देश विरोध का खतरनाक खेल खेलते राहुल गांधी
- डॉ. मयंक चतुर्वेदी
पिछले कुछ समय से देश में राजनीति का ऐसा विकृत स्वरूप उभर रहा है, जो देश की संप्रभुता के लिए गंभीर चेतावनी है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में जब घरेलू राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं देश की सीमाओं को लांघकर विदेशी ताकतों, अंतरराष्ट्रीय कॉर्पोरेट्स और वैश्विक संस्थाओं की दहलीज पर समर्थन मांगने लगें तो वह लोकतंत्र को खोखला करती हैं।
कांग्रेस नेता राहुल गांधी द्वारा विदेशी धरती पर जाकर भारतीय लोकतंत्र की स्थिति पर दिए गए बयान, एलन मस्क जैसे दंभी विदेशी अरबपतियों की भारत-विरोधी झुंझलाहट और संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार निकाय जैसी संस्थाओं का पक्षपातपूर्ण रवैया, वस्तुत: यह सब किसी संयोग का हिस्सा नहीं लगते। एक के बाद एक चुनावों में पराजय झेलने के बाद घरेलू राजनीति में अस्थिरता पैदा करने और चुनी हुई मोदी सरकार पर दबाव बनाने के लिए विदेशी शक्तियों के साथ जो परोक्ष जुगलबंदी दिखाई दे रही है, वह देश के आंतरिक मामलों में बाहरी दखल को खुला निमंत्रण है।
भारतीय लोकतंत्र में सत्ता का परिवर्तन हमेशा जनता के मतों से तय होता है। परंतु, विपक्ष के नेता राहुल गांधी द्वारा अंतरराष्ट्रीय मंचों का उपयोग देश की चुनाव प्रणाली, न्यायपालिका और लोकतांत्रिक संस्थाओं को लांछित करने के लिए किया जाना अत्यंत चिंताजनक है। उनके बयानों में बार-बार यह राग अलापा गया कि पश्चिमी देश भारत में 'लोकतंत्र की पुनर्स्थापना' के लिए आगे नहीं आ रहे हैं। यह अपील परोक्ष रूप से विदेशी ताकतों को भारत के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने का आमंत्रण देने जैसी है।
दूसरी ओर जब एक जिम्मेदार राष्ट्रीय नेता विदेशी धरती पर जाकर अपनी ही संवैधानिक संस्थाओं को 'कमजोर' बताता है, तो वह उन वैश्विक ताकतों का हौसला बढ़ाता है जो भारत की मजबूत वैश्विक छवि और आर्थिक प्रगति से ईर्ष्या करती हैं। वस्तुत: इस पूरे घटनाक्रम में सबसे खतरनाक मोड़ तब देखने में आता है जब दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति एलन मस्क जैसे विदेशी कारोबारी भारतीय संप्रभुता को चुनौती देने की कोशिश करते हैं। मस्क की कंपनी 'स्टारलिंक' भारत में सैटेलाइट इंटरनेट सेवा के लिए लाइसेंस चाहती है किंतु भारत सरकार ने अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा और नियामक पैमानों पर किसी भी प्रकार का समझौता करने से साफ इनकार कर दिया।
मस्क ने अपनी इस व्यावसायिक खीझ को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर भारतीय नीतियों और स्वदेशी उद्यमियों (जैसे मुकेश अंबानी) के खिलाफ विषवमन करके निकाला। मस्क का यह चरित्र ही रहा है कि वे अपने व्यापारिक हितों के लिए किसी भी देश के लोकतंत्र को मटियामेट करने की दंभपूर्ण सोच रखते हैं, जैसा कि बोलीविया के लीथियम भंडार पर कब्जा करने के लिए वहां के निर्वाचित राष्ट्रपति के खिलाफ रचे गए तख्तापलट की साजिश में उनकी स्वीकारोक्ति (हम जिसका चाहें तख्तापलट करेंगे) से सामने भी आ चुका है।
सबसे बड़ा इसमें दुखद पहलू यह है कि राहुल गांधी इस मामले में भारत सरकार की सुरक्षा नीतियों के साथ खड़े होने के बजाय मस्क की भारत-विरोधी भावनाओं के साथ सुर मिलाते और उन्हें उकसाते नजर आए। ऐसे में कांग्रेस और राहुल गांधी की राजनीति का एक बड़ा विरोधाभास यह है कि वे देश के भीतर रोजगार, बुनियादी ढांचा और पूंजी का निर्माण करने वाले भारतीय उद्यमियों (अडानी-अंबानी) को दिन-रात लांछित करते हैं, पर वहीं एलन मस्क जैसे बदमिजाज और मर्यादाहीन विदेशी उद्योगपति के आर्थिक स्वार्थों के समर्थन में खड़े हो जाते हैं।
इससे पहले जब अमेरिकी राजनेता डोनाल्ड ट्रंप ने भारतीय अर्थव्यवस्था को 'डेड इकोनॉमी' कहकर अपमानित करने का प्रयास किया, तब भी राहुल गांधी ने अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) द्वारा भारतीय विकास दर के सकारात्मक और मजबूत अनुमानों को दरकिनार कर ट्रंप के दावों से सहमति जताने में देर नहीं लगाई। विदेशी कारपोरेट्स के आगे इस प्रकार नतमस्तक होना और स्वदेशी उद्योगों की साख गिराना देश के आर्थिक स्वावलंबन पर सीधा प्रहार है।
इसी तरह से लोकतंत्र की अंतिम रक्षा-पंक्ति उसकी स्वतंत्र न्यायपालिका होती है, मगर अब उसे भी सड़क के हंगामे और राजनीतिक प्रदर्शनों के दबाव में लेने का एक खतरनाक चलन शुरू किया गया है। सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन एक मामले के दौरान राहुल गांधी द्वारा मुख्य न्यायाधीश से व्यक्तिगत रूप से मिलने की इच्छा जताना और अनुमति न मिलने पर विपक्षी नेताओं के साथ सुप्रीम कोर्ट की तरफ मार्च करना, कानून व्यवस्था का खुला मखौल उड़ाना नहीं तो क्या है? पुलिस-प्रशासन को चकमा देकर याचिका सौंपने के इस नए तरीके ने आंदोलनों की प्रकृति को पूरी तरह विकृत कर दिया है।
अब यह कोई संयोग नहीं है कि जब देश के भीतर अराजकता और आंदोलनों के जरिए मोदी सरकार को अस्थिर करने का प्रयास तेज होता है, ठीक उसी समय संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय जैसी वैश्विक संस्थाएं भारत को लोकतांत्रिक मूल्यों पर ज्ञान देना शुरू कर देती हैं। इस एजेंसी के दोहरे रवैये की जितनी आलोचना की जाए, वह कम है। जब भारत के पड़ोसियों, खासकर पाकिस्तान और बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों का खुलेआम कत्लेआम होता है, मानवाधिकारों की धज्जियां उड़ाई जाती हैं और चुनी हुई सरकारों का हिंसक तख्तापलट होता है, तब ये वैश्विक पदाधिकारी मौन साध लेते हैं परंतु भारत में संसद द्वारा पास किए गए कानूनों या न्यायिक प्रक्रियाओं पर ये तुरंत हस्तक्षेप करने की कोशिश करते हैं!
इससे इस बात की पुष्टि होती है कि भारतीय लोकतंत्र को अस्थिर करने के लिए देश के भीतर की कुंठित राजनीतिक ताकतों और देश के बाहर बैठे पश्चिमी स्वार्थों, अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं व मस्क जैसे विदेशी अरबपतियों के बीच एक साठगांठ मजबूत होती जा रही है। घरेलू स्तर पर वैचारिक मतभेद कितने भी गहरे क्यों न हों, जब बात देश की संप्रभुता और सम्मान की आती है, तो किसी भी बाहरी शक्ति को जज बनने का अधिकार नहीं दिया जा सकता। कम से कम इतना तो राहुल गांधी जैसे विपक्ष के मुख्य नेता को समझना चाहिए।
वस्तुत: राहुल गांधी और उनके सहयोगियों को इस मामले में दक्षिण के राजनेता कमल हासन के उन देशभक्तिपूर्ण शब्दों से सीख लेनी चाहिए कि भारत एक लोकतांत्रिक देश है, कोई उपनिवेश नहीं। हमारे यहां दुनिया का स्वागत है परंतु अपने भविष्य का फैसला भारत की जनता करेगी, पश्चिमी स्वार्थ या कोई विदेशी अरबपति नहीं। ऐसे में कहना यही है कि देश की जनता अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रची जा रही इस टूलकिट और साजिश को भली-भांति समझ रही है और वह अपने लोकतंत्र की रक्षा विदेशी बैसाखियों के बिना, स्वयं करने में पूरी तरह सक्षम है। राहुल गांधी विचार करें, वे इस अराजकता से आखिर क्या प्राप्त कर लेंगे।
(लेखक, हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)
-----------------
हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी

