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अन्न से ऊर्जा तक आत्मनिर्भर भारत की नई क्रांति का नाम है ई-20

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अन्न से ऊर्जा तक आत्मनिर्भर भारत की नई क्रांति का नाम है ई-20


डॉ. मयंक चतुर्वेदी

भारतीय इतिहास के सबसे कठिन अध्यायों में वर्ष 1965-66 का वह दौर गिना जाता है, जब देश की जनसंख्या तेजी से बढ़ रही थी, किंतु खेतों की पैदावार उतनी नहीं थी कि हर नागरिक का पेट भर सके। भारत को अमेरिका से पीएल-480 (PL-480) योजना के तहत गेहूं आयात करना पड़ता था। विदेशी जहाजों पर आने वाले अनाज का इंतजार करना उस समय की मजबूरी थी। तब शायद ही किसी ने कल्पना की होगी कि यही भारत कुछ दशकों बाद दुनिया के सबसे बड़े खाद्यान्न उत्पादक देशों में शामिल होगा और कई देशों को अनाज निर्यात भी करेगा।

अब प्रश्न यह है कि क्या यह परिवर्तन किसी चमत्कार से आया ? निश्चित ही नहीं, चमस्कार नहीं श्रम एवं वैज्ञानिक परिश्रम से अवश्य आया था। इसके पीछे वर्षों तक चले वैज्ञानिक अनुसंधान, दूरदर्शी नीतियां, किसानों का परिश्रम रहा है। आज भारत एक बार फिर उसी प्रकार के परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार चुनौती भोजन की न होकर ऊर्जा जरूरतों की है।

फिलहाल देश का जो परिदृष्य है, वह पहले कभी खाद्यान्न के लिए विदेशों पर निर्भर रहने के समान ही मौजूद है। आज भी अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए लगभग 88 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करना पड़ रहा है। यही कारण है कि जब भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ती हैं, उसका सीधा प्रभाव भारत की अर्थव्यवस्था, विदेशी मुद्रा भंडार और आम नागरिक की जेब पर पड़ता है।

ऐसे समय में ई20 अर्थात 20 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल कहना होगा कि एक नया ईंधन भारत की ऊर्जा आत्मनिर्भरता की उस लंबी यात्रा का प्रारंभिक चरण है, जो आने वाले वर्षों में देश की आर्थिक और रणनीतिक स्थिति को बदल सकता है। दुर्भाग्य यह है कि जिस पहल को उसके व्यापक राष्ट्रीय संदर्भ में समझा जाना चाहिए, वह सोशल मीडिया पर फैली अधूरी जानकारियों और भ्रामक दावों के कारण विवाद का विषय बनती जा रही है।

जब हर नई पहल का विरोध हुआ, लेकिन समय ने उसे सही साबित किया

भारतीय विकास यात्रा का इतिहास बताता है कि लगभग हर बड़े परिवर्तन का प्रारंभ संदेह और विरोध के बीच हुआ। जब हरित क्रांति शुरू हुई, तब भी अनेक विशेषज्ञों ने आशंका जताई थी कि नई किस्म के बीज और रासायनिक उर्वरक भारतीय खेती को नुकसान पहुंचाएंगे। जब श्वेत क्रांति की शुरुआत हुई तो यह कहा गया कि गांवों में संगठित दुग्ध उत्पादन संभव नहीं होगा। डिजिटल भुगतान प्रणाली आई तो अनेक लोगों ने इसे अव्यावहारिक बताया। आज यही भारत दुनिया के सबसे बड़े डिजिटल भुगतान नेटवर्क का संचालन कर रहा है।

इसी प्रकार एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल को लेकर भी अनेक आशंकाएं व्यक्त की जा रही हैं। कोई इसे पुराने वाहनों के लिए नुकसानदायक बता रहा है, कोई इसे इंजन खराब करने वाला ईंधन कह रहा है, तो कोई इसे केवल सरकारी प्रयोग बताकर खारिज करने का प्रयास कर रहा है, लेकिन यदि तथ्यों और वैज्ञानिक अध्ययनों पर नजर डालें तो तस्वीर बिल्कुल अलग दिखाई देती है।

ई20 कोई प्रयोग नहीं, 25 वर्षों की सुनियोजित तैयारी का परिणाम

अक्सर ऐसा प्रचार किया जाता है कि भारत ने अचानक पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथेनॉल मिलाने का निर्णय ले लिया, जबकि वास्तविकता यह है कि इस दिशा में काम वर्ष 2001 में ही शुरू हो गया था। सबसे पहले सीमित स्तर पर एथेनॉल मिश्रण का परीक्षण किया गया। वर्ष 2004 में इसे औपचारिक कार्यक्रम का स्वरूप मिला और 2006 तक कई राज्यों में पांच प्रतिशत मिश्रण वाला ईंधन उपलब्ध कराया जाने लगा,

उसके बाद भी सरकार ने जल्दबाजी नहीं दिखाई। लगभग दो दशकों तक उत्पादन क्षमता बढ़ाने, वैज्ञानिक परीक्षण करने, ऑटोमोबाइल कंपनियों से परामर्श लेने, नई डिस्टिलरियां स्थापित करने और किसानों को एथेनॉल उत्पादन से जोड़ने की दिशा में लगातार काम किया गया। वर्ष 2018 की राष्ट्रीय जैव ईंधन नीति और 2021 में जारी ई20 रोडमैप इस पूरी प्रक्रिया के महत्वपूर्ण पड़ाव बने। यानी जिस निर्णय को आज लोग अचानक लागू हुई नीति समझ रहे हैं, उसके पीछे लगभग पच्चीस वर्षों की तैयारी, हजारों करोड़ रुपये का निवेश और हजारों वैज्ञानिकों, इंजीनियरों, कृषि विशेषज्ञों तथा उद्योग जगत का साझा प्रयास है।

ऊर्जा सुरक्षा क्यों बन गई राष्ट्रीय आवश्यकता?

भारत आज विश्व की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। उद्योग बढ़ रहे हैं, वाहन बढ़ रहे हैं, सड़कें बढ़ रही हैं और ऊर्जा की मांग भी लगातार बढ़ रही है, किंतु इसके साथ एक बड़ी चुनौती भी जुड़ी हुई है, वह है कच्चे तेल का आयात।

देश अपनी आवश्यकता का अधिकांश कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है। इसका अर्थ यह है कि पश्चिम एशिया में युद्ध हो, वैश्विक आपूर्ति बाधित हो या अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें बढ़ जाएं, उसका सीधा असर भारत पर पड़ता है। यही कारण है कि ऊर्जा आत्मनिर्भरता आज राष्ट्रीय सुरक्षा का भी विषय बन चुकी है।

यहीं से ई20 जैसी पहल का महत्व बढ़ जाता है। यदि पेट्रोल का 20 प्रतिशत हिस्सा भारत के खेतों से उत्पादित एथेनॉल से पूरा होने लगे तो विदेशी तेल पर निर्भरता धीरे-धीरे कम होगी। इससे विदेशी मुद्रा की बचत होगी, किसानों को नया बाजार मिलेगा और ऊर्जा आपूर्ति का एक बड़ा हिस्सा देश के भीतर ही तैयार होगा।

अन्नदाता से ऊर्जादाता बनने की शुरुआत

वास्तव में इस बात के लिए सभी को खुश होना चाहिए कि भारत के किसान दशकों से देश का पेट भरते आए हैं। अब पहली बार उन्हें ऊर्जा अर्थव्यवस्था का भी महत्वपूर्ण भागीदार बनाया जा रहा है। गन्ने के साथ-साथ मक्का, चावल और अन्य कृषि आधारित स्रोतों से बनने वाला एथेनॉल किसानों की आय का नया माध्यम बन रहा है। यह परिवर्तन ग्रामीण भारत को देश की ऊर्जा सुरक्षा से जोड़ने का प्रयास है। जिस प्रकार हरित क्रांति ने किसानों को खाद्यान्न उत्पादन का नायक बनाया था, उसी प्रकार एथेनॉल मिशन उन्हें ऊर्जा उत्पादन का भी सहभागी बना रहा है।

सोशल मीडिया के शोर से परे वैज्ञानिक दृष्टि की आवश्यकता

आज सूचना का सबसे बड़ा स्रोत सोशल मीडिया बन गया है, किंतु यही सबसे बड़ा भ्रम भी पैदा कर सकता है। किसी एक व्यक्ति का व्यक्तिगत अनुभव पूरे देश की वास्तविकता नहीं हो सकता। सार्वजनिक नीति का मूल्यांकन वैज्ञानिक परीक्षणों, संस्थागत अध्ययनों और व्यापक आंकड़ों के आधार पर किया जाता है।

ई20 को लेकर भी यही दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है। इसे किसी राजनीतिक बहस या सोशल मीडिया ट्रेंड के रूप में देखने के बजाय भारत की दीर्घकालिक ऊर्जा नीति के रूप में समझना होगा। जिस प्रकार हरित क्रांति के परिणाम एक-दो वर्ष में नहीं दिखाई दिए थे, उसी प्रकार ऊर्जा आत्मनिर्भरता की यह यात्रा भी धैर्य, वैज्ञानिक सोच और निरंतर निवेश की मांग करती है।

क्या पुराने वाहनों को नुकसान पहुंचाता है ई20?

ई20 को लेकर सबसे बड़ी आशंका यही व्यक्त की जाती है कि इससे पुराने वाहनों के इंजन खराब हो जाएंगे। सोशल मीडिया पर ऐसे अनेक वीडियो और संदेश प्रसारित किए जा रहे हैं जिनमें दावा किया जाता है कि एथेनॉल इंजन, रबर पाइप और फ्यूल सिस्टम को नुकसान पहुंचाता है, लेकिन जब इन दावों की तुलना वैज्ञानिक परीक्षणों और वास्तविक आंकड़ों से की जाती है तो तस्वीर अलग दिखाई देती है।

पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय के अनुसार ई20 लागू करने से पहले 40 हजार किलोमीटर से अधिक व्यापक परीक्षण किए गए। इन परीक्षणों में इंजन की कार्यक्षमता, रबर पार्ट्स, फ्यूल लाइन, धातु पर जंग, उत्सर्जन, ईंधन दक्षता और टिकाऊपन जैसे सभी पहलुओं की जांच की गई। परीक्षणों में ऑटोमोबाइल उद्योग, अनुसंधान संस्थानों तथा तेल कंपनियों की भी सक्रिय भागीदारी रही।

इतना ही नहीं, करोड़ों वाहनों की सर्विसिंग के दौरान भी ई20 के कारण इंजन खराब होने या बड़े स्तर पर तकनीकी समस्या के प्रमाण नहीं मिले। यदि वास्तव में यह ईंधन व्यापक रूप से नुकसानदायक होता तो वाहन कंपनियों के पास लाखों वारंटी क्लेम आते और पूरे ऑटोमोबाइल उद्योग में गंभीर संकट खड़ा हो जाता। ऐसा नहीं हुआ। इससे स्पष्ट होता है कि व्यक्तिगत अनुभव और वैज्ञानिक निष्कर्षों के बीच अंतर समझना आवश्यक है।

माइलेज का सवाल

ई20 को लेकर दूसरा बड़ा तर्क माइलेज का दिया जाता है। सरकार स्वयं स्वीकार करती है कि कुछ वाहनों में तीन से पांच प्रतिशत तक माइलेज कम हो सकता है, किंतु क्या किसी ईंधन का मूल्यांकन केवल माइलेज के आधार पर किया जा सकता है? क्योंकि एथेनॉल की ऑक्टेन रेटिंग अधिक होती है। इससे इंजन में बेहतर दहन होता है, एंटी-नॉक क्षमता बढ़ती है, इंजन की कार्यक्षमता सुधरती है और प्रदूषण कम होता है। भविष्य में जैसे-जैसे वाहन निर्माता E20 को ध्यान में रखकर इंजन डिजाइन करेंगे, वैसे-वैसे प्रदर्शन और बेहतर होने की संभावना है। इसलिए E20 को केवल माइलेज के चश्मे से देखना उसके व्यापक लाभों की अनदेखी करना होगा।

पेट्रोल सस्ता क्यों नहीं हुआ?

आम नागरिक का यह प्रश्न पूरी तरह स्वाभाविक है कि यदि पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथेनॉल मिलाया जा रहा है तो कीमत कम क्यों नहीं हुई? दरअसल, यह धारणा पूरी तरह सही नहीं कि एथेनॉल हमेशा पेट्रोल से सस्ता होता है। भारत में एथेनॉल की खरीद किसानों को उचित मूल्य देने की नीति के तहत की जाती है। इसके साथ परिवहन, भंडारण, गुणवत्ता परीक्षण और कर जैसे कई खर्च जुड़े होते हैं, इसलिए अनेक परिस्थितियों में इसकी वास्तविक लागत पेट्रोल के बराबर या उससे अधिक भी हो सकती है।

फिर E20 का उद्देश्य पेट्रोल को सस्ता करना नहीं है, इसका मूल उद्देश्य भारत को अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार के उतार-चढ़ाव से बचाना है। यदि पेट्रोल का एक बड़ा हिस्सा देश में ही उत्पादित एथेनॉल से पूरा होगा तो वैश्विक संकटों के दौरान भारत पर उसका प्रभाव अपेक्षाकृत कम पड़ेगा। यही इस नीति का सबसे बड़ा आर्थिक आधार है।

शुद्ध पेट्रोल का विकल्प क्यों नहीं रखा गया?

कई लोग यह भी पूछते हैं कि यदि किसी को ई20 नहीं चाहिए तो उसे शुद्ध पेट्रोल क्यों नहीं दिया जाता?

पहली नजर में यह सुझाव सरल लगता है, किंतु व्यवहार में ऐसा करना अत्यंत कठिन है। भारत में एक लाख से अधिक पेट्रोल पंप, विशाल पाइपलाइन नेटवर्क, रिफाइनरियां, टर्मिनल और डिपो हैं। यदि प्रत्येक स्थान पर शुद्ध पेट्रोल, ई10 और ई20 तीनों की अलग-अलग व्यवस्था करनी पड़े तो भंडारण, परिवहन और वितरण की लागत कई गुना बढ़ जाएगी। इससे अंततः उपभोक्ता पर ही अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ेगा, इसलिए सरकार एक समान ईंधन आपूर्ति प्रणाली को अधिक व्यवहारिक मानती है।

किसानों की आय का नया आधार

ई20 की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक यह है कि इसने कृषि और ऊर्जा क्षेत्र को एक-दूसरे से जोड़ दिया है। वर्षों तक किसान केवल खाद्यान्न, गन्ना या अन्य फसलों के उत्पादक माने जाते थे, लेकिन अब वही फसलें देश की ऊर्जा जरूरतों को भी पूरा करने लगी हैं।

सरकार के अनुसार एथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम के माध्यम से किसानों को अब तक लगभग 1.66 लाख करोड़ रुपये का भुगतान किया जा चुका है। यह निश्चित ही ग्रामीण अर्थव्यवस्था को ऊर्जा क्षेत्र से जोड़ने का नया मॉडल है। भविष्य में जैव ईंधन आधारित उद्योगों के विस्तार से ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार और निवेश की नई संभावनाएं भी विकसित होंगी।

विदेशी मुद्रा की बचत और पर्यावरण का लाभ

भारत अपनी आवश्यकता का लगभग 88.5 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। हर वर्ष इस पर लाखों करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा खर्च होती है। एथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम इस निर्भरता को धीरे-धीरे कम करने का प्रयास है।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार इस कार्यक्रम से अब तक लगभग 1.97 लाख करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा की बचत हुई है। साथ ही 316 लाख मीट्रिक टन कच्चे तेल के आयात का स्थान घरेलू एथेनॉल ने लिया है और लगभग 952 लाख मीट्रिक टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में कमी आई है। ऐसे समय में जब पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन की चुनौती से जूझ रही है, भारत का यह प्रयास स्वच्छ ऊर्जा की दिशा में भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

आत्मनिर्भर भारत का अगला अध्याय

भारत की विकास यात्रा बताती है कि कोई भी बड़ी उपलब्धि एक दिन में हासिल नहीं होती। हरित क्रांति ने देश को खाद्यान्न के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने में वर्षों लगाए। श्वेत क्रांति ने भारत को विश्व का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक बनाने में दशकों का समय लिया। डिजिटल क्रांति भी रातों-रात सफल नहीं हुई।

ई20 को भी इसी क्रम में देखा जाना चाहिए। यह ऊर्जा आत्मनिर्भर भारत की लंबी यात्रा का प्रारंभिक चरण है। आने वाले वर्षों में एथेनॉल के साथ-साथ जैव ईंधन, हरित हाइड्रोजन, संपीड़ित बायोगैस, विद्युत गतिशीलता और अन्य स्वदेशी ऊर्जा स्रोत मिलकर भारत की ऊर्जा संरचना को नया स्वरूप देंगे।

भ्रम नहीं, दूरदृष्टि से समझने की जरूरत

किसी भी नई नीति पर प्रश्न उठना लोकतंत्र की स्वाभाविक प्रक्रिया है, पर उन प्रश्नों के उत्तर भी तथ्यों, वैज्ञानिक अध्ययनों और राष्ट्रीय हितों के आधार पर खोजे जाने चाहिए। ई20 को लेकर भी यही दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है।

जिस प्रकार कभी भारत ने दुनिया को यह दिखाया था कि सीमित संसाधनों के बावजूद वह खाद्यान्न के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बन सकता है, उसी प्रकार आज वह ऊर्जा के क्षेत्र में भी आत्मनिर्भरता की नई दिशा तय करने का प्रयास कर रहा है। यदि यह यात्रा अपने निर्धारित लक्ष्य तक पहुंचती है तो आने वाले वर्षों में इतिहास ई20 को भारत की ऊर्जा क्रांति के प्रारंभिक अध्याय के रूप में याद करेगा। निश्चित ही एक ऐसी क्रांति, जिसने खेतों को अन्न का स्रोत बनाए रखने के साथ उन्हें राष्ट्र की ऊर्जा सुरक्षा का भी मजबूत आधार बना दिया।

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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी