रणनीतिकार और प्रवक्ता के रूप में चर्चित आशुतोष रांका आईआईटी कानपुर से पढ़े हैं और लंदन में मैकिन्से में सलाहकार के तौर पर काम कर चुके हैं। वह दिल्ली असेंबली फेलोशिप सहित जनहित से जुड़े कार्यों में भी भागीदारी कर चुके हैं। इन तीनों की शैक्षणिक और पेशेवर योग्यताएं उनके अनुभव का परिचय देती हैं लेकिन इनके आधार पर संगठन की आर्थिक क्षमता या किसी संदिग्ध वित्तीय स्रोत की पुष्टि नहीं की जा सकती। इसके लिए आय, व्यय और चंदे से संबंधित ठोस जानकारी आवश्यक है।
छोटे चंदे से बड़े आयोजन कितने संभव?
कॉकरोच जनता पार्टी की ओर से कथित तौर पर कहा जाता है कि प्रदर्शनों का खर्च स्थल पर रखे दानपात्र, आम लोगों के स्वैच्छिक योगदान और शुभचिंतकों की सहायता से पूरा किया जाता है। कुछ लोगों को यह व्यवस्था बड़े आयोजनों के खर्च के लिहाज से अपर्याप्त लग सकती है। लेकिन इस आशंका की पुष्टि के लिए वास्तविक खर्च और जुटाई गई राशि का विवरण जरूरी है। किसी प्रदर्शन की लागत प्रतिभागियों की संख्या, परिवहन, प्रचार सामग्री, ध्वनि उपकरण, बैनर, भोजन, पानी और आयोजन की अवधि पर निर्भर करती है। यदि प्रतिभागी अपने खर्च पर पहुंचते हैं, स्वयंसेवक बिना पारिश्रमिक काम करते हैं और प्रचार के लिए डिजिटल माध्यमों का उपयोग होता है तो लागत कम भी हो सकती है। इसके विपरीत, व्यापक व्यवस्थाओं वाले कार्यक्रमों में खर्च बढ़ सकता है। इसलिए सवाल यह नहीं कि प्रदर्शन बड़ा था तो धन का स्रोत भी असामान्य ही होगा। असल सवाल यह है कि आयोजनों पर कितना खर्च हुआ, धन किस माध्यम से मिला और उसका हिसाब किस प्रकार रखा गया।
बैंक खाते और विदेशी फंडिंग का सवाल
चर्चा में यह दावा भी सामने आता है कि संगठन का कोई पंजीकृत बैंक खाता नहीं है और उसे विदेशी फंडिंग नहीं मिलती। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि के बिना इन्हें अंतिम तथ्य मानना उचित नहीं होगा। संगठन का पंजीकरण, बैंक खाते का संचालन, चंदा स्वीकार करने के नियम और विदेशी स्रोतों से धन प्राप्त करने की पात्रता अलग-अलग विषय हैं।
भारत में विदेशी अंशदान प्राप्त करने के लिए विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (एफसीआरए) के प्रावधान लागू होते हैं। किसी संगठन को विदेशी धन मिलने के आरोप की पुष्टि राजनीतिक संबंधों, विचारधारा या किसी नेता के पुराने पेशेवर जुड़ाव से नहीं की जा सकती। इसके लिए वित्तीय दस्तावेज, बैंकिंग रिकॉर्ड या सक्षम एजेंसियों की जांच जैसे ठोस आधार चाहिए। यदि संगठन छोटे स्वैच्छिक योगदान से कार्यक्रम आयोजित करता है तो आयोजनवार खर्च, प्राप्त चंदे और भुगतान का विवरण सार्वजनिक करना उसके लिए उपयोगी होगा। इससे समर्थकों का भरोसा बढ़ेगा और आलोचकों के सवालों का तथ्यपरक जवाब भी मिलेगा।
विदेशी हाथ की आशंका और बांग्लादेश का उदाहरण
कुछ लोगों की ओर से यह आशंका भी व्यक्त की जा रही है कि अभिजीत दीपके के आम आदमी पार्टी की डिजिटल मीडिया टीम में काम करने और कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शनों के बीच कोई बाहरी राजनीतिक प्रभाव तो नहीं है। बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन की घटनाओं के संदर्भ में अमेरिका की भूमिका को लेकर व्यक्त संदेह भी इस चर्चा से जोड़े जा रहे हैं। हालांकि, इन दोनों बातों को जोड़कर भारत में किसी संगठन के प्रदर्शन के पीछे विदेशी हाथ होने का निष्कर्ष निकालना तर्कसंगत नहीं है। बांग्लादेश की राजनीतिक घटनाओं को लेकर व्यक्त आशंकाएं अपने आप में भारत में किसी संगठन को विदेशी सहायता मिलने का प्रमाण नहीं हैं। इसी तरह, किसी राजनीतिक दल की डिजिटल मीडिया टीम में काम करने का पूर्व अनुभव भी विदेशी फंडिंग या बाहरी निर्देशों का सबूत नहीं है। विदेशी हस्तक्षेप की आशंका को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता लेकिन उसकी जांच प्रमाणों के आधार पर ही होनी चाहिए। संगठित प्रचार और बड़े प्रदर्शनों को देखकर सवाल उठाना स्वाभाविक है, मगर सवाल उठाने और आरोप सिद्ध करने के बीच स्पष्ट अंतर है।
पारदर्शिता से दूर होगा संदेह
कॉकरोच जनता पार्टी अपने तीनों प्रदर्शनों के खर्च, चंदे के स्रोत और नकद तथा डिजिटल योगदान का विवरण सार्वजनिक करके इस चर्चा को तथ्यपरक दिशा दे सकती है। दूसरी ओर, मीडिया और आलोचकों की जिम्मेदारी है कि वे अपुष्ट आरोपों को तथ्य के रूप में प्रस्तुत न करें। अंततः इस प्रकरण का समाधान न अंधसमर्थन में है और न ही बिना प्रमाण संदेह करने में। जरूरत है आय-व्यय के स्पष्ट हिसाब, वित्तीय स्रोतों की विश्वसनीय जानकारी और अनियमितता के प्रमाण मिलने पर निष्पक्ष जांच की। लोकतंत्र में प्रदर्शन की स्वतंत्रता जितनी महत्त्वपूर्ण है, उतनी ही जरूरी सार्वजनिक जीवन में जवाबदेही भी है। इसलिए सबसे अहम सवाल यही है कि राजनीतिक संगठनों के वित्तीय स्रोतों में पारदर्शिता कैसे सुनिश्चित की जाय।
(लेखक, हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / अरविन्द नाथ तिवारी

