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अदालत की कसौटी में स्थानांतरण नीति

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अदालत की कसौटी में स्थानांतरण नीति


डॉ. सत्यवान सौरभ

हरियाणा की स्थानांतरण नीति पर पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय की हालिया टिप्पणी ने एक गंभीर और दूरगामी संवैधानिक बहस को जन्म दिया है। यह बहस केवल एक प्रशासनिक निर्णय या अंक-प्रणाली तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस मूल प्रश्न को छूती है जो किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के केंद्र में होता है—समानता का वास्तविक अर्थ क्या है? क्या सभी के साथ एक जैसा व्यवहार करना ही समानता है, या परिस्थितियों के अनुसार भिन्न व्यवहार ही न्याय के अधिक निकट है? जनवरी 2026 में आई टिप्पणी ने हरियाणा सरकार की स्थानांतरण नीति 2025 को व्यापक सार्वजनिक विमर्श का विषय बना दिया। इस नीति में दिव्यांग कर्मचारियों के लिए 40–60 प्रतिशत दिव्यांगता पर 10 अंक, 60–80 प्रतिशत पर 15 अंक तथा 80 प्रतिशत से अधिक पर 20 अंक निर्धारित किए गए हैं। प्रथम दृष्टि में यह व्यवस्था तर्कसंगत और संवेदनशील प्रतीत होती है, क्योंकि यह इस मूल तथ्य को स्वीकार करती है कि दिव्यांगता एकरूप नहीं होती, बल्कि उसकी तीव्रता और प्रभाव भिन्न-भिन्न होते हैं। इस दृष्टि से अधिक दिव्यांगता वाले व्यक्ति को अधिक सहायता देना न्यायसंगत माना जा सकता है।

किन्तु यहीं से विवाद का प्रारंभ होता है। प्रश्न यह है कि क्या ऐसा वर्गीकरण संवैधानिक कसौटियों पर खरा उतरता है? पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने इस नीति को निरस्त नहीं किया है, बल्कि इसके औचित्य पर गंभीर प्रश्न उठाए हैं। न्यायमूर्ति अश्वनी कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति रोहित कपूर की पीठ ने स्पष्ट किया कि यह मामला गहन विचारणीय है और इसमें संवैधानिक सिद्धांतों की सूक्ष्म समीक्षा अपेक्षित है।याचिकाकर्ताओं का तर्क मुख्यतः दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 पर आधारित है। इस अधिनियम के अनुसार 40 प्रतिशत या उससे अधिक दिव्यांगता वाले सभी व्यक्ति एक समान श्रेणी में आते हैं। ऐसे में 40 और 80 प्रतिशत दिव्यांगता वाले व्यक्तियों के बीच अंक-आधारित भेदभाव समानता के अधिकार का उल्लंघन प्रतीत हो सकता है। यह दृष्टिकोण “औपचारिक समानता” की अवधारणा को रेखांकित करता है, जिसमें सभी के साथ समान व्यवहार की अपेक्षा की जाती है।

हालांकि, भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 केवल औपचारिक समानता तक सीमित नहीं है, बल्कि “वास्तविक समानता” की ओर संकेत करता है। उच्चतम न्यायालय ने पश्चिम बंगाल राज्य बनाम अनवर अली सरकार जैसे मामलों में “तर्कसंगत वर्गीकरण” का सिद्धांत स्थापित किया है। इसके अनुसार, यदि वर्गीकरण स्पष्ट, बुद्धिसंगत और उद्देश्य से तार्किक रूप से जुड़ा हो, तो वह असंवैधानिक नहीं माना जाएगा। यहीं यह प्रश्न और जटिल हो जाता है कि क्या दिव्यांगता के प्रतिशत के आधार पर किया गया यह वर्गीकरण वास्तव में तर्कसंगत है। क्या 40 और 80 प्रतिशत दिव्यांगता के बीच का अंतर केवल संख्यात्मक है, या यह व्यक्ति के जीवन की गुणवत्ता, कार्यक्षमता और आत्मनिर्भरता में भी गहरा अंतर उत्पन्न करता है? यदि यह अंतर वास्तविक है, तो अधिक अंक देना न्यायोचित ठहराया जा सकता है; अन्यथा यह वर्गीकरण मनमाना प्रतीत होगा।

दिव्यांगता को केवल चिकित्सीय दृष्टि से समझना पर्याप्त नहीं है; यह एक सामाजिक और मनोवैज्ञानिक अनुभव भी है। किसी व्यक्ति की कार्यक्षमता, सामाजिक सहभागिता और आत्मनिर्भरता—ये सभी कारक उसकी वास्तविक स्थिति को निर्धारित करते हैं। अतः केवल प्रतिशत के आधार पर नीति निर्माण एक सीमित और अधूरा दृष्टिकोण हो सकता है। इसके साथ ही, नीति की पारदर्शिता भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। वर्तमान विवाद का एक प्रमुख कारण यह है कि अंक निर्धारण के पीछे का वैज्ञानिक या सांख्यिकीय आधार स्पष्ट नहीं किया गया है। यदि यह आधार सार्वजनिक नहीं होगा, तो नीति मनमानी प्रतीत हो सकती है, चाहे उसका उद्देश्य कितना ही सकारात्मक क्यों न हो।

इस संदर्भ में न्यायालय का हस्तक्षेप एक रचनात्मक अवसर के रूप में देखा जाना चाहिए। पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय यह सुनिश्चित करना चाहता है कि नीतियां केवल औपचारिक न रह जाएं, बल्कि वास्तविक न्याय का माध्यम बनें। यह लोकतंत्र की वह शक्ति है, जहां न्यायपालिका नीतियों को संतुलित और उत्तरदायी बनाए रखती है।

सरकार के लिए यह आत्ममंथन का उपयुक्त समय है। यदि अंक निर्धारण के पीछे ठोस शोध और आंकड़े हैं, तो उन्हें सार्वजनिक किया जाना चाहिए। यदि नहीं, तो विशेषज्ञों की एक बहु-विषयक समिति गठित कर अधिक वैज्ञानिक और व्यावहारिक ढांचा विकसित किया जाना चाहिए। केवल प्रतिशत के स्थान पर “कार्यात्मक क्षमता”, “दैनिक जीवन पर प्रभाव” और “सामाजिक सहभागिता” जैसे मानकों को शामिल करना अधिक न्यायसंगत दृष्टिकोण हो सकता है।

अंततः, यह बहस हमें समानता की अवधारणा पर पुनर्विचार करने के लिए प्रेरित करती है। समानता का अर्थ सबको एक जैसा देना नहीं, बल्कि सबको उनकी परिस्थितियों के अनुरूप न्याय देना है। यही वास्तविक समानता है, जो एक समावेशी और न्यायपूर्ण समाज की आधारशिला बनती है। निष्कर्षतः, यह मुद्दा सरकार और न्यायालय के बीच टकराव का नहीं, बल्कि नीति और न्याय के संतुलन का है। यदि हरियाणा सरकार संवेदनशीलता और तर्क के बीच संतुलन स्थापित कर पाती है, तो यह केवल एक विवाद का समाधान नहीं होगा, बल्कि भविष्य की नीतियों के लिए एक अनुकरणीय उदाहरण सिद्ध होगा।

(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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हिन्दुस्थान समाचार / मुकुंद