डॉ. भीमराव आंबेडकर: बहुआयामी व्यक्तित्व का समग्र परिप्रेक्ष्य
-डॉ. सदानंद दामोदर सप्रे
भारतीय इतिहास में कुछ महान व्यक्तित्व ऐसे होते हैं जिनकी छवि समाज के सामने सीमित रूप में प्रस्तुत होती है, जबकि उनका वास्तविक योगदान उससे कहीं अधिक व्यापक और बहुआयामी होता है। डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर भी ऐसे ही एक महान पुरुष हैं। सामान्यतः उन्हें केवल “संविधान निर्माता” या “दलितों के उद्धारक” के रूप में जाना जाता है, किन्तु यह उनके विराट व्यक्तित्व का केवल एक अंश है। उनके जीवन और कार्यों का गहराई से अध्ययन करने पर स्पष्ट होता है कि वे एक अद्वितीय विद्वान, प्रखर अर्थशास्त्री, दूरदर्शी चिंतक, समर्पित शिक्षाविद, सिद्धांतनिष्ठ पत्रकार, श्रमिकों के हितैषी तथा सच्चे राष्ट्रनेता थे।
डॉ. आंबेडकर का प्रारंभिक जीवन अत्यंत कठिन परिस्थितियों में बीता। आर्थिक अभाव और सामाजिक भेदभाव के बीच उन्होंने जिस दृढ़ता और लगन से उच्च शिक्षा प्राप्त की, वह अद्भुत है। अमेरिका के कोलंबिया विश्वविद्यालय और लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों से उन्होंने उच्चतम शैक्षणिक उपाधियाँ प्राप्त कीं। उनके शोध कार्य आज भी अर्थशास्त्र के क्षेत्र में महत्वपूर्ण संदर्भ माने जाते हैं। उनकी प्रसिद्ध कृति “The Problem of the Rupee” ने भारतीय वित्तीय व्यवस्था की दिशा निर्धारित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई और भारतीय रिज़र्व बैंक की स्थापना की वैचारिक आधारशिला रखी।
एक शोधकर्ता और चिंतक के रूप में डॉ. आंबेडकर ने अनेक प्रचलित धारणाओं को चुनौती दी। उन्होंने तथाकथित ‘आर्य आक्रमण सिद्धांत’ को तार्किक आधार पर अस्वीकार करते हुए यह सिद्ध किया कि भारतीय समाज की जड़ें एक ही सांस्कृतिक स्रोत में निहित हैं। अपनी पुस्तक “Who Were Shudras” में उन्होंने शूद्रों की ऐतिहासिक स्थिति का पुनर्मूल्यांकन किया और यह स्थापित किया कि वे मूलतः क्षत्रिय थे। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि जाति व्यवस्था जन्म आधारित न होकर एक सामाजिक विकृति के रूप में विकसित हुई। संस्कृत भाषा के प्रति उनके गहरे अनुराग और प्राचीन ग्रंथों के अध्ययन ने उनके विचारों को और भी प्रखर बनाया।
शिक्षा के क्षेत्र में भी उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा। उन्होंने न केवल शिक्षण कार्य किया, बल्कि शिक्षा के प्रसार हेतु संस्थागत प्रयास भी किए। People’s Education Society की स्थापना, सिद्धार्थ कॉलेज और मिलिंद कॉलेज का प्रारंभ- ये सभी उनके शिक्षा के प्रति समर्पण के प्रमाण हैं। उनका मानना था कि शिक्षा केवल ज्ञान प्राप्ति का माध्यम नहीं बल्कि सामाजिक परिवर्तन का सबसे सशक्त साधन है। वे शिक्षा को जीवनभर आवश्यक मानते थे और चाहते थे कि यह समान रूप से सभी वर्गों तक पहुँचे।
पत्रकारिता के क्षेत्र में डॉ. आंबेडकर ने जनजागरण का प्रभावी माध्यम तैयार किया। ‘मूकनायक’, ‘बहिष्कृत भारत’ और ‘जनता’ जैसे पत्रों के माध्यम से उन्होंने समाज के वंचित वर्गों की आवाज़ को मुखर किया। वे एक सिद्धांतनिष्ठ और अनुशासित संपादक थे, जोकि लेखन की गुणवत्ता और तथ्यात्मकता पर विशेष ध्यान देते थे। उनकी पत्रकारिता केवल सूचना देने तक सीमित नहीं थी, बल्कि वह समाज में चेतना और परिवर्तन का माध्यम भी थी।
श्रमिक हितों के लिए उनके प्रयास विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। वायसराय की परिषद में श्रमिक प्रतिनिधि के रूप में उन्होंने कार्य घंटे को 12 से घटाकर आठ घंटे करने, ओवरटाइम भुगतान, न्यूनतम वेतन, मातृत्व अवकाश और कर्मचारी बीमा जैसी अनेक सुविधाओं को लागू करवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह उनके सामाजिक न्याय के व्यापक दृष्टिकोण का ही परिणाम था कि उन्होंने श्रमिक वर्ग के अधिकारों को सशक्त बनाने का निरंतर प्रयास किया।
दलितों के उद्धार के लिए उनका संघर्ष उनके जीवन का केन्द्रीय उद्देश्य था। उनका संघर्ष सामाजिक समरसता स्थापित करने के लिए था, न कि वैमनस्य फैलाने के लिए। उन्होंने अपने जीवन में अनेक अपमान सहते हुए भी अहिंसा और संवेदनशीलता का मार्ग नहीं छोड़ा। यह उनकी महानता का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष है कि उन्होंने सामाजिक परिवर्तन के लिए संघर्ष किया, परंतु उसे हिंसा से दूर रखा।
धार्मिक दृष्टिकोण से भी उनका चिंतन अत्यंत स्पष्ट और तार्किक था। लगभग दो दशकों के विचार-मंथन के बाद उन्होंने 1956 में बौद्ध धर्म को अपनाया। यह निर्णय उन्होंने कहना चाहिए कि तत्कालीन समय में सामाजिक न्याय और समानता के सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए संभवतया लिया। उनके अनुसार बौद्ध धर्म भारतीय संस्कृति का ही अभिन्न अंग है और उसमें मानवता के लिए आवश्यक नैतिक आधार निहित है।
एक राष्ट्रनेता के रूप में डॉ. आंबेडकर का योगदान सर्वविदित है। भारतीय संविधान के निर्माण में उनकी भूमिका निर्णायक रही। उन्होंने संविधान को स्वतंत्रता, समानता और बंधुता के सिद्धांतों पर आधारित किया। उनका मानना था कि सिर्फ राजनीतिक लोकतंत्र पर्याप्त नहीं है, सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र भी आवश्यक है। उन्होंने अपने ऐतिहासिक भाषण में यह भी चेतावनी दी कि व्यक्ति-पूजा लोकतंत्र के लिए घातक हो सकती है और हमें अपने अधिकारों की रक्षा के लिए संवैधानिक मार्ग ही अपनाना चाहिए।
राष्ट्रीय विकास के संदर्भ में भी उनकी सोच अत्यंत दूरदर्शी थी। उन्होंने जल और ऊर्जा के क्षेत्र में राष्ट्रीय नीतियों की आवश्यकता पर बल दिया तथा नदियों को जोड़ने और औद्योगीकरण को बढ़ावा देने का सुझाव दिया। राष्ट्रीय एकता के विषय में वे अत्यंत सजग थे और भाषाई आधार पर राज्यों के गठन को लेकर उन्होंने अपनी आशंकाएँ व्यक्त कीं। उनका मानना था कि यह प्रवृत्ति भविष्य में राष्ट्रीय एकता के लिए चुनौती बन सकती है।
डॉ. आंबेडकर की एक विशेषता यह भी थी कि वे समय और परिस्थितियों के अनुसार अपने विचारों में परिवर्तन करने से नहीं हिचकते थे। पूना समझौते के समय उन्होंने राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखते हुए अपने पूर्व विचारों में लचीलापन दिखाया। स्वतंत्रता के बाद उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि देश की आजादी की रक्षा करना प्रत्येक नागरिक का सर्वोच्च कर्तव्य है।
अंततः कहना यही है कि डॉ. भीमराव आंबेडकर का जीवन हमें यह सिखाता है कि सच्ची महानता उपलब्धियों में सीमित नहीं की जा सकती है, वह वास्तव में उन मूल्यों में निहित होती है जिनके आधार पर व्यक्ति समाज और राष्ट्र के लिए कार्य करता है। इसलिए वे केवल एक वर्ग विशेष के नेता नहीं थे, बल्कि समूचे राष्ट्र के पथप्रदर्शक थे। आज आवश्यकता है कि हम उनके विचारों को समग्रता में समझें और उन्हें अपने जीवन तथा समाज में आत्मसात करें। यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी

