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दुर्गा सप्तशती के मंत्रों का गूढ़ रहस्य

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दुर्गा सप्तशती के मंत्रों का गूढ़ रहस्य


दुर्गा सप्तशती के मंत्रों का गूढ़ रहस्य


-डॉ. मयंक चतुर्वेदी

भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में ‘दुर्गा सप्तशती’ जिसे देवीमहात्म्य या चण्डीपाठ के नाम से जाना जाता है, वस्तुत: एक चेतना विज्ञान का अत्यंत गहन और बहुआयामी ग्रंथ है। ‘मार्कण्डेय पुराण’ के अंतर्गत समाहित यह ग्रंथ सात सौ श्लोकों में आदिशक्ति की महिमा का वर्णन करता है। विद्वानों, तांत्रिक आचार्यों तथा आधुनिक दार्शनिकों ने इसके मंत्रों की सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक प्रक्रिया के रूप में व्याख्या की है। वास्तव में प्रत्येक हिन्दू को एवं जो भी अपना सर्वकल्याण चाहते हैं, उन्हें अपने जीवन में जब भी संभव हो, दुर्गा सप्तशती का पाठ अवश्य करना चाहिए और उसमें व्याप्त रहस्य को समझने का प्रयास करना चाहिए।

दरअसल दुर्गा सप्तशती का मूल आधार नवाक्षरी मंत्र “ओम ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे” है, जिसे संपूर्ण साधना का केंद्र माना गया है। आर्थर एवलॉन अपनी प्रसिद्ध कृति “द सर्पेंट पावर” में लिखते हैं कि बीज मंत्र ध्वनि तक सीमित न होकर ब्रह्मांडीय ऊर्जा के संकेंद्रित रूप होते हैं जो साधक की चेतना को परिवर्तित करने की क्षमता रखते हैं (पृ.112)। इसी संदर्भ में स्वामी शिवानंद “दुर्गा सप्तशती अ कमेंट्री” में उल्लेख करते हैं कि यह नवर्ण मंत्र साधक की सुप्त कुण्डलिनी शक्ति को जागृत करता है और उसे सार्वभौमिक चेतना से जोड़ता है (पृ.45)। पंडित गोपीनाथ कविराज अपनी पुस्तक “तांत्रिक साधना एंड शक्ति वर्शिप” में लिखते हैं कि बीजाक्षरों की शक्ति साधक के सूक्ष्म शरीर में कंपन उत्पन्न कर आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करती है (पृ.78)।

दुर्गा सप्तशती के पाठ से पूर्व देवी कवच, अर्गला स्तोत्र और कीलक स्तोत्र का पाठ किया जाता है जो साधना के तीन महत्वपूर्ण आयाम हैं। गीता प्रेस द्वारा प्रकाशित “श्री दुर्गा सप्तशती व्याख्या सहित” में उल्लेख है कि कवच साधक के शरीर और मन को दैवीय शक्ति से सुरक्षित करता है (पृ.28)। पंडित रामतेज शास्त्री “दुर्गा सप्तशती रहस्य” में लिखते हैं कि कवच के माध्यम से साधक अपने प्रत्येक अंग को दैवी चेतना से आवेष्टित करता है जिससे भय और असुरक्षा का नाश होता है (पृ.63)। स्वामी चिन्मयानंद “द होली गीता” में भी इस सिद्धांत को विस्तार देते हुए कहते हैं कि जब मन में सुरक्षा और श्रद्धा का भाव उत्पन्न होता है तभी साधना सफल होती है (पृ.214)।

अर्गला स्तोत्र का मंत्र “रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि” गहन मनोवैज्ञानिक अर्थ रखता है। पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य “दुर्गा सप्तशती साधना विज्ञान” में लिखते हैं कि यहां ‘रूप’ का अर्थ आंतरिक सौंदर्य ‘जय’ का अर्थ आत्मविजय और ‘द्विषो जहि’ का अर्थ आंतरिक शत्रुओं का नाश है (पृ.102)। डॉ. केसी पांडेय अपनी पुस्तक “फिलॉसफी ऑफ तंत्र” में दुर्गा सप्तशती को एक अलग अर्थ में प्रस्तुत करते हैं, उनके अनुसार तांत्रिक साधना में मार्कण्डेय पुराण के इस भाग का विशेष महत्व है, वे कहते हैं कि तांत्रिक साधना का वास्तविक उद्देश्य बाह्य उपलब्धियां नहीं बल्कि आंतरिक शुद्धि है (पृ. 156)।

कीलक स्तोत्र के रहस्य को स्पष्ट करते हुए स्वामी सत्यानंद सरस्वती “चंडी पाठ द सीक्रेट ऑफ दुर्गा सप्तशती” में लिखते हैं कि कीलक साधक के भीतर मौजूद मानसिक अवरोधों का प्रतीक है जो मंत्र की शक्ति को प्रकट होने से रोकते हैं (पृ. 87)। इसी प्रकार स्वामी मुक्तानंद “कुण्डलिनी द सीक्रेट ऑफ लाइफ” में इस तथ्य की ओर प्रकाश डालते हैं कि संदेह और अशुद्धता आध्यात्मिक प्रगति के सबसे बड़े अवरोध होते हैं (पृ. 134)। इसलिए मां की भक्ति के लिए पूर्ण समर्पण से जाना चाहिए।

दुर्गा सप्तशती के तीन चरित्र महाकाली महालक्ष्मी और महासरस्वती मानव मन के तीन गुणों का प्रतिनिधित्व करते हैं। जिसके बारे में डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने गहराई से लिखा है, वे अपनी पुस्तक “इंडियन फिलॉसफी” खंड दो में लिखते हैं कि देवीमहात्म्य वास्तव में अज्ञान क्रियाशीलता और ज्ञान के मध्य आंतरिक संघर्ष का प्रतीक है (पृ. 54)। स्वामी अभेदानंद “डॉक्ट्रिन ऑफ कर्मा” में भी इसी विचार को पुष्ट करते हुए कहते हैं कि मनुष्य का जीवन इन तीन गुणों के संतुलन पर आधारित है (पृ. 89)।

वस्तुत: यहां ध्यान देने योग्य यह भी है कि दुर्गा सप्तशती में आया मंत्र “या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः” अद्वैत दर्शन का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करता है। स्वामी विवेकानंद “कम्प्लीट वर्क्स” में कहते हैं कि प्रत्येक जीव में वही दिव्य शक्ति विद्यमान है और उसी की अनुभूति सर्वोच्च आध्यात्मिक उपलब्धि है (पृ. 312)। इसके साथ ही श्री अरविंद “द लाइफ डिवाइन” में लिखते हैं कि समस्त सृष्टि एक ही चेतना की अभिव्यक्ति है (पृ. 67)।

अब हम इसके दूसरे पक्ष की ओर भी देखते हैं, जो अंधकारमय एवं ऊर्जा के स्तर पर नकारात्मक है, वस्तुत: “दुर्गा सप्तशती” में वर्णित राक्षसों का भी गहन मनोवैज्ञानिक अर्थ है। स्वामी तेजोमयानंद “देवी महात्म्यम द इनर मीनिंग” में लिखते हैं कि ‘महिषासुर’ अहंकार का प्रतीक है ‘रक्तबीज’ अनियंत्रित इच्छाओं का और ‘शुंभ-निशुंभ’ मानसिक द्वंद्व का प्रतिनिधित्व करते हैं (पृ.76)। वहीं, इस संदर्भ में लेखक कार्ल युंग के विचार भी यहां देखने योग्य है, वे अपनी कृति “मॉडर्न मैन इन सर्च ऑफ अ सोल” में लिखते हैं कि मानव मन के भीतर के दानव वास्तव में उसकी अवचेतन प्रवृत्तियां हैं जिन्हें समझना और नियंत्रित करना आवश्यक है (पृ. 142)।

इसके अलावा यह भी एक तथ्य है कि तांत्रिक दृष्टिकोण से दुर्गा सप्तशती एक संपूर्ण साधना ग्रंथ है। “रुद्रयामल तंत्र” में उल्लेख है कि नवाक्षरी मंत्र सभी सिद्धियों को प्रदान करने वाला है (पृ.214)। स्वामी लक्ष्मण जू “तांत्रिक विजडम ऑफ देवी महात्म्य” में लिखते हैं कि यह ग्रंथ कुण्डलिनी जागरण की प्रक्रिया को प्रतीकात्मक रूप में प्रस्तुत करता है (पृ.133)। ऐसे ही सर जॉन वुडरॉफ “शक्ति एंड शाक्त” में भी यह स्पष्ट करते हैं कि शक्ति उपासना वास्तव में आत्मचेतना के जागरण का मार्ग है (पृ.98)।

इतना ही नहीं, हम देखते है कि आधुनिक विज्ञान भी मंत्रों की शक्ति को स्वीकार करता है। डॉ. हंस कुमारी “मंत्र साइंस एंड मेडिटेशन” में इस बात को कुछ इस प्रकार कहती हैं कि मंत्रों के उच्चारण से उत्पन्न ध्वनि तरंगें मस्तिष्क की तरंगों को प्रभावित करती हैं (पृ.59)। स्वामी राम “साइंस ऑफ मंत्राज” में लिखते हैं कि मंत्र मन को पुनर्गठित करने और चेतना के गहरे स्तरों तक पहुंचने का साधन हैं (पृ.71)। डॉ. हर्बर्ट बेंसन का भी यही मानना रहा है, उनके द्वारा कृति “द रिलैक्सेशन रिस्पॉन्स” में भी यह सिद्ध किया गया है कि नियमित जप मानसिक तनाव को कम करता है (पृ.48)।

इस प्रकार यह स्पष्ट है कि ‘दुर्गा सप्तशती’ के मंत्र धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित न होकर एक गहन आध्यात्मिक विज्ञान का हिस्सा हैं। इनमें ध्वनि ऊर्जा मनोवैज्ञानिक संकेत और तांत्रिक सिद्धांतों का अद्भुत समन्वय है। यह ग्रंथ साधक को बाहरी पूजा से आगे बढ़ाकर आंतरिक शक्ति के जागरण की ओर ले जाता है। जब इन मंत्रों का जप श्रद्धा के साथ शुद्धता का ध्यान रखते हुए और खासकर सही समझ के साथ किया जाता है तब वे शब्द नहीं रहते बल्कि चेतना के द्वार खोलने वाली कुंजी बन जाते हैं। अत: यही कहना होगा कि “दुर्गा सप्तशती” को एक आध्यात्मिक प्रयोगशाला के रूप में देखा जाना चाहिए, जहां साधक अपने भीतर स्थित दिव्यता का साक्षात्कार करता है।

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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी