भोजशाला विवाद और माँ वाग्देवी का प्रश्न: आस्था, इतिहास और समाधान की तलाश
-सचिन दवे
मध्य प्रदेश के धार जिला स्थित भोजशाला केवल पत्थरों से बनी प्राचीन इमारत भारत की उस जीवंत सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक है, जहाँ इतिहास, आस्था, विद्या और राजनीति एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हुई दिखाई देती हैं। पिछले कई दशकों से भोजशाला विवाद भारतीय समाज के सामने एक ऐसे प्रश्न के रूप में खड़ा है, जो किसी धार्मिक स्थल के अधिकार तक सीमित नहीं होकर हमारी ऐतिहासिक समझ, सांस्कृतिक पहचान और प्रशासनिक इच्छाशक्ति की भी गंभीर परीक्षा लेता है। विडंबना यह है कि जहाँ कभी विद्या और ज्ञान की साधना होती थी, वहीं आज हर वर्ष कानून-व्यवस्था, निषेधाज्ञा और पुलिस बल की तैनाती चर्चा का विषय बन जाती है। भोजशाला विवाद यह स्पष्ट करता है कि स्वतंत्रता के सात दशक बाद भी भारत अपने इतिहास को लेकर कितनी दुविधा और संकोच में जी रहा है।
भोजशाला का नाम 11वीं शताब्दी के परमार शासक राजा भोज से जुड़ा माना है। राजा भोज भारतीय इतिहास में विद्या, साहित्य, विज्ञान और कला के महान संरक्षक के रूप में प्रतिष्ठित हैं। उनके शासनकाल में मालवा क्षेत्र शिक्षा और संस्कृत अध्ययन का प्रमुख केंद्र रहा। इतिहासकारों के अनुसार भोजशाला उसी बौद्धिक परंपरा का प्रतीक थी, जहाँ विद्या की देवी माँ वाग्देवी अर्थात सरस्वती की उपासना होती थी और जहाँ अध्ययन-अध्यापन की समृद्ध परंपरा विकसित हुई। शिलालेख, स्थापत्य शैली और साहित्यिक संदर्भ इस तथ्य की ओर संकेत करते हैं कि भोजशाला केवल एक धार्मिक स्थल नहीं बल्कि एक विद्या केंद्र भी रहा है। इस दृष्टि से इसका महत्व किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं रहकर भारतीय सभ्यता की सामूहिक बौद्धिक धरोहर का प्रतिनिधित्व करता है।
इसके विपरीत मुस्लिम समुदाय द्वारा इसे कमाल मौला की मस्जिद के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। किंतु इस दावे के समर्थन में ठोस ऐतिहासिक प्रमाणों का अभाव दिखाई देता है। न तो स्थापत्य शैली मस्जिद की पारंपरिक संरचना से मेल खाती है और न ही उपलब्ध ऐतिहासिक स्रोत इस दावे की पुष्टि करते हैं। इसी दोहरी पहचान ने भोजशाला विवाद को जन्म दिया, जो समय के साथ धार्मिक न रहकर सामाजिक और राजनीतिक विवाद में परिवर्तित हो गया।
भोजशाला विवाद का एक अत्यंत महत्वपूर्ण किंतु अक्सर उपेक्षित पक्ष माँ वाग्देवी की प्राचीन मूर्ति से जुड़ा है। मान्यता है कि राजा भोज ने 1034 ईस्वी में इस मूर्ति की स्थापना कराई थी। यह मूर्ति धार्मिक आस्था का प्रतीक होने के साथ ही मध्ययुगीन मालवा की उत्कृष्ट शिल्पकला की अद्वितीय मिसाल भी थी। ब्रिटिश शासनकाल में भारतीय सांस्कृतिक धरोहरों की जो व्यापक लूट हुई, भोजशाला भी उससे अछूती न रह सकी। 1902 में तत्कालीन वायसराय लार्ड कर्जन के मालवा दौरे के दौरान भोजशाला में स्थापित माँ वाग्देवी की मूर्ति ने उनका ध्यान आकर्षित किया। इसके पश्चात प्रशासनिक आदेश के तहत इस मूर्ति को धार से गुजरात की खंभात खाड़ी के माध्यम से समुद्री मार्ग द्वारा इंग्लैंड भेज दिया गया, जहाँ आज यह लंदन के एक संग्रहालय में सुरक्षित है।
स्वतंत्र भारत में इस मूर्ति की वापसी की मांग समय-समय पर उठती रही है। 1950 और 60 के दशकों में स्थानीय धार्मिक और सांस्कृतिक संगठनों ने केंद्र सरकार और ब्रिटिश अधिकारियों से पत्राचार किया। 1962 में प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर स्वयं लंदन गए और देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री से माँ वाग्देवी की मूर्ति की वापसी का आग्रह किया। 2011 में डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी ने भी इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर उठाया और केंद्र सरकार से सहयोग की अपेक्षा की। मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी यह घोषणा की थी कि सरकार इस मूर्ति को वापस लाने का प्रयास करेगी, किंतु राजनीतिक इच्छाशक्ति और ठोस कूटनीतिक प्रयासों के अभाव में अब तक कोई परिणाम सामने नहीं आ सका।
यह उल्लेखनीय है कि हाल के वर्षों में भारत कई प्राचीन मूर्तियाँ और कलाकृतियाँ विदेशों से वापस लाने में सफल रहा है। भगवान बुद्ध और भगवान शिव की कुछ दुर्लभ प्रतिमाएँ भारत लौट चुकी हैं। इससे स्पष्ट होता है कि यदि सरकार ठान ले और अंतरराष्ट्रीय कानूनी प्रक्रियाओं को गंभीरता से आगे बढ़ाए तो माँ वाग्देवी की मूर्ति की वापसी भी असंभव नहीं है।
भोजशाला विवाद कई बार न्यायालयों तक भी पहुँच चुका है। प्रशासन ने दशकों से कानून-व्यवस्था के नाम पर पूजा और सीमित नमाज़ की व्यवस्था लागू कर रखी है। यह व्यवस्था तात्कालिक शांति तो बनाए रखती है किंतु स्थायी समाधान प्रदान नहीं करती। वास्तविक समस्या यह है कि केंद्र और राज्य सरकारें अब तक इस विषय पर कोई स्पष्ट और अंतिम निर्णय लेने से बचती रही हैं। इसके पीछे अंतरराष्ट्रीय कूटनीति, कानूनी जटिलताएँ और राजनीतिक समीकरणों की भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता।
वर्ष 2016 की तरह वर्ष 2026 में भी जब बसंत पंचमी और शुक्रवार एक साथ पड़ रहे हैं तो आम नागरिक के मन में यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि क्या भारत अपनी सनातन सांस्कृतिक विरासत की रक्षा कर पाएगा? क्या विद्या की देवी की उपासना को हर वर्ष प्रशासनिक आदेशों और अस्थायी व्यवस्थाओं में बाँध दिया जाएगा या फिर इतिहास और आस्था के साथ न्याय किया जाएगा?
ऐतिहासिक तथ्यों और सांस्कृतिक साक्ष्यों के आधार पर यह स्वीकार करना होगा कि भोजशाला का मूल स्वरूप एक हिंदू शैक्षणिक और धार्मिक स्थल का रहा है। स्थायी शांति तभी संभव है जब भोजशाला को पूर्ण रूप से हिंदुओं को सौंपा जाए और माँ वाग्देवी की मूर्ति को भारत वापस लाने के लिए गंभीर और ठोस प्रयास किए जाएँ।
अंततः भोजशाला इस बात का प्रतीक है कि भारतीय समाज में धर्म, संस्कृति और इतिहास के बीच संतुलन बनाए रखना कितना आवश्यक और चुनौतीपूर्ण है। यह विवाद आज विश्वास, पहचान और ऐतिहासिक सत्य की व्याख्या का प्रश्न है। यदि भारत को वास्तव में आत्मविश्वासी और सांस्कृतिक रूप से सशक्त राष्ट्र बनना है तो उसे ऐसे प्रश्नों से बचना नहीं बल्कि ईमानदारी और साहस के साथ उनका समाधान खोजना चाहिए।
(लेखक, सामाजिक कार्यकर्ता हैं।)
---------------
हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी

