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तेल पर अमेरिकी दबाव के बीच भारत की दो टूक!

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तेल पर अमेरिकी दबाव के बीच भारत की दो टूक!


डॉ. मयंक चतुर्वेदी

अमेरिकी कांग्रेस द्वारा रूस और ईरान से संबंधित नए प्रतिबंध कानून को पारित कर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को रूस से ऊर्जा खरीद जारी रखने वाले देशों पर सौ प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का अधिकार देने के बाद वैश्विक स्तर पर नए समीकरण बन गए हैं। अब दबाव भारत समेत उन तमाम देशों पर आ रहा है, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए रूस से तेज खरीदते हैं। एक ओर अमेरिका का संदेश साफ है कि वह ऐसे देशों पर शत-प्रतिशत टैरिफ की मार देगा, दूसरी ओर भारत है, जिसने अमेरिका को संदेश दिया है कि वह अपनी ऊर्जा सुरक्षा से समझौता नहीं कर सकता।

वस्तुत: विदेश मंत्रालय ने साफ कह दिया है कि भारत अपने 1.4 अरब लोगों की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है और बाजार की परिस्थितियों के अनुसार विभिन्न स्रोतों से ऊर्जा खरीद जारी रखेगा, जिस पर कि भारत अपने व्यापार और आर्थिक हितों की रक्षा के लिए आवश्यक कदम समय-समय पर उठाता रहेगा। एक तरह से देखें तो अमेरिका को यह संदेश देना जरूरी था। फिर रूस से भारत की तेल खरीद कोई आज की बात तो है नहीं, हां, इसमें इतना जरूर हुआ है कि 2022 के बाद तेजी आई है, वह भी इसलिए क्योंकि भारत को अपनी ऊर्जा लागत को नियंत्रित रखना था।

यहां यह भी ध्यान रहे कि भारत ने रूस से तेल खरीदते समय दुनिया के अन्य देशों से ऊर्जा आयात बंद नहीं किया है। भारत की शुरू से नीति ही रही है कि वह किसी एक देश पर निर्भर न रहकर अपनी जरूरत के हिसाब से अधिकतम स्रोतों से ऊर्जा प्राप्त करता रहेगा। स्वभाविक तौर पर भारत का तर्क भी यही है कि जब विश्व के कई बाजारों में तेल उपलब्ध है, तब राजनीतिक प्राथमिकताओं के कारण महंगे विकल्प क्यों चुने जाएं?

अमेरिकी दबाव पहली बार नहीं आया

आज का घटनाक्रम अचानक पैदा नहीं हुआ है। रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद से ही अमेरिका और उसके सहयोगी देशों की ओर से भारत पर रूसी तेल की खरीद सीमित करने का दबाव रहता रहा है। 2025 में यह दबाव सीधे टैरिफ तक पहुंच गया था। अगस्त 2025 में राष्ट्रपति ट्रंप ने भारत से आने वाले उत्पादों पर रूसी तेल आयात के कारण अतिरिक्त 25 प्रतिशत शुल्क लगाया, फिर जब फरवरी 2026 में अमेरिका ने वही अतिरिक्त 25 प्रतिशत शुल्क हटाया तो कहा गया, भारत ने रूसी तेल आयात रोकने की दिशा में कदम उठाने और अमेरिकी ऊर्जा उत्पाद खरीदने की प्रतिबद्धता व्यक्त की, इसलिए यही शुल्क हटाने का आधार है।

ऐसे में इस पूरे घटनाक्रम को देखने पर एक बात साफ दिखाई देती है कि ऊर्जा खरीद का प्रश्न भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों में बातचीत और दबाव, दोनों का हिस्सा बन चुका है, किंतु इस बीच एक अच्छा काम यह हुआ है कि भारत ने अमेरिका को बहुत स्पष्ट संदेश दिया है और वह यही है कि मोदी सरकार आम आदमी की जेब पर तेल का बोझ बिल्कुल नहीं डालेगी। हालांकि तेल के इतर दोनों देश (भारत-अमेरिका) रक्षा, तकनीक, शिक्षा, व्यापार और रणनीतिक मामलों में महत्वपूर्ण साझेदार हैं। भारत हमेशा से ही अमेरिका के साथ संबंधों को महत्व देता है और अमेरिका भी भारत को हिंद-प्रशांत तथा वैश्विक अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण साझेदार मानता है, किंतु जब साझेदार एक देश दूसरे की ऊर्जा नीति निर्धारित करने लगे तब फिर विरोध का ही रास्ता शेष बचता है।

बेशक, भारत को अमेरिका के साथ संवाद जारी रखना चाहिए, बातचीत से रास्ता निकालना चाहिए और जहां संभव हो वहां अमेरिकी ऊर्जा उत्पाद भी खरीदने चाहिए, किंतु अंतिम निर्णय भारत के राष्ट्रीय हितों को ही ध्यान में रखकर लिए जाएंगे, यही किसी भी बराबरी की साझेदारी की बुनियादी शर्त है।

चीन का मामला भी अमेरिका के लिए आईना है

अमेरिकी कानून का निशाना बड़े देशों में भारत के अलावा चीन पर भी है। चीन ने भी अमेरिकी कदम पर आपत्ति जताई है। बीजिंग ने इसे एकतरफा माना है और कहा है कि यह निर्णय अंतरराष्ट्रीय कानून में विपरीत है। फिर भी इस पूरे घटनाक्रम से भारत को एक महत्वपूर्ण सबक लेना चाहिए। यदि कोई बाहरी शक्ति हमारे ऊर्जा स्रोतों पर दबाव डाल सकती है, तो हमें अपनी ऊर्जा निर्भरता कम करने की दिशा में और तेजी से आगे बढ़ना होगा, ताकि जितना संभव हो हम दूसरों पर अपनी निर्भरता कम से कम कर सकें। वैसे भी जितनी ऊर्जा निर्भरता हमारी कम होगी हम उतने ही ताकतवर बनेंगे।

फिलहाल भारत की वास्तविक ताकत इसी में है कि वह बिना किसी अन्य देश के दबाव में आए, अपने निर्णय देश की जरूरतों के हिसाब से लेता रहे। वह रूस से भी तेल खरीदे, अमेरिका से भी और जरूरत पड़ने पर किसी अन्य देश से भी, इसलिए वर्तमान आवश्यकता इसी में है कि भारत दृढ़ता के साथ अमेरिका के सामने खड़ा रहे । वह बार-बार उसे बताता रहे कि अमेरिकी-भारत संबंध जितने जरूरी हैं, उनसे कहीं अधिक जिम्मेदारी भारत की अपने नागरिकों कें प्रति है । भारत अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा पहले करेगा।

अत: रूस से संबंध भी बनाए रखने हैं और यूरोप, पश्चिम एशिया तथा अन्य ऊर्जा उत्पादक देशों के साथ भी साझेदारी बढ़ाते रहना भारत की विदेशनीति है। एक तरह से यही सही नीति है, जिसमें भले ही अमेरिका, भारत का मित्र और महत्वपूर्ण साझेदार हो सकता है, किंतु भारत की ऊर्जा सुरक्षा का अंतिम निर्णय भारत ही करेगा। एक देश के रूप में यही आत्मसम्मान है और यही आर्थिक संप्रभुता भी है।

(लेखक, हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी