सियासी शक्ति प्रदर्शन की कीमत चुका रहे दिल्ली के व्यापारी
डॉ. मयंक चतुर्वेदी
धनतेरस, दीपावली और भाईदूज! देश के व्यापारियों के लिए सालभर की कमाई का सबसे महत्वपूर्ण समय। बाजारों में ग्राहकों की भीड़, दुकानों पर खरीदारी की रौनक, गोदामों से निकलता सामान, सड़कों पर दौड़ते मालवाहक वाहन और दिन-रात मेहनत करते हजारों मजदूर। दिल्ली के बाजार भी इसी कारोबारी उत्साह के साथ त्योहारों का स्वागत कर रहे हैं, तभी इसी निर्णायक कारोबारी दौर में राहुल गांधी के नेतृत्व में इंडिया गठबंधन की महारैली ने दिल्ली के प्रमुख बाजारों की रफ्तार पर ऐसा ब्रेक लगाया कि व्यापारियों के सामने दुकानें खोलने और ग्राहकों तक पहुंचने का संकट खड़ा हो गया।
चैंबर ऑफ ट्रेड एंड इंडस्ट्री (सीटीआई) का दावा है कि रैली के चलते करीब 2.5 लाख दुकानें बंद रहीं और लगभग 11 हजार करोड़ रुपये के कारोबार पर चोट पहुंची। प्रश्न राहुल गांधी से सीधा है, अपनी राजनीतिक ताकत दिखाने के लिए आयोजित इस रैली की आर्थिक कीमत आखिर दिल्ली के व्यापारी, दुकानदार और रोज कमाकर परिवार पालने वाले मजदूर क्यों चुकाएं?
लोकतंत्र में अपनी बात जनता तक पहुंचाने, सरकार का विरोध करने और राजनीतिक शक्ति का प्रदर्शन करने के लिए सभाएं होनी चाहिए, मगर क्या लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति के इस अधिकार का अर्थ यह है कि शहर की आर्थिक गतिविधियों को ठप करने की कीमत आम नागरिकों से वसूली जाए? जिस समय दिल्ली के बाजारों में ग्राहकों की सबसे अधिक आवाजाही होनी चाहिए थी, उस समय व्यापारियों को दुकानें बंद रखने, ग्राहकों के इंतजार और माल की आपूर्ति बाधित होने जैसी परिस्थितियों से जूझना पड़ा।
सीटीआई के चेयरमैन बृजेश गोयल ने इस संकट ओर ध्यान भी पहले दिला दिया था कि रामलीला मैदान के आसपास पांच किलोमीटर के दायरे में सदर बाजार, चांदनी चौक, खारी बावली, नया बाजार, कश्मीरी गेट और भगीरथ पैलेस सहित 22 से 25 प्रमुख बाजार आते हैं। इन बाजारों में लगभग तीन लाख दुकानें हैं, जिनमें से करीब 2.5 लाख दुकानें हैं, ऐसे में कृपया अभी यहां रैली न की जाए, पर व्यापारियों के हित की बात कांग्रेस को कहां सुनाई देनी थी?
सबसे गंभीर बात यह है कि सदर बाजार से देशभर में घरेलू सामान की आपूर्ति होती है, चांदनी चौक कपड़ों और आभूषणों का बड़ा केंद्र है, खारी बावली मसालों और सूखे मेवों के कारोबार के लिए प्रसिद्ध है और भगीरथ पैलेस इलेक्ट्रॉनिक सामान का महत्वपूर्ण बाजार है। इन बाजारों से देश के विभिन्न राज्यों के हजारों छोटे-बड़े व्यापारी जुड़े हैं। रैली से पहले लगभग दस लाख लोगों के जुटने और 15 से 20 हजार वाहनों के दिल्ली पहुंचने की आशंका ने ही व्यापारिक क्षेत्रों में अनिश्चितता पैदा कर दी थी। सुरक्षा व्यवस्था, बैरिकेडिंग, रास्तों में बदलाव और संभावित जाम की खबरों से बाजार आने वाले ग्राहकों ने अपनी खरीदारी की योजना टाल दी।
राहुल गांधी ने रैली के दौरान लोगों से दिल्ली के बाजारों में जाकर खरीदारी करने और व्यापारियों का समर्थन करने की अपील की। सुनने में यह बात अच्छी लगती है, मगर इसकी जमीनी हकीकत पर भी विचार होना चाहिए। जब करीब 80 प्रतिशत दुकानें बंद थीं, बाजारों तक पहुंचने के रास्ते प्रभावित थे और ग्राहक आने से बच रहे थे, तब खरीदारी की अपील का वास्तविक अर्थ क्या रह जाता है? वास्तव में व्यापारियों का सवाल भी यही था कि जब दुकानें ही बंद थीं तो ग्राहक खरीदारी कहां करते? राजनीतिक मंच से व्यापारियों के प्रति सहानुभूति जताना और उनकी वास्तविक कारोबारी परिस्थितियों को समझना दो अलग-अलग बातें हैं।
सीटीआई ने रैली वाले दिन कारोबार सामान्य पीक सीजन की तुलना में 15 से 20 प्रतिशत तक सिमटने की बात कही है। लगभग 11 हजार करोड़ रुपये के कारोबार को नुकसान हुआ है। अब इससे जुड़ी आर्थिक चिंता को खारिज करना भी संभव नहीं है। क्योंकि छोटे दुकानदारों के लिए त्योहारों की बिक्री महज मुनाफा कमाने का अवसर नहीं होती, यह उनके पूरे साल के वित्तीय प्रबंधन का महत्वपूर्ण आधार होती है। कई कारोबारी उधार पर माल खरीदते हैं। त्योहारों में होने वाली बिक्री से आपूर्तिकर्ताओं का भुगतान करते हैं, कर्मचारियों का वेतन देते हैं और अगली खेप के लिए पूंजी जुटाते हैं। बिक्री के महत्वपूर्ण दिन निकल जाने पर उनकी आर्थिक गणना बिगड़ जाती है। त्योहार बीतने के बाद कई वस्तुओं की मांग तेजी से घट जाती है।
इस रैली की कीमत उन लोगों ने भी चुकाई, जिनकी आवाज राजनीतिक मंचों तक शायद ही कभी पहुंचती है। दिल्ली के बाजारों में माल उतारने, पैकिंग करने, सामान पहुंचाने और गोदामों में काम करने वाले हजारों मजदूर रोज की कमाई पर निर्भर रहते हैं। सामान्य त्योहारी दिनों में इन बाजारों में चार लाख से अधिक मजदूरों को काम मिलता है, जबकि रैली वाले दिन काम करने वालों की संख्या एक लाख से कम रह गई।
उत्तर प्रदेश, बिहार और राजस्थान से आए मजदूर त्योहारों के दिनों में अतिरिक्त मेहनत करके अपने परिवारों के लिए कुछ अधिक कमाने की उम्मीद रखते हैं। किसी को बच्चों की फीस भरनी है, किसी को घर का खर्च भेजना है और किसी को कर्ज की किस्त चुकानी है। बाजार में काम ठप हुआ तो इनकी कमाई भी ठप हो गई। जो मजदूर सुबह काम की उम्मीद लेकर पहुंचे, उनमें से कई को खाली हाथ लौटना पड़ा। राजनीतिक रैली के मंच पर गरीबों और मजदूरों के अधिकारों की बात करने वाले नेतृत्व के सामने यह सवाल अवश्य खड़ा होना चाहिए कि इन श्रमिकों की रोजी पर पड़े आघात की जिम्मेदारी कौन लेगा?
व्यापारियों की मुश्किल माल की आवाजाही बाधित होने से और बढ़ी। रामलीला मैदान के दस किलोमीटर के दायरे में मालवाहक वाहनों की आवाजाही पर व्यापक असर पड़ा। नरेला, बवाना, ओखला, मायापुरी, मुंडका और उद्योग नगर से बाजारों तक सामान पहुंचाने वाले ट्रक और टेंपो सामान्य दिनों की तुलना में काफी कम संख्या में पहुंचे। जहां रोजाना करीब पांच हजार ट्रक और टेंपो बाजारों तक माल पहुंचाते हैं, वहीं रैली वाले दिन इनकी संख्या दो हजार से भी कम रह गई। परिणामस्वरूप गोदामों में तैयार माल अटका रहा, दुकानों तक सामान पहुंचाने में देरी हुई और परिवहन कारोबार से जुड़े लोगों की आय भी प्रभावित हुई। यानी राजनीतिक आयोजन का प्रभाव एक बाजार या एक दिन की दुकानदारी तक सीमित नहीं रहा, पूरी कारोबारी शृंखला इसकी चपेट में आई।
यहां सबसे बड़ा प्रश्न राजनीतिक प्राथमिकताओं का है। जब किसी बड़े आयोजन से पहले उसकी सुरक्षा, यातायात और प्रशासनिक व्यवस्था पर विस्तृत विचार किया जाता है, तो उसके आर्थिक प्रभाव का आकलन क्यों गौण रह जाता है? क्या व्यापारिक संगठनों से बातचीत करके आयोजन की तारीख बदलना असंभव था? क्या दिल्ली के बाहरी क्षेत्रों में रैली के लिए वैकल्पिक स्थल उपलब्ध कराने की व्यवस्था नहीं हो सकती थी? क्या मालवाहक वाहनों, ग्राहकों और आम नागरिकों के लिए अलग-अलग मार्ग निर्धारित करना कठिन था? इन सवालों का उत्तर आज कांग्रेस को देना ही चाहिए! राहुल गांधी की रैली ने यह भी उजागर किया है कि कांग्रेस जनता के समर्थन की बात तो करती है, मगर जनता के आर्थिक जीवन को प्रभावित करने वाले अपने निर्णयों के प्रति जवाबदेह नहीं है।
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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी

